सबरीमाला सुनवाई: 'संवैधानिक नैतिकता' को धार्मिक स्वतंत्रता पर लागू करना खतरनाक— डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी

Update: 2026-04-16 07:21 GMT

सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि “संवैधानिक नैतिकता” (constitutional morality) एक बेहद लचीली और व्यक्तिपरक अवधारणा है, जिसे धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में लागू करना खतरनाक हो सकता है।

वे 9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष अपनी दलीलें रख रहे थे, जिसमें चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंद्रेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्य बागची शामिल हैं।

'संविधान में केवल “नैतिकता” शब्द'

सिंघवी ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 में केवल “morality” शब्द का उपयोग किया गया है, न कि “public morality” या “constitutional morality” का। उन्होंने तर्क दिया कि यह एक विशेष कानूनी शब्द (term of art) है, जिसे अदालत अपनी व्याख्या से बदल नहीं सकती।

ऐतिहासिक संदर्भों का हवाला

उन्होंने केशवानंद भारती और एस.पी. गुप्ता मामलों का जिक्र करते हुए कहा कि “संवैधानिक नैतिकता” का उपयोग पहले भी हुआ है, लेकिन आज जिस तरह से इसे लागू किया जा रहा है, वह अलग है।

सिंघवी ने डॉ. बी.आर. आंबेडकर के भाषण का भी हवाला दिया और कहा कि इस अवधारणा का उद्देश्य शासन व्यवस्था को दिशा देना था, न कि धार्मिक अधिकारों की जांच करना।

'धार्मिक आस्था व्यक्तिपरक होती है'

सिंघवी ने कहा कि धार्मिक प्रथाओं को उनके अनुयायियों के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए, जो स्वभावतः व्यक्तिपरक होता है। ऐसे में “संवैधानिक नैतिकता” को लागू करना धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को प्रभावित कर सकता है।

न्यायाधीशों की टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि “संवैधानिक नैतिकता” को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता, लेकिन इसे कानून रद्द करने के आधार के रूप में उपयोग करना एक बहुत ही लचीला परीक्षण है।

जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस नागरत्ना ने यह भी कहा कि इस अवधारणा का उपयोग हाल के मामलों में सार्वजनिक पदाधिकारियों के आचरण को नियंत्रित करने के लिए किया गया है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि “संवैधानिक नैतिकता” को एक प्रकार का “संवैधानिक धर्म” या आचार संहिता माना जा सकता है।

'अत्यधिक उपयोग से हो सकता है नुकसान'

सिंघवी ने चेतावनी दी कि इस अवधारणा का अत्यधिक उपयोग “हानिकारक” हो सकता है और यदि इसे अनुच्छेद 25 और 26 में लागू किया गया, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

उन्होंने कहा कि यह ऐसा होगा जैसे “चीनी की दुकान में सांड घुस जाए”, यानी यह धार्मिक स्वतंत्रता के प्रावधानों के साथ मेल नहीं खाता।

केंद्र सरकार का भी विरोध

केंद्र सरकार ने भी धार्मिक स्वतंत्रता के मामलों में “संवैधानिक नैतिकता” के उपयोग का विरोध किया है और उन फैसलों पर सवाल उठाए हैं, जिनमें इस अवधारणा के आधार पर समलैंगिकता और व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया था।

निष्कर्ष

यह बहस इस बात पर केंद्रित है कि क्या “संवैधानिक नैतिकता” जैसे लचीले सिद्धांत का उपयोग धार्मिक स्वतंत्रता की व्याख्या के लिए किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला इस महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न की सीमा और उपयोग को स्पष्ट करेगा।

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