एसिड अटैक पीड़ितों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से अपनी नीतिगत दिशानिर्देशों की समीक्षा करने को कहा है। कोर्ट ने गौर किया कि दिशानिर्देश होने के बावजूद एसिड अटैक की घटनाएं बढ़ी हैं।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे के सामने अपनी राय रखी। कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वे पिछले कुछ वर्षों में एसिड अटैक की घटनाओं को लेकर 'नेशनल क्राइम ब्यूरो रिकॉर्ड्स' के डेटा की जांच करें।

CJI ने टिप्पणी की,

"आपके दिशानिर्देशों (एसिड की खुदरा बिक्री को सीमित करने के लिए) के बावजूद, दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं हो रही हैं। ये घटनाएं बढ़ रही हैं। इसका मतलब है कि कहीं कोई कमी है। आपके दिशानिर्देश अपने उद्देश्य को हासिल करने में विफल रहे हैं। यह इस पूरे मामले पर फिर से विचार करने के लिए एक ठोस आधार है। आप सिर्फ यह सोचकर संतुष्ट नहीं हो सकते कि आपने दिशानिर्देश जारी किए और अब जिम्मेदारी राज्यों पर आ गई।"

अगर राज्यों के पास इन दिशानिर्देशों को लागू करने का कोई तंत्र नहीं है, या फिर इनमें इतनी कमियां हैं कि लोग इनका गलत फायदा उठा रहे हैं और बच निकल रहे हैं तो आपको और राज्यों को मिलकर इसका समाधान निकालना होगा। हमें कोई एक ऐसा सर्कुलर दिखाएं जो आपने किसी राज्य को भेजा हो, जिसमें उनसे पूछा गया हो कि आपके दिशानिर्देशों के बावजूद उनके राज्य में इतनी घटनाएं कैसे हो गईं? वहां की प्रवर्तन एजेंसियों (Enforcement Agencies) के अधिकारियों की जवाबदेही कहां है? केवल सहानुभूतिपूर्ण भाषा में सर्कुलर जारी कर देने या निर्देश दे देने से काम नहीं चलेगा... हम समझते हैं कि हमारा ढांचा संघीय (Federal) है... लेकिन उन्हें यह याद दिलाना होगा कि जिम्मेदारी का एक हिस्सा आपको भी उठाना होगा... अगर घटनाएं बढ़ रही हैं तो इसका मतलब है कि आपकी नीति पूरी तरह से विफल रही है।"

बेंच ने यह भी कहा कि वह गुवाहाटी हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाली एक महिला वकील की अर्जी पर सुनवाई करेगी, जिन पर 2016 में उनके एक पुरुष सहकर्मी ने कथित तौर पर एसिड फेंका था। वकील वृंदा ग्रोवर ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश होते हुए बताया कि उन्हें चिकित्सा खर्च (Medical Expenses) दिया जा रहा है। हालांकि, चूंकि कोर्ट एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास (Rehabilitation) से जुड़े व्यापक मुद्दे पर विचार कर रहा है, इसलिए याचिकाकर्ता ने इस मामले में हस्तक्षेप करने की अनुमति मांगी। ग्रोवर ने बेंच को यह भी बताया कि आवेदिका की एक आँख की दृष्टि बुरी तरह प्रभावित हुई है, फिर भी वह एक वकील के तौर पर अपना काम जारी रखे हुए हैं।

CJI कांत ने जवाब दिया,

"हम निश्चित रूप से इस पर विचार करेंगे।"

बाद में वकील ने 'पीड़ित मुआवजा योजना' (विक्टिम कंपनसेशन स्कीम) के तहत मिलने वाली मुआवजा राशि का मुद्दा उठाया और कहा कि यह किसी भी एसिड अटैक पीड़िता के लिए पर्याप्त नहीं है।

सर गंगा राम अस्पताल से कथित तौर पर (जबरन) डिस्चार्ज करने की कोशिश के मामले में अस्पताल के वकील ने पेश होकर बताया कि अदालत के निर्देशों का पालन किया गया और पीड़िता की सर्जरी चल रही है।

