दिल्ली की साकेत फैमिली कोर्ट ने कहा है कि किसी विदेशी अदालत द्वारा Irretrievable Breakdown of Marriage यानी विवाह के पूरी तरह टूट जाने के आधार पर दिया गया Ex-Parte Divorce Decree, भारत में निर्णायक या प्रभावी नहीं होगा, अगर भारतीय पति को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं मिला हो।

फैमिली कोर्ट जज पूर्वा सरीन ने यह फैसला उस मामले में दिया, जिसमें एक पति ने अपनी पत्नी को अमेरिका के St. Louis County Family Court, Missouri में चल रही तलाक की कार्यवाही आगे बढ़ाने से रोकने की मांग की थी।

क्या है मामला?

दोनों की शादी 20 दिसंबर 2015 को साकेत के आर्य समाज मंदिर में हुई थी और बाद में विवाह का रजिस्ट्रेशन भी कराया गया।

वैवाहिक विवाद के बाद पत्नी अमेरिका चली गई और वहां Irretrievable Breakdown of Marriage के आधार पर तलाक की कार्यवाही शुरू की। उसने बच्चे की कस्टडी और गुजारा भत्ता भी मांगा।

वहीं पति ने भारत में Restitution of Conjugal Rights की याचिका दाखिल कर पत्नी को उसके और नाबालिग बेटे के साथ वापस रहने का निर्देश देने की मांग की।

इसी दौरान अमेरिकी अदालत ने Ex-Parte Divorce Decree पारित कर दिया।

कोर्ट ने विदेशी तलाक को क्यों नहीं माना?

कोर्ट ने कहा कि Hindu Marriage Act में Irretrievable Breakdown of Marriage तलाक का स्वतंत्र आधार नहीं है।

जज ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट Article 142 के तहत असाधारण मामलों में इस आधार पर तलाक दे सकता है, लेकिन सामान्य फैमिली कोर्ट में इसे सीधे तलाक के आधार के रूप में नहीं अपनाया जा सकता।

इसके अलावा, अमेरिकी अदालत का फैसला Ex-Parte था और पति को अपना बचाव पेश करने का अवसर नहीं मिला था।

CPC की धारा 13 और 14 के सिद्धांतों को लागू करते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसा विदेशी फैसला भारत में निर्णायक नहीं माना जा सकता, खासकर जब वह Natural Justice के सिद्धांतों के अनुरूप न हो।

भारत में तलाक की डिक्री 'Inoperative'

फैमिली कोर्ट ने कहा कि अमेरिकी अदालत द्वारा दिया गया तलाक का फैसला भारत में conclusive और operative नहीं है।

पति को भारत में अपनी Restitution of Conjugal Rights की याचिका या कानून के तहत अन्य उचित कार्यवाही जारी रखने की स्वतंत्रता दी गई है।

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