ज़मीन पर दशकों तक अवैध कब्ज़े के बाद मालिकों को मुआवज़ा के फ़ैसले को चुनौती: सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ पर लगाया ₹2 लाख का जुर्माना

Update: 2026-06-21 04:01 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार की याचिका खारिज की, जिसमें ज़मीन मालिकों को दिए गए बढ़े हुए मुआवज़े और ब्याज को चुनौती दी गई। इन मालिकों की ज़मीन पर पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (PWD) ने बिना किसी अधिग्रहण प्रक्रिया के लगभग 25 वर्षों तक कब्ज़ा कर रखा। कोर्ट ने राज्य की चुनौती को "पूरी तरह से बेबुनियाद" बताया और ₹2 लाख का जुर्माना लगाया।

राज्य की अपील को खारिज करते हुए जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने हाईकोर्ट के उस फ़ैसले को बरकरार रखा, जिसमें अपीलकर्ता-राज्य को ज़मीन अधिग्रहण का मुआवज़ा तय करने और ज़मीन मालिकों को ₹5,380 प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवज़ा देने का निर्देश दिया गया।

यह विवाद दुर्ग ज़िले की ज़मीन से जुड़ा था, जिस पर PWD ने 1986 में कब्ज़ा कर लिया और बिना औपचारिक अधिग्रहण के सड़क निर्माण के लिए उसका इस्तेमाल किया। 3 मई 2006 को सीमांकन की प्रक्रिया के दौरान यह अतिक्रमण सामने आया, जिसके बाद ज़मीन मालिकों ने छत्तीसगढ़ लैंड रेवेन्यू कोड के तहत विभाग को हटाने की प्रक्रिया शुरू की।

इसके बाद राज्य ने 1894 के लैंड एक्विजिशन एक्ट की धारा 4 के तहत नोटिफिकेशन जारी करके 2010 में अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की। जून 2011 में जारी अंतिम आदेश में वित्तीय वर्ष 2009-10 के लिए गाइडलाइन दरों के आधार पर मुआवज़ा ₹4,308 प्रति वर्ग मीटर तय किया गया।

लैंड एक्विजिशन एक्ट की धारा 18 के तहत रेफरेंस पर रेफरेंस कोर्ट ने वित्तीय वर्ष 2010-11 के लिए संशोधित गाइडलाइन दरों को लागू करते हुए मुआवज़े को बढ़ाकर ₹5,380 प्रति वर्ग मीटर कर दिया। कोर्ट ने अधिग्रहण नोटिफिकेशन के प्रकाशन की तारीख से पहले साल के लिए 9% सालाना और उसके बाद भुगतान होने तक 15% सालाना ब्याज देने का भी निर्देश दिया।

हाईकोर्ट ने बढ़ी हुई मार्केट वैल्यू को सही ठहराया और यह भी कहा कि ज़मीन मालिक 2 सितंबर 2006 से ब्याज पाने के हकदार हैं, जब उन्होंने बेदखली का मुकदमा दायर किया। कोर्ट ने माना कि राज्य ने बिना मुआवज़े के सालों तक उनकी ज़मीन पर अवैध रूप से कब्ज़ा कर रखा था।

कोर्ट ने राज्य की इस दलील को खारिज किया कि बेदखली का मुकदमा दायर करने की तारीख से कोई ब्याज नहीं गिना जाना चाहिए। इसके बजाय, कोर्ट ने कहा कि चूंकि "राज्य ने बिना अधिकार के प्रतिवादियों की ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया था और लंबे समय तक उसका इस्तेमाल किया। साथ ही 2006 में प्रतिवादियों द्वारा बेदखली का मुक़दमा दायर करने के बाद भी मुआवज़े की कोई पेशकश नहीं की गई, इसलिए हाई कोर्ट का मुक़दमा दायर करने की तारीख से ऊपर बताई गई दरों पर मुआवज़े की रक़म पर ब्याज देना पूरी तरह से सही था।"

असल में कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा तय किए गए मामले पर राज्य की दोबारा मुक़दमा लड़ने की कोशिश को ज़मीन-मालिक प्रतिवादियों को परेशान करने और उन्हें मुआवज़े के उनके जायज़ हक़ से वंचित करने की कोशिश बताया।

नतीजतन, अपील खारिज की गई और अपील करने वाले राज्य को आदेश की तारीख से 8 हफ़्ते के अंदर प्रतिवादियों को खर्च का भुगतान करने का निर्देश दिया गया।

Cause Title: STATE OF CHHATTISGARH & ORS. VERSUS PARIKSHIT SINGH GUPTA & ORS.

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