सुप्रीम कोर्ट में सौंपी गई नई रिपोर्ट में मौजूदा और पूर्व सांसदों (MP) और विधायकों (MLA) के खिलाफ आपराधिक मामलों के लंबे समय से लंबित रहने पर चिंता जताई गई, जबकि इन मुकदमों की जल्द सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए सालों से अदालती निगरानी की जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल स्टेटस रिपोर्ट के अनुसार, MP और MLA के खिलाफ 4192 आपराधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से 519 मामले 10 साल से अधिक समय से लंबित हैं। राज्यों के 28 मुख्यमंत्रियों में से 14 ने अपने खिलाफ मामले होने की जानकारी दी है, जिनमें सबसे अधिक मामले तेलंगाना के मुख्यमंत्री अनुमुला रेवंत रेड्डी के खिलाफ हैं।

रिपोर्ट में कहा गया कि अदालतों की लगातार निगरानी के बावजूद, 2018 से लंबित मामलों की संख्या लगभग वैसी ही बनी हुई और सबसे अधिक मामले इलाहाबाद हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में लंबित हैं।

यह रिपोर्ट 2016 की रिट याचिका 'अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत सरकार' (UOI) के तहत दाखिल की गई, जिसमें MP/MLA के खिलाफ आपराधिक मामलों की जल्द सुनवाई की मांग की गई। यह रिपोर्ट सीनियर एडवोकेट और एमिक्स क्यूरी विजय हंसारिया ने एडवोकेट स्नेहा कलिथा की मदद से तैयार की। यह जानकारी इलाहाबाद हाईकोर्ट को छोड़कर सभी हाईकोर्ट से मिली है, क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोई रिपोर्ट नहीं भेजी थी।

रिपोर्ट में बताया गया कि 2025 में MP और MLA के खिलाफ 1243 मामलों का निपटारा किया गया। इसी साल 1050 नए मामले दर्ज किए गए। 4192 लंबित मामलों में (जिनमें पूर्व MP और MLA के खिलाफ मामले भी शामिल हैं) 754 मामले 5 से 10 साल पुराने हैं, जबकि 563 मामले 3 से 5 साल पुराने हैं। लगभग 1095 मामले 3 साल से कम पुराने हैं।

देरी के कई कारण बताए गए

एमिक्स क्यूरी रिपोर्ट में मुकदमों में देरी के लिए कई कारणों की पहचान की गई। इनमें स्पेशल कोर्ट पर MP/MLA के मामलों के अलावा नियमित न्यायिक कामकाज का बोझ होना, हाईकोर्ट द्वारा अपर्याप्त निगरानी, ​​आरोपियों का पेश न होना, गवाहों को समन भेजने में देरी और बार-बार सुनवाई टलना शामिल हैं।

हाईकोर्ट की कार्यवाही की समीक्षा में वारंट पर अमल न होना, गवाहों को पेश न किया जाना और जांच व फोरेंसिक रिपोर्ट में देरी जैसी समस्याएं भी सामने आई हैं।

खास स्पेशल कोर्ट बनाने का प्रस्ताव

इस माहौल में एमिक्स क्यूरी (अदालत की मदद करने वाले वकील) ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि वे सांसदों और विधायकों के खिलाफ मामलों की सुनवाई करने वाली खास अदालतों के सिस्टम को और मजबूत करें।

एक अहम प्रस्ताव यह है कि सांसद/विधायक के मामलों के लिए तय स्पेशल कोर्ट सिर्फ़ इन्हीं मामलों की सुनवाई करें, न कि साथ-साथ अपना रेगुलर काम भी करते रहें।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि हाईकोर्ट हर महीने इन मामलों की न्यायिक निगरानी करें और आम तौर पर आरोप तय होने के एक साल के भीतर मामले का निपटारा हो जाना चाहिए। तीन साल से ज़्यादा समय से लंबित मामलों की सुनवाई रोज़ाना होनी चाहिए, बशर्ते लागू प्रक्रिया कानून इसकी इजाज़त दे।

एमिक्स क्यूरी ने यह भी प्रस्ताव दिया कि अगर कोई आरोपी लगातार दो सुनवाई में पेश नहीं होता है तो उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया जाए और गवाहों की मौजूदगी सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी तय प्रॉसिक्यूशन अधिकारियों की हो।

रियल-टाइम पारदर्शिता पर ज़ोर

एक और अहम सुझाव यह है कि इन मामलों से जुड़ी जानकारी तक जनता की पहुंच बढ़ाई जाए। रिपोर्ट में प्रस्ताव है कि हाईकोर्ट सांसद/विधायक के मामलों का डेटा रियल-टाइम आधार पर पब्लिश करें और आदेश जारी होने के एक हफ़्ते के भीतर ऑर्डर शीट अपलोड कर दी जाए।

