'कुछ खामियों को दूर करना होगा': RTI एक्ट में DPDP संशोधन को चुनौती देने वाली याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी पीठ को भेजीं

Update: 2026-02-16 08:19 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने आज डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन अधिनियम, 2023 (DPDP Act) और डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन नियम, 2025 के उन प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया, जिनके माध्यम से सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम में संशोधन किया गया है। अदालत ने माना कि मामला गंभीर और विचारणीय है तथा इसे बड़ी पीठ के समक्ष भेज दिया।

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की खंडपीठ ने यह आदेश पारित किया।

किन याचिकाओं पर सुनवाई

खंडपीठ तीन रिट याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी—

वेंकटेश नायक द्वारा दायर याचिका

डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म द रिपोर्टर्स कलेक्टिव और पत्रकार नितिन सेठी की याचिका

नेशनल कैंपेन फॉर पीपुल्स राइट टू इन्फॉर्मेशन (NCPRI) की याचिका

याचिकाकर्ताओं ने मुख्य रूप से DPDP अधिनियम की धारा 44(3) को चुनौती दी है, जिसके माध्यम से RTI अधिनियम की धारा 8(1)(j) में संशोधन किया गया है। संशोधन के बाद व्यक्तिगत जानकारी के खुलासे पर लगभग पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है, जबकि पहले सार्वजनिक हित होने पर ऐसी जानकारी दी जा सकती थी।

चीफ़ जस्टिस ने कहा कि यह मामला संवेदनशील है और दोनों पक्षों के मजबूत तर्क होंगे। उन्होंने इसे “जटिल लेकिन रोचक” बताते हुए कहा कि यह दोनों पक्षों के मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है।

स्थगन देने से इनकार

याचिकाकर्ताओं की ओर से कानून पर रोक (Stay) की मांग भी की गई, लेकिन अदालत ने स्पष्ट रूप से इसे खारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अंतरिम आदेश के माध्यम से संसद द्वारा बनाए गए कानून को निलंबित नहीं किया जाएगा।

याचिकाकर्ताओं की मुख्य आपत्तियाँ

याचिकाओं में कहा गया है कि संशोधन से पहले व्यक्तिगत जानकारी का खुलासा तब संभव था जब वह सार्वजनिक गतिविधि या बड़े सार्वजनिक हित से जुड़ी हो। नए प्रावधान ने इस संतुलन को समाप्त कर दिया है और पारदर्शिता के अधिकार को कमजोर कर दिया है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पत्रकार और पारदर्शिता कार्यकर्ता अक्सर सार्वजनिक हित में सीमित व्यक्तिगत जानकारी का उपयोग भ्रष्टाचार, अनियमितताओं या हितों के टकराव को उजागर करने के लिए करते हैं। सार्वजनिक हित के अपवाद को हटाने से जवाबदेही पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।

केंद्र सरकार को व्यापक अधिकार देने का आरोप

याचिका में DPDP अधिनियम की धारा 36 और नियम 23 को भी चुनौती दी गई है, जो केंद्र सरकार को डेटा फिड्यूशरी और मध्यस्थों से जानकारी मांगने का अधिकार देते हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये प्रावधान अनुचित डिजिटल तलाशी और बिना पर्याप्त सुरक्षा उपायों के व्यक्तिगत डेटा एकत्र करने की अनुमति देते हैं, जिससे संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होता है।

साथ ही यह भी कहा गया है कि व्यक्तियों को यदि उनके डेटा के खुलासे की जानकारी नहीं दी जाती, तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) को भी प्रभावित करता है।

डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड की स्वतंत्रता पर सवाल

याचिकाओं में डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड की स्वतंत्रता पर भी प्रश्न उठाए गए हैं, विशेषकर उसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर, जिसे कार्यपालिका के प्रभाव में बताया गया है।

याचिकाकर्ताओं ने DPDP अधिनियम, 2023 की कई धाराओं — 5, 6, 8, 10, 17, 18, 19, 36 और 44(3) — को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है। साथ ही डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन नियम, 2025 के कई नियमों को भी शून्य और अमान्य घोषित करने की मांग की गई है।

इस प्रकार, मामला निजता के अधिकार और पारदर्शिता के अधिकार के बीच संतुलन से जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाता है, जिस पर अब सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ अंतिम निर्णय करेगी।

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