SIR का आदेश 2028 में चुनाव वाले छत्तीसगढ़ में दिया गया, 2028 में चुनाव वाले दूसरे राज्यों को क्यों छोड़ा गया? सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की दलील
विभिन्न राज्यों में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को चुनौती देने वाली सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं पर सीनियर एडवोकेट राजू रामचंद्रन ने आज कुछ राज्यों में SIR कराने की जल्दबाजी पर सवाल उठाया, जबकि दूसरों को इससे बाहर रखा गया।
उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ में चुनाव 2028 में होने हैं और पूछा कि वहां इतनी जल्दी क्या है। 2028 में चुनाव होने वाले दूसरे राज्यों को इस प्रक्रिया से क्यों बाहर रखा गया।
रामचंद्रन ने कहा,
"उन्होंने कहा कि बिहार में चुनाव जल्द होने वाले हैं, इसलिए हम बिहार से शुरू कर रहे हैं। यही बात कई राज्यों के लिए इस्तेमाल की गई। छत्तीसगढ़ में चुनाव 2028 में होने हैं तो वहां इतनी जल्दी क्या है? और 2028 में चुनाव होने वाले दूसरे राज्यों को बाहर रखने का क्या कारण है?"
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच विभिन्न राज्यों में किए जा रहे SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक बैच की सुनवाई कर रही थी। कोर्ट ने आज याचिकाकर्ताओं के विभिन्न वकीलों की जवाबी दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।
रामचंद्रन ने कहा कि भले ही चुनाव आयोग द्वारा इस्तेमाल की गई शक्ति संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत अपने आप में खास या पूर्ण हो, फिर भी यह न्यायिक समीक्षा के अधीन है और मनमाने ढंग से इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। उन्होंने तर्क दिया कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे पता चले कि आयोग ने कुछ चुनिंदा राज्यों में SIR करने का फैसला करते समय सोच-समझकर काम किया।
रामचंद्रन ने आगे कहा कि जबकि चुनाव आयोग का यह कर्तव्य है कि केवल नागरिक ही वोट दें, उसका यह भी कर्तव्य है कि वह पूरी वोटर लिस्ट तैयार करे और सभी योग्य व्यक्तियों को सक्रिय रूप से शामिल करे। उन्होंने तर्क दिया कि इस प्रक्रिया में अपनाई गई कार्यप्रणाली मददगार नहीं थी, बल्कि स्वीकृत पहचान दस्तावेजों को हटाकर और पूरा बोझ मतदाताओं पर डालकर बाधाएं पैदा कर रही थी।
आगे कहा गया,
"वोट देना है या नहीं देना, यह एक नागरिक की मर्ज़ी है, वह पोलिंग बूथ पर न जाए या NOTA का इस्तेमाल करे। चुनाव आयोग का कर्तव्य है कि वह पूरी वोटर लिस्ट तैयार करे। उसका कर्तव्य है कि वह देखे कि सभी योग्य व्यक्ति उसमें शामिल हों। वह यह नहीं कह सकता कि 'अगर किसी ने यह फ़ॉर्म नहीं भरा तो हम कुछ नहीं कर सकते'। अगर यह आपकी उच्च संवैधानिक भूमिका है तो यह भी आपकी सक्रिय संवैधानिक भूमिका है कि आप यह देखें कि हर योग्य व्यक्ति उस लिस्ट में आए। इस पूरी प्रक्रिया का तरीका सुविधा देने वाला नहीं रहा है। असल में, इन रुकावटों को पैदा करके, कुछ पहचान दस्तावेज़ों को हटाकर, अपनी उच्च भूमिका के विपरीत, इसने यह सुनिश्चित करने का अपना कर्तव्य छोड़ दिया कि हर योग्य भारतीय नागरिक लिस्ट में आए।"
वकील प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि SIR के कारण बड़े पैमाने पर लोगों को बाहर किया गया, खासकर महिलाओं और प्रवासी मज़दूरों को, क्योंकि गिनती के फ़ॉर्म भरने का बोझ मतदाताओं पर डाला गया। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग एक नई वोटर लिस्ट बनाने की कोशिश कर रहा है, ऐसा पहले कभी नहीं किया गया था, सिवाय उत्तर प्रदेश के एक निर्वाचन क्षेत्र के।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि चुनावी पंजीकरण अधिकारी नागरिकता कैसे तय कर सकते हैं, यह कहते हुए कि 2003 के SIR में नागरिकता साबित करने का बोझ मतदाताओं पर नहीं डाला गया और गिनती करने वालों को नागरिकता तय करने का काम नहीं सौंपा गया।
भूषण ने आगे तर्क दिया कि वोट देने का अधिकार मनमाने ढंग से नहीं छीना जा सकता और संशोधन के सभी चरणों में पारदर्शिता की ज़रूरत पर ज़ोर दिया, जिसमें हटाए गए नामों और हटाने के कारणों का प्रकाशन शामिल है।
वकील वृंदा ग्रोवर ने तर्क दिया कि आयोग ने ऐसी शक्ति का स्रोत दिखाए बिना एक कार्यकारी अधिसूचना के माध्यम से प्रभावी रूप से वैधानिक ढांचे में संशोधन किया।
सीनियर वकील शादान फ़रासात ने तर्क दिया कि नागरिकता अधिनियम में परिकल्पित नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर की अनुपस्थिति में नागरिकता का निर्धारण व्यक्तिगत एजेंसियों पर नहीं छोड़ा जा सकता है।
उन्होंने बताया कि एडवोकेट्स एक्ट, पेटेंट्स एक्ट और ट्रेडमार्क्स एक्ट जैसे कानूनों में नागरिकता की ज़रूरतें निवास और जन्मतिथि के प्रमाण के साथ स्व-घोषणा के माध्यम से पूरी की जाती हैं। यहां तक कि पासपोर्ट भी इसी आधार पर जारी किए जाते हैं।
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि चुनाव आयोग एक समस्या का समाधान कर रहा था, लेकिन उसके दायरे को दिखाने के लिए कोई डेटा रिकॉर्ड पर नहीं रखा गया और पहचाने गए गैर-नागरिकों की वास्तविक संख्या प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि ऐसा लग रहा है कि चुनाव आयोग एक ऐसी समस्या का समाधान ढूंढ रहा है, जो शायद है ही नहीं। साथ ही सवाल उठाया कि क्या कोर्ट के सामने आंकड़े पेश किए बिना 8.9 करोड़ लोगों को ऐसी प्रक्रिया से गुजारना सही है।
सीनियर एडवोकेट पीसी सेन ने कहा कि हर चुनाव से पहले SIR की मांग करने वाली याचिकाएं SIR को कानूनी प्रक्रिया की जगह एक समानांतर सिस्टम बना सकती हैं। ECI को कानून के तहत तय प्रक्रिया और सुरक्षा उपायों को दरकिनार करने का विकल्प दे सकती हैं।
एडवोकेट निज़ाम पाशा ने बताया कि SIR से पहले ही एक संक्षिप्त संशोधन किया जा चुका था और यह नहीं बताया गया कि इसे अपर्याप्त क्यों पाया गया।
हालांकि, इस मुद्दे पर बहस खत्म हो गई। इसके साथ ही कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया।
Case Title: Association for Democratic Reforms and Ors. v. Election Commission of India