DPDP Act की धारा 44(3) के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर, उपलब्ध डेटा को छिपाने/हटाने के खिलाफ अंतरिम राहत की मांग; नोटिस जारी
सुप्रीम कोर्ट में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट (DPDP Act) की धारा 44(3) के खिलाफ एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई। इस धारा ने सूचना का अधिकार (RTI Act) की धारा 8(1)(j) की जगह ले ली है और किसी भी व्यक्ति की किसी भी तरह की "निजी जानकारी" को सार्वजनिक करने से छूट दी।
याचिकाकर्ताओं ने RTI Act या अन्य कल्याणकारी कानूनों के प्रावधानों के पालन में सार्वजनिक पोर्टलों पर पहले से उपलब्ध कराए गए डेटा को हटाने/छिपाने के खिलाफ अंतरिम राहत की भी मांग की। उनका तर्क है कि ऐसा करने से ज़मीनी स्तर के उन कार्यों में बाधा आएगी, जिन्हें ऐसी जानकारी से लाभ मिलता है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने याचिका पर सुनवाई के बाद (याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश) सीनियर वकील श्याम दीवान को नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ताओं के अनुरोध पर खंडपीठ ने राजस्थान राज्य को भी मामले में एक पक्ष के रूप में शामिल कर लिया। इस मामले पर अन्य समान याचिकाओं के साथ विचार किया जाएगा, जिन पर विचार करने के लिए कोर्ट सहमत हो गया।
संदर्भ के लिए, DPDP Act की धारा 44(3) ने RTI Act की धारा 8(1)(j) की जगह ली। RTI Act की धारा 8(1)(j) के तहत निजी जानकारी को सार्वजनिक करने से तब छूट दी गई, जब उस जानकारी का किसी सार्वजनिक गतिविधि या हित से कोई संबंध न हो, या उसे सार्वजनिक करने से किसी व्यक्ति की निजता का अनावश्यक उल्लंघन होता हो।
यानी, पहले के ढांचे के तहत एक जन सूचना अधिकारी (PIO) निजी जानकारी को सार्वजनिक करने का निर्देश दे सकता था, यदि वह इस बात से संतुष्ट होता कि "व्यापक जनहित ऐसी जानकारी को सार्वजनिक करने को उचित ठहराता है"।
अब DPDP Act की धारा 44(3) ने किसी व्यक्ति की निजी जानकारी से संबंधित सभी प्रकार के खुलासों को छूट दी। इसके अलावा, इस बदलाव ने RTI Act की धारा 8(1)(j) के उस परंतुक (Proviso) को भी खत्म कर दिया, जिसमें यह प्रावधान था कि जो जानकारी संसद या किसी राज्य विधानमंडल को देने से मना नहीं की जा सकती, उसे किसी भी अन्य व्यक्ति को देने से भी मना नहीं किया जा सकता।
DPDP Act की धारा 44(3) को संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a) और 21 का उल्लंघन बताते हुए याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। यह जनहित याचिका (PIL) मजदूर किसान शक्ति संगठन, सोशल एक्टिविस्ट अरुणा रॉय और निखिल डे तथा शंकर सिंह रावत द्वारा दायर की गई। DPDP Act की धारा 44(3) को रद्द करने और RTI Act की धारा 8(1)(j) को बहाल करने के अलावा, याचिकाकर्ता यह घोषणा भी चाहते हैं कि RTI Act की धारा 4 के तहत सक्रिय रूप से जानकारी सार्वजनिक करने का आदेश जारी रहे। इस प्रावधान से लाभार्थियों का डेटा, मस्टर रोल, सामाजिक ऑडिट के रिकॉर्ड वगैरह सार्वजनिक करना संभव हो पाता था।
याचिकाकर्ता आगे प्रतिवादी अधिकारियों से यह भी गुहार लगाते हैं कि वे "पारदर्शिता और जवाबदेही पोर्टलों - जिनमें जन सूचना पोर्टल (राजस्थान) भी शामिल है - और कल्याणकारी कानूनों के तहत स्थापित इसी तरह के अन्य पोर्टलों के माध्यम से वर्तमान में दी जा रही जानकारी तक पहुंच को खत्म करने, सीमित करने या कम करने" से बचें।