पीड़िता की ओर से दायर एक अर्जी पर विचार करते हुए बेंच ने अस्पताल प्रशासन से कहा कि वे पीड़िता को एक कमरा देने की संभावना तलाशें, ताकि उनकी माँ (जो उनकी देखभाल कर रही हैं) भी आराम से रह सकें (क्योंकि इलाज और ठीक होने की प्रक्रिया लंबी होगी)।

यह बात तब सामने आई जब यह दावा किया गया कि जब पीड़िता की सर्जरी नहीं हो रही होती है, तब भी उन्हें जनरल वार्ड में रखा जाता है। ASG दवे ने इस मामले के बारे में बताया कि अदालत के निर्देशों के बाद आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया और वे न्यायिक हिरासत में हैं। ASG ने भरोसा दिलाया कि वह खुद इस मामले पर नज़र रखेंगी और यह सुनिश्चित करेंगी कि पीड़िता को हर समय उचित चिकित्सा उपचार मिले।

अदालत ने NGO 'नेशनल जस्टिस एंड सोशल चेंज' द्वारा दायर एक हस्तक्षेप याचिका (इंटरवेंशन एप्लिकेशन) को भी स्वीकार कर लिया। इस NGO ने अदालत के सामने एक प्रस्तावित 'स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर' (SOP) पेश किया। अदालत ने केंद्र सरकार और NALSA से कहा कि वे इस SOP की जांच करें और अन्य हितधारकों (जिसमें पीड़िताएं भी शामिल हैं) से सुझाव मांगें।

एसिड की खुदरा बिक्री के मुद्दे पर ASG दवे ने बताया कि राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को एसिड की बिक्री को सीमित करने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए गए, लेकिन इसके लागू होने (इम्प्लीमेंटेशन) को लेकर अभी भी समस्या बनी हुई। उन्होंने यह भी बताया कि इन दिशा-निर्देशों में संशोधन किया गया और इन्हें फिर से जारी कर दिया गया।

हालांकि, CJI ने कहा कि केंद्र सरकार केवल दिशानिर्देश जारी करके अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती, क्योंकि अगर मामले बढ़ रहे हैं, तो इन दिशानिर्देशों का कोई फायदा नहीं है। बेंच ने यह भी सवाल उठाया कि जब घरेलू कामों के लिए एसिड के कई विकल्प मौजूद हैं तो बाजार में एसिड की खुदरा बिक्री की क्या जरूरत है?

CJI ने NDPS Act का उदाहरण देते हुए सुझाव दिया कि एसिड की बिक्री के लिए एक नियंत्रित व्यवस्था बनाई जा सकती है।

जस्टिस बागची ने बताया कि इस मुद्दे पर बांग्लादेश के पास काफी अच्छा कानून है।

बेंच ने कहा,

"सबसे पहले आप उन जरूरतों की पहचान करें जिनके लिए खुले बाजार में एसिड बेचने की अनुमति दी गई। फिर विशेषज्ञों की एक टीम यह पता लगा सकती है कि (उन कामों के लिए) कौन-कौन से विकल्प मौजूद हैं। हो सकता है कि आपको पता चले कि एक या दो कामों के लिए एसिड बहुत जरूरी है। ऐसे मामलों में आप (कुछ पाबंदियां) लगा सकते हैं।"

ASG दवे ने जवाब दिया कि वह एसिड की नियंत्रित बिक्री के संबंध में निर्देश लेंगी।

एसिड अटैक के उन पीड़ितों के मामले में, जिन्हें जबरन एसिड पिलाया गया या जिन्हें अंदरूनी चोटें आईं, ASG ने बताया कि ऐसे पीड़ितों को 'दिव्यांग व्यक्तियों' (Persons with Disability) की श्रेणी में शामिल किए जाने के बाद, दिव्यांगता के आकलन से जुड़े दिशानिर्देशों की समीक्षा की जा रही है।

इस संबंध में सीनियर वकील सौरभ कृपाल ने कोर्ट से आग्रह किया कि केंद्र सरकार के लिए दिव्यांगता प्रमाण पत्र की पात्रता तय करने हेतु एक समय-सीमा निर्धारित की जाए।

Case Title : SHAHEEN MALIK v. UNION OF INDIA | W.P.(C) No. 1112/2025

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