कानून आलसियों का साथ नहीं देता: सुप्रीम कोर्ट ने 21 साल की देरी के बाद शुरू की गई मध्यस्थता प्रक्रिया रद्द की

Update: 2026-04-14 16:21 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पश्चिम बंगाल राज्य और एक ठेकेदार के बीच चल रही मध्यस्थता (Arbitration) की कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने माना कि यह दावा पहली नज़र में ही समय-सीमा से बाहर (Time Barred) था, क्योंकि मध्यस्थता शुरू करने का नोटिस काम पूरा होने के 21 साल बाद जारी किया गया।

कोर्ट ने कहा,

"हालांकि मध्यस्थता विवादों को सुलझाने का वैकल्पिक तरीका है, जिसे बढ़ावा दिया जाना चाहिए, लेकिन यह उस मूल सिद्धांत से भटक नहीं सकता कि कानून मेहनती लोगों का साथ देता है, न कि आलसियों का।"

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच एक ऐसे अनुबंध से जुड़े विवाद की सुनवाई कर रही थी, जिसमें काम 30 जुलाई, 2000 को पूरा हो गया। ठेकेदार ने मध्यस्थता शुरू करने का नोटिस 02 जून, 2022 को ही जारी किया।

कलकत्ता हाईकोर्ट ने मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए समझौते की एक शर्त में अस्पष्टता पाई थी।

हाईकोर्ट ने माना था कि चूंकि प्रभारी इंजीनियर (Engineer-in-Charge) ने अंतिम देय राशि तय करने वाला कोई प्रमाण पत्र जारी नहीं किया। 04 जनवरी, 2001 के एक पत्र में केवल आंशिक भुगतान का ही ज़िक्र था, इसलिए इस विवाद को अभी भी मध्यस्थता के लिए भेजा जा सकता है। हाईकोर्ट ने यह भी माना था कि समय-सीमा (Limitation) इस दावे में बाधा नहीं बनेगी, क्योंकि अंतिम माप और निर्धारण अभी तक नहीं हुआ था।

राज्य सरकार ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। ​​सुप्रीम कोर्ट ने 'आरिफ अज़ीम कंपनी लिमिटेड बनाम एपटेक लिमिटेड' मामले में तय किए गए सिद्धांतों की जांच की। उस मामले में यह माना गया कि समय-सीमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act, 1963) मध्यस्थता की कार्यवाही पर लागू होता है। अनुच्छेद 137, धारा 11(6) के तहत मध्यस्थ की नियुक्ति के लिए दिए गए आवेदनों पर लागू होता है।

कोर्ट ने गौर किया कि जहां धारा 11 के तहत याचिका दायर करने की समय-सीमा, मध्यस्थता शुरू करने का नोटिस मिलने के 30 दिन पूरे होने के बाद से तीन साल होती है, वहीं मूल दावे (Substantive Claim) के लिए समय-सीमा अलग होती है, और उसे भी पूरा किया जाना ज़रूरी है। पिछले फैसलों का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि अदालतों को पहली नज़र में ही उन दावों को खारिज कर देना चाहिए, जिनकी समय-सीमा बीत चुकी हो, ताकि पक्षों को समय लेने वाली मध्यस्थता की प्रक्रिया में न उलझना पड़े।

कोर्ट ने फैसला सुनाया कि मौजूदा मामले में किसी भी विस्तृत साक्ष्य-आधारित जांच की कोई ज़रूरत नहीं थी। 04 जनवरी, 2001 के पत्र-व्यवहार के बाद ठेकेदार ने मध्यस्थता नोटिस जारी करने से पहले 21 वर्षों तक कोई कदम नहीं उठाया।

न्यायालय ने कहा,

“हालांकि, इस मामले में किसी भी तरह की जटिल साक्ष्य-संबंधी जांच की आवश्यकता नहीं है। 04.01.2001 के अनुबंध पी9 के बाद—चाहे वह बकाया राशि का अंतरिम निर्धारण हो या नहीं—अपीलकर्ता 21 वर्षों तक अपने दावे पर निष्क्रिय रहा, जिसके बाद 02.06.2022 को मध्यस्थता की मांग करते हुए नोटिस जारी किया गया। यह दावा प्रथम दृष्टया (Ex-Facie) ही समाप्त हो चुका था।”

न्यायालय ने आगे यह भी कहा कि यद्यपि मध्यस्थता को विवाद समाधान के एक वैकल्पिक तंत्र के रूप में प्रोत्साहित किया जाता है। फिर भी यह परिसीमा (Limitation) के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं कर सकती। न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि मध्यस्थता अधिनियम की धारा 43, मध्यस्थता की कार्यवाहियों पर परिसीमा अधिनियम को लागू करती है। धन की वसूली के लिए परिसीमा अधिनियम का अनुच्छेद 18 तीन वर्षों की परिसीमा अवधि निर्धारित करता है।

न्यायालय ने हाईकोर्ट के इस तर्क को अस्वीकार किया कि 'इंजीनियर-इन-चार्ज' द्वारा अंतिम बिल का निर्धारण न कर पाने के कारण परिसीमा की अवधि बढ़ गई। न्यायालय ने यह माना कि यदि ऐसी कोई चूक हुई भी थी, तो ठेकेदार को उसी समय मध्यस्थता का सहारा लेना चाहिए था। ठेकेदार ने न तो कोई अंतिम बिल प्रस्तुत किया और न ही वर्ष 2022 तक मध्यस्थता का आह्वान करने वाला कोई नोटिस ही जारी किया।

यह मानते हुए कि मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू करने वाला आदेश बरकरार रखने का कोई औचित्य नहीं था, न्यायालय ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया।

Case Title – State of West Bengal & Ors. v. M/S B.B.M. Enterprises

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