सबरीमाला फ़ैसले पर पुनर्विचार नहीं होगा, सिर्फ़ संवैधानिक सवालों पर विचार होगा: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (7 अप्रैल) सबरीमाला मंदिर से जुड़े मामले की सुनवाई शुरू की। इस मामले में क़ानून से जुड़े कई बड़े सवाल उठाए गए, जिनमें धार्मिक संप्रदाय और ज़रूरी धार्मिक प्रथाओं से जुड़े सवाल भी शामिल हैं।
बहस की शुरुआत सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने की। उन्होंने केंद्र सरकार का पक्ष साफ़ करते हुए कहा कि 2018 का सबरीमाला फ़ैसला, जिसमें सभी वर्गों की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई, ग़लत था। हालांकि, बेंच ने कहा कि चूंकि मौजूदा मामले का दायरा अनुच्छेद 25 (अंतरात्मा की स्वतंत्रता और धर्म को मानने, उसका आचरण करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 26 (धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता) की व्याख्या से जुड़ा है, इसलिए सबरीमाला फ़ैसले के गुण-दोष की जांच नहीं की जाएगी।
सुनवाई शुरू होने से पहले मूल याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सीनियर वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि उनकी समझ के अनुसार, नौ जजों की बेंच समीक्षा याचिकाओं की जांच नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि समीक्षा याचिकाओं पर फ़ैसला अलग से पांच जजों की बेंच द्वारा तब किया जाएगा, जब इस मामले से जुड़े सवालों के जवाब मिल जाएंगे।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) ने संकेत दिया कि जयसिंह की समझ सही है। उन्होंने यह भी कहा कि समीक्षा याचिकाओं का भविष्य अंततः इस बात पर निर्भर कर सकता है कि इस मामले से जुड़े सवालों के क्या जवाब दिए जाते हैं।
क्या अनुच्छेद 25 में लैंगिक समानता शामिल है?
मेहता ने कोर्ट के सामने अनुच्छेद 25 और 26 पर संविधान सभा में हुई बहसों का ज़िक्र किया।
उन्होंने तर्क दिया कि भारत में धर्म का दायरा बहुत विशाल है, क्योंकि इसके भीतर कई उप-संप्रदाय मौजूद हैं, जो देश की आंतरिक विविधता को दर्शाते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि सबरीमाला फ़ैसले में अनुच्छेद 25 में इस्तेमाल किए गए शब्दों 'समान रूप से हकदार' की ग़लत व्याख्या की गई। इसमें लैंगिक समानता को भी शामिल कर लिया गया। उन्होंने कहा कि लैंगिक समानता का ध्यान अनुच्छेद 14 और 15 में रखा गया। वहीं, अनुच्छेद 25 में ये शब्द उस समय की मौजूदा वास्तविकताओं—जैसे विभाजन, दंगे और हिंसा—की पृष्ठभूमि में जोड़े गए।
उन्होंने कहा,
"कुछ संप्रदाय और संप्रदाय से जुड़ी प्रथाएं हो सकती हैं, जिनका हमें सम्मान करना चाहिए। हर चीज़ को मानवीय गरिमा या शारीरिक स्वतंत्रता से नहीं जोड़ा जा सकता। अगर मैं किसी मज़ार या गुरुद्वारे में जाता हूं और मुझे अपना सिर ढकना पड़ता है, तो मैं यह नहीं कह सकता कि आप मेरी गरिमा, अधिकार या पसंद छीन रहे हैं। सबरीमाला मामले में भी यही बात कही गई—कि आपकी पसंद का अधिकार छीना जा रहा है। यह स्वायत्तता छीनना नहीं है, बल्कि उस धर्म की आस्था और विश्वास का सम्मान करना है।"
इसी तरह, उन्होंने अनुच्छेद 17 के विस्तार पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें यह कहा गया कि मासिक धर्म से गुज़र रही महिलाओं के साथ भेदभाव करना अस्पृश्यता के बराबर है। उन्होंने तर्क दिया कि अनुच्छेद 17 को संविधान में समाज में व्याप्त जाति-आधारित भेदभाव को दूर करने के लिए जोड़ा गया।
"सबरीमाला मामले में यह तर्क दिया गया कि हिंदुओं के सभी वर्गों को इसलिए शामिल किया गया था ताकि यह लिंग-विशिष्ट (Gender-Specific) बन सके। हालांकि, यह लिंग-विशिष्ट नहीं है। मुझे खेद है, सबरीमाला मामले में एक राय यह थी कि अनुच्छेद 17 महिलाओं पर भी लागू होता है—कि आप महिलाओं के साथ अस्पृश्य जैसा व्यवहार कर रहे हैं। यह केवल एक राय है—जिस पर मुझे कड़ी आपत्ति है। 'सभी वर्गों' का संदर्भ जाति से था, न कि लिंग से। भारत उतना पितृसत्तात्मक या लिंग-रूढ़िवादी समाज नहीं है जैसा कि पश्चिमी दुनिया समझती है।"
जस्टिस नागरत्ना ने जवाब दिया कि उन्हें यह समझ नहीं आता कि मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश के संदर्भ में अस्पृश्यता का तर्क कैसे दिया जा सकता है।
इसी संदर्भ में उन्होंने यह बताया कि अनुच्छेद 26 में न केवल 'संप्रदाय' (Denomination) शब्द का उपयोग किया गया, बल्कि 'उसके वर्गों' (Sections Thereof) का भी उल्लेख है। उन्होंने कहा कि 2018 के सबरीमाला फैसले में 'उसके वर्गों' वाले पहलू पर विचार नहीं किया गया। उन्होंने निज़ामुद्दीन औलिया दरगाह या शिरडी मंदिर का उदाहरण देते हुए कहा कि इन स्थानों पर सभी धर्मों के लोग जाते हैं; उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सिर्फ इसलिए कि वहां सभी वर्गों के लोगों का स्वागत होता है, वे स्थान अब 'संप्रदाय-विशिष्ट' (Denominational) नहीं रह जाएंगे?
