राम मंदिर ट्रस्ट को 'पब्लिक ट्रस्ट' के तौर पर फिर से बनाया जाए: निर्मोही अखाड़े ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की याचिका

Update: 2026-07-18 16:30 GMT

निर्मोही अखाड़े ने सुप्रीम कोर्ट से 'श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट' (जो अयोध्या राम मंदिर का मैनेजमेंट करता है) के पुनर्गठन के लिए निर्देश देने की मांग की। अखाड़े का तर्क है कि ट्रस्ट का मौजूदा स्वरूप सुप्रीम कोर्ट के 2019 के अयोध्या फैसले की भावना के खिलाफ है और इसमें जवाबदेही की कमी है।

यह मिसलेनियस एप्लीकेशन (विविध याचिका) अयोध्या टाइटल विवाद की उस कार्यवाही में दायर की गई, जिसका निपटारा हो चुका है। इसमें संविधान पीठ द्वारा 9 नवंबर, 2019 के फैसले में दिए गए निर्देशों को लागू करने की मांग की गई। अखाड़े का कहना है कि फैसले में मंदिर के मैनेजमेंट में उसकी "उचित भूमिका" की परिकल्पना की गई थी, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा बनाई गई योजना ने उसे ट्रस्ट के कामकाज और धार्मिक कार्यों, दोनों से ही बाहर कर दिया।

यह याचिका 'श्री पंच रामानंदी निर्मोही अखाड़ा' की ओर से उसके सरपंच, महंत और सर्वाकार, महंत राजा रामचंद्रचार्य अतीत गुरु रघुनाथ दास ने दायर की। उनका दावा है कि उन्हें 5 जुलाई, 2026 के एक प्रस्ताव के जरिए नियुक्त और मान्यता दी गई। याचिका में कहा गया कि अखाड़ा एक 'पंचायती मठ' है, जिसके फैसले उसकी पंचायत द्वारा लोकतांत्रिक प्रक्रिया से लिए जाते हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि वह अयोध्या टाइटल विवाद में मुख्य पक्षों में से एक था।

याचिका के अनुसार, ट्रस्ट सुप्रीम कोर्ट के फैसले की मंशा के विपरीत बिना किसी प्रभावी कानूनी निगरानी के एक "प्राइवेट ट्रस्ट" के तौर पर काम कर रहा है। इसमें ट्रस्ट को 'पब्लिक ट्रस्ट' के तौर पर फिर से बनाने और इसके कामकाज में पारदर्शिता व जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक स्वतंत्र निगरानी तंत्र बनाने की मांग की गई।

अखाड़े ने कोर्ट से आग्रह किया कि वह केंद्र सरकार को ट्रस्ट डीड में उचित संशोधन करने और 'बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज' का पुनर्गठन करने का निर्देश दे। इसमें 'रामानंदी बैरागी संप्रदाय' के सदस्यों वाला एक निगरानी बोर्ड शामिल करने की बात कही गई। साथ ही यह भी मांग की गई है कि ट्रस्टियों का चयन "उच्च ईमानदारी" वाले उन लोगों में से किया जाए जिनका श्री राम जन्मभूमि या रामानंदी परंपराओं से ऐतिहासिक, कानूनी या धार्मिक संबंध रहा हो।

इस अर्ज़ी में निर्मोही अखाड़े की उस पारंपरिक भूमिका को बहाल करने की मांग की गई, जिसके तहत वह राम मंदिर में लंबे समय से चली आ रही रामानंदी परंपराओं के अनुसार अनुष्ठान, सेवा, भोग, पूजा और अन्य धार्मिक समारोहों का संचालन और देखरेख करता रहा है। इसमें तर्क दिया गया कि ट्रस्ट ने उस जगह पर चली आ रही ऐतिहासिक धार्मिक प्रथाओं को नज़रअंदाज़ किया है और अखाड़े को उस प्रतिनिधि भूमिका से वंचित किया है जिसकी परिकल्पना 2019 के फैसले में की गई।

भक्तों के चढ़ावे की चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के हालिया आरोपों का ज़िक्र करते हुए अखाड़े का कहना है कि ट्रस्ट के कामकाज में जवाबदेही की भारी कमी दिखी। इसने एक स्वतंत्र समिति नियुक्त करने की मांग की, जो यह जांच करे कि क्या केंद्र ने 2019 के फैसले को ईमानदारी से लागू किया। साथ ही ट्रस्ट के वित्तीय और संपत्ति-संबंधी लेन-देन का फॉरेंसिक ऑडिट कराने का भी अनुरोध किया।

एक और अहम मांग में अखाड़ा श्री राम लल्ला विराजमान की मूल मूर्तियों को बहाल करने की मांग कर रहा है। उसका दावा है कि 5 जनवरी 1950 और 16 फरवरी 1982 को गर्भगृह से हटाई गई इन मूर्तियों को बदलने या उनकी जगह दूसरी मूर्तियां लगाने का ट्रस्ट के पास कोई कानूनी अधिकार नहीं था। वैकल्पिक रूप से, वह मूल मूर्तियों को उनकी उचित देखभाल के लिए अखाड़े को सौंपने की मांग करता है।

इस अर्ज़ी में एक स्वतंत्र समिति नियुक्त करने की भी मांग की गई, जो यह जांच करे कि क्या सुप्रीम कोर्ट के 9 नवंबर 2019 के फैसले में दिए गए निर्देशों को ट्रस्ट ने ईमानदारी से लागू किया। इसमें मौजूदा बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टीज़ द्वारा किए गए सभी वित्तीय और संपत्ति-संबंधी लेन-देन का फॉरेंसिक ऑडिट करने के लिए एक फॉरेंसिक ऑडिटर नियुक्त करने का भी अनुरोध किया गया।

निर्मोही अखाड़ा रामानंदी बैरागी परंपरा से जुड़ा सदियों पुराना धार्मिक संप्रदाय है। इसने देवता राम लल्ला विराजमान के 'शेबैत' (प्रबंधक और संरक्षक) होने का दावा किया और अयोध्या मालिकाना हक विवाद में मुकदमा नंबर 3 दायर किया, जिसमें राम जन्मभूमि मंदिर के प्रबंधन और नियंत्रण की मांग की गई। 9 नवंबर 2019 के अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने समय-सीमा (लिमिटेशन) के आधार पर अखाड़े का मुकदमा खारिज कर दिया था, लेकिन विवादित स्थल के साथ उसके लंबे जुड़ाव को स्वीकार किया।

संविधान पीठ ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए केंद्र सरकार को मंदिर के प्रबंधन के लिए एक ट्रस्ट बनाने की योजना तैयार करने का निर्देश दिया। साथ ही, अदालत ने खास तौर पर कहा कि "केंद्र सरकार को जैसा उचित लगे, उस तरह से ट्रस्ट या संस्था में निर्मोही अखाड़े को उचित प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है।"

अदालत ने यह भी माना कि 1993 में विवादित जगह के अधिग्रहण से पहले बाहरी आंगन में पूजा-पाठ और प्रबंधन की जिम्मेदारी अखाड़े के पास थी, और कहा कि योजना बनाते समय अखाड़े की ऐतिहासिक भूमिका पर उचित ध्यान दिया जाना चाहिए।

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