'देशभक्ति ज़बरदस्ती नहीं हो सकती': वंदे मातरम विवाद पर संजय हेगड़े ने सुप्रीम कोर्ट से कहा, CJI ने पूछा- 'क्या राष्ट्रगान के लिए भी नहीं?'

Update: 2026-03-26 04:53 GMT

स्कूलों में राष्ट्रगीत-वंदे मातरम गाने के संबंध में MHA के सर्कुलर की आलोचना करते हुए सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े ने आज सुप्रीम कोर्ट के सामने व्यक्तिगत अंतरात्मा की रक्षा के महत्व पर ज़ोर दिया और तर्क दिया कि "देशभक्ति ज़बरदस्ती नहीं हो सकती"।

इस संबंध में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने सीनियर वकील से सवाल किया कि क्या यही तर्क राष्ट्रगान के संदर्भ में भी लागू होता है।

हेगड़े ने जवाब दिया,

"देशभक्ति अपने आप में ज़बरदस्ती नहीं हो सकती। अगर संविधान का कोई मतलब है, जहां तक किसी व्यक्ति का सवाल है, तो उसे व्यक्तिगत अंतरात्मा की रक्षा करनी होगी। हमारी परंपरा सहिष्णुता सिखाती है।"

CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की एक बेंच मोहम्मद सईद नूरी द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें MHA द्वारा 28 जनवरी को जारी उस सर्कुलर को चुनौती दी गई, जिसमें वंदे मातरम के पूरे छंद गाने और उसके बाद दफ़्तरों और स्कूलों में इसे गाने के लिए जारी प्रोटोकॉल का ज़िक्र था।

दलीलें सुनने के बाद बेंच ने याचिका को समय से पहले दायर की गई याचिका बताकर यह देखते हुए खारिज किया कि सर्कुलर केवल एक सलाह थी और इसने राष्ट्रगीत गाना अनिवार्य नहीं बनाया था।

सुनवाई के दौरान, हेगड़े ने तर्क दिया कि सर्कुलर एकरूपता के लिए खतरा पैदा करता है।

उन्होंने कहा,

"इस देश में हम हर धर्म का सम्मान करते हैं। अगर किसी सलाह को लागू करने की आड़ में लोगों को साथ गाने के लिए मजबूर किया जा सकता है तो हममें से जो नागरिक हैं - चाहे वे किसी भी धर्म के हों या नास्तिक हों - उन्हें 'निष्ठा के सामाजिक प्रदर्शन' में भाग लेने के लिए मजबूर महसूस करना पड़ सकता है, जो उनकी अपनी अंतरात्मा के खिलाफ जाता है..."

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, जो कोर्ट में मौजूद थे लेकिन इस मामले में पेश नहीं हो रहे थे, ने संविधान के अनुच्छेद 51A का हवाला दिया और टिप्पणी की,

"क्या हमें राष्ट्रगीत का सम्मान करने के लिए किसी सलाह की ज़रूरत है?"

इस पर हेगड़े ने जवाब दिया,

"राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत में फ़र्क है! यह (अनुच्छेद 51A) राष्ट्रगीत की बात नहीं करता।"

बेंच ने जब यह टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता को अपने संस्थान में गाना गाने के लिए कोई खास निर्देश नहीं दिया गया तो हेगड़े ने कहा,

"याचिकाकर्ता को एक पल के लिए अलग रख देते हैं। ऐसे बहुत से लोग हैं जिनके अपने कारण हैं। देशभक्ति ज़बरदस्ती नहीं थोपी जा सकती।"

इस पर, CJI ने पूछा,

"क्या राष्ट्रगान के लिए भी इसे ज़बरदस्ती नहीं थोपा जा सकता?"

हेगड़े ने इस सवाल का जवाब देते हुए कहा,

"देशभक्ति अपने आप में ज़बरदस्ती नहीं थोपी जा सकती। अगर संविधान का कोई मतलब होना है... तो उसे व्यक्तिगत अंतरात्मा की रक्षा करनी होगी। हमारी परंपरा सहिष्णुता सिखाती है। अगर कोई ऐसी सलाह है जिसके साथ कोई सज़ा नहीं जुड़ी है तो भी, हुज़ूर, आप मान सकते हैं कि उस सलाह को लागू करने के और भी कई तरीके होते हैं।"

हेगड़े ने दलील दी कि 'राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम' के तहत राष्ट्रगान को कानूनी सुरक्षा मिली हुई, जबकि राष्ट्रगीत के लिए ऐसा कोई कानूनी ढांचा मौजूद नहीं है। CJI ने कहा कि इस दलील पर तब विचार किया जा सकता था, जब 'वंदे मातरम' गाने की कोई ज़बरदस्ती होती। CJI ने यह भी बताया कि इस सलाह में गाना न गाने पर किसी भी तरह की सज़ा का ज़िक्र नहीं है।