न्यायालय किस हद तक हस्तक्षेप कर सकता है?
इसके बाद मेहता ने 'दरगाह कमेटी फैसले' का ज़िक्र किया और कहा कि इसी फैसले ने 'आवश्यक धार्मिक प्रथा' (ERP) के विवादास्पद सिद्धांत को जन्म दिया। उन्होंने कहा कि न्यायालय ऐसे सवालों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते।
इस पर जस्टिस बागची ने 'साक्ष्य अधिनियम' (Evidence Act) का उदाहरण देते हुए कहा कि न्यायालयों के पास विशेषज्ञ गवाहों की गवाही की जांच करने का अधिकार होता है, भले ही वे स्वयं विज्ञान के क्षेत्र में विशेषज्ञ न हों।
उन्होंने कहा,
"अगर आपकी बात को तार्किक निष्कर्ष तक ले जाया जाए तो अदालतें असल में विज्ञान की विशेषज्ञ नहीं होतीं; लेकिन 'साक्ष्य अधिनियम' (Evidence Act) अदालतों को विशेषज्ञों की राय की जांच करने का अधिकार देता है। इस तरह अदालतें 'विशेषज्ञों की भी विशेषज्ञ' बन जाती हैं। कानून में एक ऐसा प्रावधान भी है, जो अदालत को कुछ निष्पक्ष मापदंडों का इस्तेमाल करके यह सही और व्यक्तिपरक फैसला लेने की अनुमति देता है कि क्या ये वाकई लंबे समय से चली आ रही प्रथाएं या रीति-रिवाज हैं या नहीं।"
इस पर जस्टिस सुंदरेश ने कहा कि एकमात्र अंतर यह है कि विज्ञान तर्क पर आधारित है। इसलिए यह तर्क दिया जा सकता है कि धर्म की ऐसी कोई निश्चित सीमाएं नहीं होतीं, क्योंकि धर्म आस्था पर आधारित होता है।
आस्था से जुड़े मामलों में न्यायिक पुनर्विचार की अदालत की सीमित शक्ति पर मेहता के तर्क के जवाब में जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत यह सवाल नहीं उठा रही है कि आस्था मौजूद है या नहीं, बल्कि यह देख रही है कि उस आस्था को किस तरह से समझा जा रहा है।
उन्होंने टिप्पणी की:
"आस्था के बारे में राय और जिस आस्था को समझा जाता है, उन दोनों में अंतर होता है। किसी व्यक्ति की कोई विशेष आस्था हो सकती है, लेकिन उस संप्रदाय में कोई विशेष राय मौजूद है या नहीं, यह इस बात की जांच से अलग है कि वह आस्था स्वयं क्या है। धार्मिक प्रमुख कहते हैं कि यह मेरी आस्था है, और अनुयायी उसका पालन करते हैं। धार्मिक प्रमुख द्वारा यह कहना कि 'यह मेरी आस्था है', यह एक ऐसा विषय है जो अदालत के अधिकार क्षेत्र में आता है, जहाँ अदालत उचित फोरेंसिक मापदंड या उपकरण लागू कर सकती है; लेकिन वह आस्था वास्तव में मौजूद है या नहीं, इसका निर्णय धार्मिक प्रमुख को ही करना होता है।"
अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या
सुनवाई के दौरान, एक समय जस्टिस बागची ने पूछा कि क्या मेहता यह तर्क दे रहे हैं कि अनुच्छेद 26(b) अनुच्छेद 25 पर भारी पड़ता है (यानी उसे प्राथमिकता मिलती है)?
