सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराध के मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता पर गाइडलाइंस को मंज़ूरी दी, सभी अदालतों को इनका पालन करने का निर्देश दिया
सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी की एक्सपर्ट कमेटी की ओर से पेश की गई उस रिपोर्ट को मंज़ूरी दी, जिसमें यौन अपराध के मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता से जुड़ी गाइडलाइंस शामिल हैं।
इसके अलावा, कोर्ट ने देश की सभी अदालतों को निर्देश दिया कि वे मंज़ूर की गई गाइडलाइंस/हैंडबुक में इस्तेमाल की गई बातों का सख्ती से पालन करें।
आदेश के मुताबिक, मंज़ूर की गई गाइडलाइंस/हैंडबुक को सुप्रीम कोर्ट, सभी हाईकोर्ट और ज़िला अदालतों (जहां ऐसी वेबसाइटें मौजूद हैं) की वेबसाइटों पर अपलोड किया जाएगा। इन्हें नेशनल और सभी स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमी, साथ ही नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी और दूसरी यूनिवर्सिटी के लॉ डिपार्टमेंट में भी भेजा जाएगा।
आदेश में यह भी कहा गया,
"सभी राज्यों के डायरेक्टर ऑफ़ प्रॉसिक्यूशन और डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस को भी निर्देश दिया गया कि वे सभी पुलिस स्टेशनों को ज़रूरी निर्देश जारी करें ताकि FIR दर्ज करते समय या चार्जशीट दाखिल करते समय हैंडबुक की बातों का पालन किया जा सके।"
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत ने कहा,
"कमेटी ने बहुत अच्छा काम किया।"
बाद में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना वाली बेंच ने बताया कि मंज़ूर की गई गाइडलाइंस को न्यायिक आदेश का हिस्सा बनाया जाएगा।
गाइडलाइंस की डिटेल अपलोड होने के बाद पता चलेंगी।
यह घटनाक्रम सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट के विवादित फ़ैसले पर स्वतः संज्ञान (suo motu) लेने के बाद हुआ। उस फ़ैसले में कहा गया कि नाबालिग लड़की के पजामे की डोरी खोलना और उसके ब्रेस्ट को पकड़ना रेप की कोशिश नहीं माना जाएगा।
बता दें, इस साल फरवरी में हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी को यौन अपराध के मामलों में न्यायिक कार्यवाही के दौरान संवेदनशीलता और सहानुभूति लाने के लिए व्यापक ड्राफ़्ट गाइडलाइंस तैयार करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने ज़ोर दिया था कि ऐसे नियम भारत के सामाजिक ताने-बाने को दर्शाने वाले होने चाहिए, न कि विदेशी कानूनों से लिए गए हों।
इसलिए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी, भोपाल के डायरेक्टर जस्टिस अनिरुद्ध बोस से कहा कि वे "यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों के संदर्भ में जजों और न्यायिक प्रक्रियाओं में संवेदनशीलता और सहानुभूति लाने के लिए गाइडलाइंस विकसित करने" पर विचार-विमर्श करने के लिए एक्सपर्ट्स की एक कमेटी बनाएं।
आदेश में कहा गया,
"ऐसे कई आपत्तिजनक शब्द और वाक्यांश हैं, जिनका इस्तेमाल आम तौर पर हमारे दंड कानूनों के तहत अपराध माना जाएगा, लेकिन हमारे समाज के लोग स्थानीय बोलियों में खुलेआम इनका इस्तेमाल करते हैं। ऐसा शायद इसलिए होता है, क्योंकि उन्हें इन बातों के आपत्तिजनक होने की सही समझ नहीं होती। अगर समिति अपनी रिपोर्ट में अलग-अलग भाषाओं के ऐसे शब्दों/वाक्यांशों की पहचान करके उन्हें एक जगह इकट्ठा कर सके तो यह बहुत अच्छा होगा। इससे ये शब्द नज़रअंदाज़ नहीं होंगे और शिकायत करने वाले/पीड़ित लोग उस सदमे या तकलीफ़ के बारे में बेहतर और पूरी तरह से बता पाएँगे, जिससे वे गुज़रे हैं।"
इस आदेश के बाद विशेषज्ञों की समिति ने कोर्ट के सामने दिशा-निर्देशों वाली एक रिपोर्ट पेश की, जिसे मंज़ूरी दे दी गई।
Case Title: IN RE: ORDER DATED 17.03.2025 PASSED BY THE HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD IN CRIMINAL REVISION NO. 1449/2024 AND ANCILLARY ISSUES | SMW(Crl) No. 1/2025