जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने एक युवा वकील को, जिन्होंने रिट याचिका दायर की थी, सलाह दी कि ऐसी याचिकाएं दायर करने से पहले वह अच्छी तरह सोच-विचार कर लें। उन्होंने वकील को याद दिलाया कि युवा वकील देश का भविष्य हैं और इस पेशे को आगे बढ़ाने के लिए भी जिम्मेदार हैं।

एक युवा वकील ने सुप्रीम कोर्ट में शिक्षकों की रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने की ज़रूरत से जुड़ा मुद्दा उठाते हुए याचिका दायर की। यह मामला जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच के सामने आया।

शुरुआत में ही, जस्टिस नरसिम्हा ने सवाल किया कि एक वकील के तौर पर उन्हें ऐसे मुद्दे से क्या सरोकार है, जो राज्य का नीतिगत फैसला है।

उन्होंने कहा,

"एक वकील के तौर पर आपका इससे क्या लेना-देना है? क्या आप खुद ही पक्षकार (party-in-person) के तौर पर पेश हो रही हैं?"

जब वकील ने पुष्टि की कि वह खुद ही पक्षकार के तौर पर पेश हो रही हैं तो जस्टिस नरसिम्हा ने टिप्पणी की:

"दिन-ब-दिन क्या हो रहा है? आपकी चिंता क्या है? आप एक प्रैक्टिसिंग वकील हैं; क्या ऐसे मामले आपको उठाने चाहिए? किसके कहने पर ये मामले उठाए जा रहे हैं? क्या आपने इस बारे में सोचा है?"

उन्होंने युवा वकील से कहा कि वकालत के पेशे के साथ कई जिम्मेदारियां जुड़ी होती हैं।

जस्टिस नरसिम्हा ने कहा,

"मुकदमेबाजी एक बड़ी जिम्मेदारी है। यह कोई आम बात नहीं है कि आपने अखबार में कुछ पढ़ा और उसे PIL में बदल दिया। यह एक बहुत बड़ा मुद्दा है। अगर शिक्षकों की रिटायरमेंट की उम्र 65 साल से आगे बढ़ानी है, तो यह एक बहुत बड़ा नीतिगत मुद्दा है। रातों-रात इसे PIL में बदल देना और अपना बैंड हटाकर खुद ही पक्षकार के तौर पर पेश होना - आपको ऐसा नहीं करना चाहिए! ऐसा करने से पहले सोचें। वकील होना एक बड़ी जिम्मेदारी है। आप देश का प्रतिनिधित्व करते हैं, और यह देखते हैं कि प्रैक्टिस किस दिशा में जा रही है। अदालतों पर काम का कितना बोझ है, क्या इससे किसी को मदद मिलेगी या नहीं - इन सब बातों पर आपको दो बार सोचना चाहिए।"

बेंच ने रिट याचिका को मेरिट के आधार पर खारिज किया।

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