इस पर एसजी (सॉलिसिटर जनरल) ने कहा कि अनुच्छेद 26 को एक अलग 'द्वीप' (अलग-थलग इकाई) के रूप में नहीं देखा जा सकता, जो संविधान के भाग III के अन्य प्रावधानों से पूरी तरह कटा हुआ हो। उन्होंने कहा कि इसे इतनी ऊंची स्थिति पर नहीं रखा जा सकता, लेकिन इसे इतना व्यापक अर्थ भी नहीं दिया जा सकता कि इसमें लैंगिक समानता का विषय भी शामिल हो जाए।
उन्होंने कहा,
"अनुच्छेद 26(b) कोई अलग-थलग द्वीप नहीं है; इसे अनुच्छेद 25 और संविधान के अन्य भागों के साथ मिलाकर ही पढ़ा जाना चाहिए।"
जस्टिस बागची ने एक महत्वपूर्ण बात की ओर ध्यान दिलाया कि जहां अनुच्छेद 25(1) में "सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य तथा इस भाग के अन्य प्रावधानों के अधीन" शब्दों का प्रयोग किया गया, वहीं अनुच्छेद 26 में केवल "सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता के अधीन" कहा गया। इसका अर्थ यह है कि जहाँ अनुच्छेद 25 अन्य प्रावधानों के अधीन हो सकता है, वहीं अनुच्छेद 26 शायद न हो। उन्होंने आगे कहा कि अदालत इस बात से पूरी तरह अवगत है कि इसे अन्य प्रावधानों के साथ "संगत" (Compatible) होना होगा।
मेहता ने जवाब दिया कि अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या किसी खास मकसद को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए।
सबरीमाला मामले के गुण-दोष पर विचार नहीं किया जा सकता
सुनवाई के दौरान एक समय, जब कोर्ट अनुच्छेद 17 पर चर्चा कर रहा था, जस्टिस सुंदरेश ने कहा कि कोर्ट को सबरीमाला फैसले पर विस्तार से जाने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि वह इस मामले की समीक्षा (Review) नहीं कर रहा है।
यह तब हुआ जब जस्टिस नागरत्ना पूछ रही थीं कि अनुच्छेद 26 सबरीमाला मामले पर कैसे लागू होता है।
एसजी मेहता ने जवाब दिया कि 2018 के फैसले में यह माना गया कि भगवान अयप्पा कोई धार्मिक संप्रदाय नहीं हैं, इसलिए उन्हें अनुच्छेद 26(b) के तहत सुरक्षा नहीं मिल सकती।
इस पर जस्टिस सुंदरेश ने कहा:
"हमें सबरीमाला मामले में जाने की ज़रूरत नहीं है। अनुच्छेद 25 सार्वजनिक प्रकृति वाले हिंदू मंदिरों पर लागू होता है और अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों से संबंधित है। दोनों में एकमात्र समानता यह है कि दोनों ही सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन हैं।"
एसजी मेहता ने स्पष्ट किया कि वह सबरीमाला फैसले की समीक्षा पर बहस नहीं करेंगे, लेकिन उन्होंने आगे कहा:
"शिरूर मठ मामले से शुरू हुई न्यायिक विकास की यात्रा सबरीमाला पर आकर समाप्त होती है। इस प्रक्रिया को समझाने के लिए मैं उस फैसले का ज़िक्र करूंगा।"
तब CJI ने कहा:
"नौ जजों की पीठ के समक्ष आए इस संदर्भ (Reference) में सात सवालों में से सवाल संख्या दो और तीन सीधे तौर पर अनुच्छेद 26 से संबंधित हैं। इसलिए मूल रूप से दोनों पक्षों को अनुच्छेद 26 पर भी अपनी दलीलें पेश करनी होंगी। संभवतः हमें भी इस पर अपना जवाब देना होगा। अतः, अंततः, किसी विशेष मामले का फैसला करते समय इसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ भी सकता है और नहीं भी; लेकिन इस अनुच्छेद का वास्तविक अर्थ और दायरा क्या है—संभवतः हमें इस पहलू पर विस्तार से विचार करना होगा।"
एसजी मेहता ने कहा कि वह इस बात पर बहस नहीं करेंगे कि सबरीमाला का फैसला सही था या गलत; लेकिन इस विषय पर न्यायिक नीति के विकासक्रम को स्पष्ट करने के लिए उन्हें कोर्ट के समक्ष उस फैसले का ज़िक्र करना ही होगा।
CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ—जिसमें जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्य बागची शामिल है—ने इस संदर्भ पर सुनवाई की।
बहस आज (बुधवार) भी जारी रहेगी।
Case Title: KANTARU RAJEEVARU Versus INDIAN YOUNG LAWYERS ASSOCIATION THR.ITS GENERAL SECRETARY MS. BHAKTI PASRIJA AND ORS., R.P.(C) No. 3358/2018 in W.P.(C) No. 373/2006