जस्टिस बागची ने भी यह टिप्पणी की कि भेदभाव को लेकर याचिकाकर्ता की आशंकाएं "अस्पष्ट" थीं। आखिरकार, इस याचिका को "समय से पहले" बताते हुए खारिज किया गया।

संक्षेप में कहें तो याचिकाकर्ता ने MHA के 28.01.2026 के सर्कुलर को चुनौती दी थी, जिसमें यह बताया गया कि सार्वजनिक कार्यक्रमों और शिक्षण संस्थानों में 'वंदे मातरम' को किस तरह बजाया या गाया जाना चाहिए।

याचिकाकर्ता ने यह दावा किया कि इस सर्कुलर में दिए गए निर्देशों ने एक ऐसा ढांचा तैयार कर दिया, जिसके तहत राष्ट्रगीत गाने में हिस्सा लेना स्कूल की गतिविधियों का एक ज़रूरी हिस्सा बन गया। व्यवहार में यह आशंका जताई गई कि अगर छात्र, शिक्षक या शिक्षण संस्थान इसमें हिस्सा नहीं लेते हैं तो उन्हें दबाव, अनुशासनात्मक कार्रवाई और/या सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ सकता है।

याचिका में कहा गया,

"इसलिए इन निर्देशों का असर यह होगा कि नागरिकों को—खास तौर पर अल्पसंख्यक धर्मों या एकेश्वरवादी आस्थाओं को मानने वालों को—एक ऐसी मुश्किल स्थिति में डाल दिया जाएगा, जहां उन्हें या तो अपनी अंतरात्मा, आस्था या धर्म के विपरीत जाकर गाना गाना पड़ेगा, या फिर उन्हें एक राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान करने वाला समझा जाने का जोखिम उठाना पड़ेगा।"

याचिकाकर्ता ने आगे यह भी बताया कि संविधान का अनुच्छेद 51A(a) (जो नागरिकों के मूल कर्तव्यों को बताता है) यह अपेक्षा करता है कि संविधान, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान किया जाए। लेकिन, इसमें राष्ट्रगीत का कोई ज़िक्र नहीं है। याचिकाकर्ता ने 'बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य' मामले में दिए गए फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने यह माना था कि स्कूल के तीन छात्रों को—जो राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े तो हुए, लेकिन अपनी धार्मिक आस्था और अंतरात्मा के आधार पर (क्योंकि वे 'यहोवा के साक्षी' थे) इसे गाने से इनकार कर दिया था—इसे गाने में शामिल होने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

उठाए गए कुछ आधार निम्नलिखित थे:

- इस सर्कुलर ने अनुच्छेद 25 के तहत अंतरात्मा की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार और धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने और उसका पालन करने के अधिकार का उल्लंघन किया, क्योंकि इसमें शामिल गीत के आधिकारिक संस्करण में ऐसी भक्तिपूर्ण भाषा और आह्वान का प्रयोग किया गया, जो किसी विशेष धार्मिक प्रतिमा या प्रतीक से जुड़े थे। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि इससे विशेष रूप से एकेश्वरवादी धर्मों के अनुयायियों के लिए कठिनाई उत्पन्न हुई, जहां ईश्वर के अलावा किसी अन्य सत्ता के प्रति श्रद्धा रखना वर्जित है।

- इस सर्कुलर ने 'बाध्य अभिव्यक्ति' (Compelled Expression) का मार्ग प्रशस्त किया, जिससे अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन हुआ। इसमें दिए गए निर्देशों ने संगठित सामूहिक गायन के माध्यम से किसी विशेष रचना के संस्थागत सस्वर पाठ को प्रोत्साहित किया, जबकि यह अभिव्यक्ति शायद उन लोगों की धार्मिक मान्यताओं को प्रतिबिंबित न करती हो।

- यह सर्कुलर 'बिजो इमैनुएल मामले' में दिए गए निर्णय के विपरीत था। यदि संविधान राष्ट्रगान न गाने के अधिकार की रक्षा करता है तो इसका स्वाभाविक निष्कर्ष यह निकलता है कि नागरिकों को राष्ट्रीय गीत के सस्वर पाठ में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता; विशेष रूप से तब, जब राष्ट्रीय गीत के साथ राष्ट्रगान जैसा कोई तुलनीय वैधानिक ढाँचा या कानूनी बाध्यता जुड़ी हुई न हो।

- इस सर्कुलर ने धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्धता को कमज़ोर किया और शैक्षणिक संस्थानों की विशेष स्थिति को मान्यता नहीं दी; ऐसे संस्थान जहां राज्य का यह एक बढ़ा हुआ दायित्व होता है कि वह अंतरात्मा की स्वतंत्रता और बौद्धिक स्वायत्तता का सम्मान करे।

Case Details: MUHAMMED SAYEED NOORI Versus UNION OF INDIA AND ORS., W.P.(C) No. 341/2026

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