यह तर्क दिया गया कि विवादित प्रावधान "व्यक्तिगत" और "निजी" जानकारी के बीच अंतर करने में विफल रहता है। इसके विपरीत, RTI Act की धारा 8(1)(j) में 'सार्वजनिक हित' की कसौटी और 'नुकसान' की कसौटी का प्रावधान था। "जानकारी 'व्यक्तिगत' तब होती है जब वह किसी व्यक्ति से संबंधित हो या उसकी पहचान बताती हो... जानकारी 'निजी' तब होती है जब वह किसी व्यक्ति के जीवन के उस अत्यंत निजी दायरे से जुड़ी हो जिसमें राज्य बिना किसी उचित कारण के दखल नहीं दे सकता।"
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जिन वंचित समुदायों का वे प्रतिनिधित्व करते हैं, वे राज्य के पास मौजूद व्यक्तिगत जानकारी पर निर्भर रहते हैं - जैसे कि - मज़दूरी के रिकॉर्ड, लाभार्थियों की सूचियां, पात्रता रजिस्टर, सार्वजनिक खाते - ताकि वे काम और भोजन के अपने अधिकारों को लागू कर सकें और मनमानी कार्रवाई से मुक्त रह सकें। उनका ज़ोर देकर कहना है कि ये रिकॉर्ड 'व्यक्तिगत' जानकारी हैं, न कि 'निजी' जानकारी।
इसके अलावा, याचिकाकर्ता इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि धारा 44(3) में इस्तेमाल किए गए वाक्यांश - "जानकारी जो व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित हो" - का दायरा असीमित है। इसमें जानकारी का कोई भी ऐसा अंश शामिल हो जाता है, जिसमें किसी व्यक्ति का ज़िक्र भी हो। इसके अलावा, स्पष्ट मामलों में जानकारी देने से अनिवार्य रूप से मना करने का प्रावधान है और PIO (जन सूचना अधिकारी) के पास यह तय करने का बहुत व्यापक अधिकार है कि कोई भी अनुरोध 'व्यक्तिगत जानकारी' से संबंधित है या नहीं, और वह बिना किसी न्यायिक मानक के उसे अस्वीकार कर सकता है।
आगे कहा गया,
"यह न केवल किसी अधिकारी का नाम और पता सार्वजनिक करने से छूट देता है, बल्कि अधिकारी द्वारा अपने सार्वजनिक कर्तव्यों के निर्वहन से जुड़े रिकॉर्ड को भी सार्वजनिक करने से छूट देता है - महज़ इस आधार पर कि उन रिकॉर्ड से अधिकारी की पहचान होती है।"
याचिकाकर्ताओं का यह भी तर्क है कि विवादित प्रावधान आनुपातिकता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता और RTI Act की धारा 8(1)(j) में संशोधन करने की कोई संवैधानिक आवश्यकता थी ही नहीं। वे सुप्रीम कोर्ट के पुट्टास्वामी फैसले के आधार पर किए गए इस संशोधन के औचित्य पर भी आपत्ति जताते हुए कहते हैं कि वह फैसला किसी व्यक्ति के लिए राज्य के खिलाफ एक ढाल का काम करता है - राज्य उसका इस्तेमाल अपनी सार्वजनिक शक्तियों के इस्तेमाल से जुड़े रिकॉर्ड को छिपाने के लिए नहीं कर सकता। इसके अलावा, उस फैसले में निजता के अधिकार को सूचना के अधिकार से ऊपर नहीं माना गया।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, DPDP Act में भी आंतरिक विरोधाभास है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह राज्य द्वारा अपने डेटा की प्रोसेसिंग के मामले में तो 'जनहित' से जुड़ी छूट का प्रावधान करता है, लेकिन नागरिकों द्वारा सूचना मांगे जाने पर 'जनहित' को दी जाने वाली प्राथमिकता को खत्म कर देता है।
इसके अलावा, यह तर्क भी दिया गया कि इस संशोधन का राज्य-स्तरीय पारदर्शिता पोर्टलों - जैसे कि 'राजस्थान जन सूचना पोर्टल' - पर होने वाले स्वतःस्फूर्त खुलासों पर एक 'नकारात्मक प्रभाव' (Chilling Effect) पड़ने की आशंका है। याचिकाकर्ताओं को यह डर है कि व्यक्तिगत जानकारी का खुलासा करने पर संभावित कानूनी कार्रवाई के जोखिम के चलते, सार्वजनिक प्राधिकरण (Public Authorities) पहले से ही जानकारी के खुलासे पर रोक लगा सकते हैं।
इस याचिका को वकील गौतम भाटिया, एन साई विनोद और माधव अग्रवाल ने तैयार किया।
Case Title: MAZDOOR KISAN SHAKTI SANGATHAN AND ORS. Versus UNION OF INDIA AND ORS., W.P.(C) No. 358/2026