सुप्रीम कोर्ट में पटना हाईकोर्ट के फ़ैसला का ज़िक्र, जिसमें कहा गया- 'सलवार उतारना और छाती दबाना' रेप की कोशिश नहीं

Update: 2026-07-14 14:54 GMT

सीनियर वकील शोभा गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट के सामने पटना हाईकोर्ट के आदेश का ज़िक्र किया। इस आदेश में कहा गया कि किसी महिला की सलवार उतारने की कोशिश करने और उसकी छाती दबाकर छेड़छाड़ करने के आरोप 'रेप की कोशिश' (attempt to rape) के दायरे में नहीं आते।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फ़ैसले पर स्वतः संज्ञान (suo motu) लेते हुए सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच को इस आदेश के बारे में बताया गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फ़ैसले में कहा गया कि नाबालिग लड़की के ब्रेस्ट पकड़ना, उसके पजामे का नाड़ा खोलना और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश करना 'रेप की कोशिश' के अपराध में नहीं आता।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उस मामले में कहा कि ये हरकतें प्रथम दृष्टया (prima facie) 'प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन फ़्रॉम सेक्सुअल ऑफ़ेंस' एक्ट (POCSO Act), 2012 के तहत 'एग्रवेटेड सेक्सुअल असॉल्ट' (गंभीर यौन उत्पीड़न) का अपराध हैं, जिसमें सज़ा कम होती है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर बड़े पैमाने पर नाराज़गी के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्वतः संज्ञान लिया था और बाद में इसे रद्द किया। सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी से नई गाइडलाइंस बनाने का भी आग्रह किया ताकि जजों को यौन अपराधों से संवेदनशील तरीके से निपटने में मदद मिल सके।

मंगलवार, गुप्ता ने सीनियर वकील एच.एस. फूलका के साथ कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर स्वतः संज्ञान लेने और उसे फरवरी में रद्द करने के बावजूद, हाल ही में पटना हाईकोर्ट ने भी मिलते-जुलते तथ्यों और टिप्पणियों के साथ ऐसा ही आदेश पारित किया।

गुप्ता ने कहा,

"दुर्भाग्य से, पटना हाईकोर्ट ने हाल ही में मिलते-जुलते तथ्यों पर ऐसा ही आदेश पारित किया, जबकि इस कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया। इसकी जानकारी एक सोशल मीडिया वेबसाइट पर दी गई थी। चिंता की बात यह है कि ऐसा बार-बार हो रहा है।"

इसके जवाब में CJI ने फ़ैसला सुनाने से पहले पूरी रिसर्च न होने पर अफ़सोस जताया और कहा कि बेंच पटना हाईकोर्ट के फ़ैसले पर एक विस्तृत आदेश पारित करेगी।

इसके अलावा, कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी की एक्सपर्ट कमेटी द्वारा पेश की गई रिपोर्ट को मंज़ूरी दी, जिसमें यौन अपराध के मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता पर गाइडलाइंस शामिल हैं। कोर्ट ने देश की सभी अदालतों को निर्देश दिया कि वे आज मंज़ूर की गई हैंडबुक/गाइडलाइंस में इस्तेमाल की गई बातों का सख्ती से पालन करें। कोर्ट के आदेश के अनुसार, मंज़ूर की गई गाइडलाइंस/हैंडबुक को सुप्रीम कोर्ट, सभी हाईकोर्ट और ज़िला अदालतों (जहां ऐसी वेबसाइटें मौजूद हैं) की वेबसाइटों पर अपलोड किया जाएगा। इन्हें नेशनल और सभी स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमी, साथ ही नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज़ और दूसरी यूनिवर्सिटीज़ के लॉ विभागों में भी भेजा जाएगा।

आदेश में कहा गया,

"सभी राज्यों के प्रॉसिक्यूशन डायरेक्टर और डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस को भी निर्देश दिया गया कि वे सभी पुलिस स्टेशनों को ज़रूरी निर्देश जारी करें कि FIR दर्ज करते समय या चार्जशीट दाखिल करते समय हैंडबुक में दी गई बातों का पालन किया जाए।"

CJI ने कहा,

"कमेटी ने बहुत अच्छा काम किया।"

बाद में यह भी जोड़ा गया कि मंज़ूर की गई गाइडलाइंस को न्यायिक आदेश का हिस्सा बनाया जाएगा।

इस साल फरवरी में, कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी को निर्देश दिया था कि वह यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक कार्यवाही के दौरान संवेदनशीलता और सहानुभूति लाने के लिए व्यापक ड्राफ्ट गाइडलाइंस तैयार करे। कोर्ट ने ज़ोर दिया कि ऐसे नियम भारत के सामाजिक ताने-बाने को दर्शाने वाले होने चाहिए, न कि विदेशी कानूनों से लिए गए हों।

इसलिए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी, भोपाल के डायरेक्टर जस्टिस अनिरुद्ध बोस से विशेषज्ञों की कमेटी बनाने का अनुरोध किया। यह कमेटी "यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों के संदर्भ में जजों और न्यायिक प्रक्रियाओं में संवेदनशीलता और सहानुभूति लाने के लिए गाइडलाइंस विकसित करने" पर विचार-विमर्श करेगी।

आदेश में कहा गया,

"ऐसे कई आपत्तिजनक शब्द और वाक्यांश हैं, जिनका इस्तेमाल हमारे दंड कानूनों के तहत आम तौर पर अपराध माना जाएगा, लेकिन हमारे समाज के लोग स्थानीय बोलियों में खुलेआम इनका इस्तेमाल करते हैं। ऐसा शायद इसलिए होता है क्योंकि उन्हें इन बातों के आपत्तिजनक होने की स्पष्ट समझ नहीं होती। अगर कमेटी अपनी रिपोर्ट के हिस्से के तौर पर अलग-अलग भाषाओं से ऐसे शब्दों/वाक्यांशों की पहचान कर उन्हें संकलित कर सके तो यह बहुत सराहनीय होगा। इससे वे शब्द नज़रअंदाज़ नहीं होंगे और शिकायतकर्ता/पीड़ित अपने साथ हुए आघात (ट्रॉमा) का बेहतर और पूरा विवरण देने में सक्षम हो सकेंगे।"

Case Title: IN RE: ORDER DATED 17.03.2025 PASSED BY THE HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD IN CRIMINAL REVISION NO. 1449/2024 AND ANCILLARY ISSUES | SMW(Crl) No. 1/2025

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