सरकारी डॉक्टरों का प्राइवेट प्रैक्टिस करना गंभीर मामला: सुप्रीम कोर्ट ने जांच में दखल देने से किया इनकार

Update: 2026-06-23 04:45 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश में दखल देने से इनकार किया, जिसमें मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज, प्रयागराज से जुड़े सरकारी डॉक्टरों पर प्राइवेट प्रैक्टिस करने (जिस पर रोक है) और सरकारी अस्पताल के बाहर एक समानांतर हेल्थकेयर सिस्टम चलाने के आरोपों की हाई-लेवल जांच का निर्देश दिया गया।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने मेडिकल कॉलेज के सर्जरी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. संतोष कुमार सिंह द्वारा दायर SLP (स्पेशल लीव पिटिशन) को वापस लेने की अनुमति दे दी, क्योंकि वे हाईकोर्ट के आदेश में दखल देने के इच्छुक नहीं है।

डॉ. सिंह की ओर से सीनियर एडवोकेट हर्षवीर प्रताप शर्मा ने तर्क दिया कि वे हाईकोर्ट के सामने चल रही कार्यवाही में पक्षकार नहीं थे और सिंगल जज ने रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए एक FIR पर भरोसा किया, जो उनसे जुड़े एक निजी विवाद से संबंधित थी।

हालांकि, जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि हाईकोर्ट एक बड़े सार्वजनिक मुद्दे पर विचार कर रहा था।

उन्होंने टिप्पणी की,

"यह मकसद बहुत अच्छा है, क्योंकि सरकारी डॉक्टरों को ऐसा नहीं करना चाहिए और आप भी एक डॉक्टर हैं।"

उन्होंने कहा कि कार्यवाही व्यक्तिगत रूप से डॉ. सिंह के खिलाफ नहीं थी, बल्कि सरकारी डॉक्टरों द्वारा प्राइवेट प्रैक्टिस करने के आरोपों से संबंधित थी।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा,

"आपके खिलाफ कुछ भी व्यक्तिगत नहीं है। यह उन सभी डॉक्टरों के लिए है, जो प्राइवेट प्रैक्टिस में शामिल हैं।"

कोर्ट ने बार-बार संकेत दिया कि वह दखल देने का इच्छुक नहीं है। इसके बाद शर्मा ने हाईकोर्ट जाने की छूट के साथ याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी।

बेंच ने कोई विशेष छूट देने से इनकार कर दिया और कहा कि याचिकाकर्ता या तो खारिज करने का आदेश स्वीकार कर सकता है या याचिका वापस ले सकता है। आखिरकार SLP वापस ले ली गई।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने लंबित कार्यवाही से उत्पन्न हुआ, जो मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज और स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल, प्रयागराज की स्थिति से संबंधित थी। PIL (जनहित याचिका) मूल रूप से इन आरोपों पर शुरू हुई कि मेडिकल कॉलेज से जुड़े एक अन्य डॉक्टर ने प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक के बावजूद एक प्राइवेट अस्पताल में मरीजों का इलाज किया।

हाईकोर्ट संस्थान से संबंधित कई अन्य मुद्दों की भी निगरानी कर रहा है, जिसमें स्टूडेंट्स के हॉस्टल की स्थिति और प्रस्तावित पुनर्निर्माण तथा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में देरी शामिल है। कोर्ट ने ध्यान दिया कि कार्डियोलॉजी डिपार्टमेंट की दो मंज़िलों का निर्माण 2006 में काम शुरू होने और राज्य सरकार से फंड मिलने के बावजूद अधूरा पड़ा था।

4 मई, 2026 को हाईकोर्ट ने डॉ. संतोष कुमार सिंह और उनकी पत्नी के खिलाफ दर्ज FIR का संज्ञान लिया। हाईकोर्ट को बताया गया कि डॉ. सिंह की पत्नी प्राइवेट नर्सिंग होम, एक्यूरा हॉस्पिटल की डायरेक्टर थीं, जहां वे कथित तौर पर सर्जरी करते थे। हाई कोर्ट ने कहा कि यह मामला गंभीर चिंता का विषय है।

हाईकोर्ट ने आगे देखा कि मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और लेक्चरर प्राइवेट नर्सिंग होम में प्रैक्टिस करते और प्रयागराज में समानांतर मेडिकल सिस्टम चलाते हुए प्रतीत होते हैं, जिसमें मरीज़ों को कथित तौर पर स्वरूप रानी नेहरू हॉस्पिटल से प्राइवेट जगहों पर शिफ्ट किया जा रहा है।

हाईकोर्ट ने कहा,

"ऐसा लगता है कि मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज और उससे जुड़े स्वरूप रानी नेहरू हॉस्पिटल की हालत इसलिए खराब नहीं हुई कि सरकार की ओर से फंड या सुविधाओं की कमी है, बल्कि मेडिकल बिरादरी ही सरकार के मकसद को पूरा करने में नाकाम हो रही है। प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और लेक्चरर प्राइवेट नर्सिंग होम में प्रैक्टिस कर रहे हैं और प्रयागराज शहर में एक समानांतर मेडिकल इंडस्ट्री चला रहे हैं। ये डॉक्टर सर्जरी कर रहे हैं और उन मरीज़ों को प्राइवेट सेटअप में रख रहे हैं, जिन्हें स्वरूप रानी नेहरू हॉस्पिटल से ट्रांसफर किया गया।"

यह देखते हुए कि पहले भी ऐसे आरोप सामने आए और डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट से मांगी गई रिपोर्ट दाखिल नहीं की गई, हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे उचित कार्रवाई करें और मेडिकल कॉलेज में प्राइवेट प्रैक्टिस में कथित तौर पर शामिल डॉक्टरों के खिलाफ उच्च-स्तरीय जांच शुरू करें। इसने मुख्य सचिव को हॉस्पिटल में निर्माण कार्यों की निगरानी करने का भी निर्देश दिया।

Case Title – Santosh Kumar Singh v. Arvind Gupta & Anr.

Tags:    

Similar News