सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (14 अगस्त) को NTPC द्वारा दायर 20 साल पुराने कमर्शियल केस को लंबा खींचने के लिए Reliance Industries Ltd (RIL) पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। यह जुर्माना 'सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन' के पास जमा करने का निर्देश दिया गया।

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने RIL की कानूनी लड़ाई की रणनीति पर कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि 2005 में दायर यह केस अभी भी सबूत (एविडेंस) के चरण में ही है, क्योंकि कंपनी हर मोड़ पर आपत्तियां उठा रही है।

कोर्ट ने कहा,

"इन तथ्यों से पता चलता है कि RIL की कानूनी लड़ाई लड़ने और केस की प्रगति में रुकावट डालने की क्षमता असीमित लगती है। उनके पास पैसों की कोई कमी नहीं है और न ही उन पर कोर्ट के पेंडिंग केसों के बोझ को कम करने में मदद करने की कोई बाध्यता है। शायद RIL के लिए हर चरण पर कोई न कोई आपत्ति उठाना फायदेमंद है; जब ट्रायल कोर्ट इसे खारिज कर देता है तो अपील और स्पेशल लीव जूरिस्डिक्शन (विशेष अनुमति अधिकार क्षेत्र) के रास्ते खुल जाते हैं... हमें यह कहना पड़ रहा है कि NTPC द्वारा 2005 में दायर केस में कोई खास प्रगति नहीं हुई। हर चरण पर रुकावटें आई हैं... कुल मिलाकर, दो दशक बीत चुके हैं और केस अभी भी सबूत के चरण में ही है।"

यह विवाद NTPC द्वारा Reliance Industries Ltd (RIL) के खिलाफ 2005 में दायर एक केस से जुड़ा है, जिसमें नेचुरल गैस सप्लाई एग्रीमेंट के तहत 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' (अनुबंध की शर्तों को पूरा करने) की मांग की गई थी। 20 साल से ज़्यादा समय से पेंडिंग होने के बावजूद, यह केस सबूत के चरण से आगे नहीं बढ़ पाया।

कार्यवाही के दौरान, RIL ने कई प्रक्रियात्मक आदेशों को चुनौती देते हुए कई एप्लीकेशन और अपीलें दायर कीं। सबसे पहले, उसने NTPC के इंटरनल डॉक्यूमेंट्स को सामने लाने (डिस्कवरी) की मांग की, लेकिन सिंगल जज और डिवीजन बेंच दोनों ने इस एप्लीकेशन को देर से की गई "फिशिंग इन्क्वायरी" (बिना ठोस आधार के जानकारी जुटाने की कोशिश) बताकर खारिज किया। इसके बाद RIL ने अपने इंटरनल डॉक्यूमेंट्स को रिकॉर्ड पर लाने की कोशिश की, लेकिन उस अनुरोध को भी खारिज कर दिया गया, और बाद में सुप्रीम कोर्ट के सामने उसकी चुनौती वापस ले ली गई।

ताज़ा मामले में NTPC ने RIL के एक गवाह द्वारा दायर हलफनामे के कुछ हिस्सों को हटाने (रिडैक्शन) की मांग की, क्योंकि उनमें 'प्रिविलेज्ड' (गोपनीय/संरक्षित) और 'इनएडमिसिबल' (अस्वीकार्य) इंटरनल कम्युनिकेशन शामिल थे। हाई कोर्ट ने अंदरूनी बातचीत के उन हिस्सों को हटाने का निर्देश दिया, जो गवाह की निजी सोच और मनःस्थिति को दर्शाते थे, जबकि बाकी हिस्सों को बनाए रखने को कहा। RIL ने सुप्रीम कोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी।

RIL की अपील खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि यह मामला दो दशकों से अटका हुआ है क्योंकि "हर चरण में रुकावटें आती रही हैं"।

कोर्ट ने कार्यवाही की धीमी गति पर नाराजगी जताई और कहा कि 2019 में दिए गए अपने पिछले आदेश के बावजूद, मामले के निपटारे के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए गए।

कोर्ट ने कहा,

"इस कोर्ट द्वारा मामले का निपटारा नौ महीने में करने का निर्देश दिए हुए सात साल बीत चुके हैं।"

कोर्ट ने कहा,

"हमारे लिए ऐसे निर्देश को दोहराना और हाईकोर्ट से अनुरोध करना जरूरी है कि वह इस मामले को जल्द से जल्द निपटाए। हाईकोर्ट को यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी पक्ष को मुकदमे को लंबा खींचने की अनुमति देना, अदालतों द्वारा कार्यवाही चलाने के तरीके पर भी एक दुखद टिप्पणी है।"

कोर्ट ने फैसला सुनाया,

"...अपील खारिज की जाती है और अपीलकर्ता-RIL को 'सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन' को 10 लाख रुपये का खर्च देना होगा। यह राशि आज से पांच सप्ताह के भीतर चुकाई जानी चाहिए।"

Cause Title: RELIANCE INDUSTRIES LIMITED VERSUS NTPC LIMITED

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