इसमें 'नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड' की तर्ज़ पर मॉडल वेबसाइट बनाने का भी सुझाव दिया गया, जिसमें लंबित मामलों की ज़िलेवार जानकारी हो और उन्हें समय-सीमा के आधार पर बांटा गया हो - जैसे एक साल से कम, एक से तीन साल, तीन से सात साल और सात साल से ज़्यादा।

संसद और राज्य विधानसभाओं में लंबित मामले

'एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स' की प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, लोकसभा के 543 सदस्यों में से 251 के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें से 170 मामले गंभीर अपराधों से जुड़े हैं, जिनमें 5 साल से ज़्यादा की सज़ा हो सकती है।

सांसदों के खिलाफ सबसे ज़्यादा मामले उत्तर प्रदेश से हैं, जहां 80 मामले लंबित हैं; इनमें से 34 मामले गंभीर किस्म के हैं। इसके बाद महाराष्ट्र (48 मामले), पश्चिम बंगाल (42 मामले), बिहार (40 मामले) और तमिलनाडु (39 मामले) का नंबर आता है।

राज्यसभा की स्थिति भी उतनी ही खराब है, जहां 33% सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं और इनमें से 18% गंभीर आपराधिक मामले हैं।

राज्य स्तर पर उत्तर प्रदेश में विधायकों (MLA) के खिलाफ सबसे ज़्यादा आपराधिक मामले हैं। 2022 तक 403 विधायकों के खिलाफ मामले दर्ज थे, जिनमें से 158 गंभीर आपराधिक मामले थे। इसके बाद पश्चिम बंगाल का नंबर आता है, जहां विधायकों के खिलाफ 292 मामले हैं; इनमें से 170 गंभीर आपराधिक मामले हैं। इसके बाद महाराष्ट्र (288), बिहार (243), मध्य प्रदेश (2023 तक 230) और कर्नाटक (2023 तक 224) का स्थान है।

मुख्यमंत्रियों के खिलाफ मामले

रिपोर्ट के अनुसार, तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेड्डी के खिलाफ 89 मामले लंबित हैं, जिनमें गंभीर आपराधिक मामले भी शामिल हैं। इसके बाद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी (29), कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार (19), आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू (19) और केरल के मुख्यमंत्री वी.डी. सतीसन (18) का नंबर आता है।

इसके अलावा, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री डी.जी. फडणवीस, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय, बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, सिक्किम के मुख्यमंत्री पी.एस. तमांग, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान, ओडिशा के मुख्यमंत्री एम.सी. माझी और राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा के खिलाफ भी मामले लंबित हैं।

विशेष अदालतों में लंबित राज्य-वार मामले

रिपोर्ट के अनुसार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की विशेष अदालतों में कुल 4192 मामले लंबित हैं। हालांकि, हाईकोर्ट की वेबसाइट्स के अनुसार, कुल मामलों की संख्या 4442 है, जिनमें से सबसे ज़्यादा मामले इलाहाबाद हाई कोर्ट में पेंडिंग हैं; 24 फरवरी तक इनकी संख्या 1171 थी।

जांच के लिए पेंडिंग मामले

मध्य प्रदेश में जांच के लिए पेंडिंग मामलों की संख्या सबसे ज़्यादा है, जिनमें अभी तक चार्जशीट दाखिल नहीं की गई है। जांच के लिए लगभग 223 मामले पेंडिंग हैं, जिनमें से 179 मामले 3 साल से ज़्यादा पुराने हैं।

इसके बाद मद्रास हाई कोर्ट का नंबर आता है, जहां 38 मामले 3 साल से ज़्यादा समय से जांच के लिए पेंडिंग हैं; इसके बाद पटना, केरल और दिल्ली हाई कोर्ट का नंबर आता है।

यह याचिका 2016 में सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई, जिसमें मांग की गई कि दोषी ठहराए गए लोगों को लेजिस्लेचर (विधायिका), एग्जीक्यूटिव (कार्यपालिका) और जुडिशियरी (न्यायपालिका) से समान रूप से बाहर रखा जाए। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने नेताओं के खिलाफ मामलों की सुनवाई के लिए स्पेशल कोर्ट बनाने के कई निर्देश जारी किए और समय-समय पर इसकी प्रोग्रेस की निगरानी भी की।

Case Details: Ashwini Kumar Upadhyay & Ors. v. Union of India & Ors.|WP 699/2016

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: