सूर्यकांत ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) कितनी भी उन्नत क्यों न हो जाए, वह मानव जज की जगह नहीं ले सकती, क्योंकि उसमें संवेदना, करुणा और जवाबदेही जैसे जरूरी मानवीय गुण नहीं होते।
बेंगलुरु में आयोजित एक सेमिनार को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि न्याय देना केवल गणना का कार्य नहीं बल्कि अंतरात्मा का निर्णय होता है।
उन्होंने कहा,
“कानून सिर्फ नियमों का तंत्र नहीं है, बल्कि निर्णय का तंत्र है और सच्चा निर्णय गणना नहीं बल्कि विवेक का विषय है।"
चीफ जस्टिस ने कहा कि अदालतें रोज ऐसे मामलों का फैसला करती हैं, जो किसी व्यक्ति की आज़ादी, गरिमा और भविष्य से जुड़े होते हैं। इन्हें आंकड़ों या एल्गोरिद्म तक सीमित नहीं किया जा सकता।
उन्होंने स्पष्ट किया कि AI पैटर्न पहचान सकता है जवाब दे सकता है लेकिन मानव पीड़ा को समझ नहीं सकता और न ही अपने निर्णय के लिए जवाबदेह हो सकता है।
उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसा तंत्र स्वीकार्य नहीं हो सकता, जहां किसी व्यक्ति के जीवन या स्वतंत्रता से जुड़ा अंतिम निर्णय किसी मशीन के हाथ में हो।
हालांकि उन्होंने AI की उपयोगिता को भी स्वीकार किया। उनके अनुसार AI न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी बना सकता है, न्याय तक पहुंच आसान कर सकता है और मामलों के निपटारे में तेजी ला सकता है।
उन्होंने बताया कि न्यायपालिका में तकनीक का उपयोग पहले से हो रहा है, जैसे सुवास प्रणाली, जो फैसलों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद करने में मदद करती है। इसके अलावा, AI आधारित डिवाइस जजों को प्रासंगिक कानूनी सामग्री खोजने और मामलों के बेहतर प्रबंधन में भी सहायक हो सकते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि मध्यस्थता और ऑनलाइन विवाद समाधान जैसे क्षेत्रों में AI की भूमिका तेजी से बढ़ रही है, जहां यह पक्षों के बीच सहमति के बिंदु खोजने और समाधान सुझाने में मदद कर सकता है।
हालांकि, उन्होंने सावधानी बरतने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि AI हमेशा सटीक नहीं होता, इसलिए मानव निगरानी जरूरी है।
उन्होंने कहा कि चुनौती यह नहीं है कि AI को अपनाया जाए या नहीं बल्कि यह है कि उसे कैसे जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल किया जाए।
अंत में उन्होंने कहा कि तकनीक न्याय प्रक्रिया को आसान बना सकती है लेकिन न्याय की दिशा तय करने का काम हमेशा मानव विवेक ही करेगा।