विकलांगता के आधार पर महिला की प्रजनन स्वायत्तता नहीं छीनी जा सकती: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि केवल विकलांगता किसी महिला की प्रजनन संबंधी स्वायत्तता से इनकार करने का आधार नहीं हो सकती। हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार को एक स्वतंत्र बहुविषयक चिकित्सा बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया, जो विकलांग महिला की गर्भाशय निकालने की सर्जरी कराने की आवश्यकता पर मेडिकल आधार पर विचार करेगा।
जस्टिस अमित महाजन ने स्पष्ट किया कि सर्जरी पर तभी विचार किया जा सकता है, जब मेडिकल जांच से यह सामने आए कि ऐसा करना महिला के सर्वोत्तम हित में है और उसके कल्याण तथा गरिमा की रक्षा के लिए आवश्यक है।
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि मेडिकल बोर्ड गठित करने का आदेश सर्जरी की अनुमति या मंजूरी नहीं माना जाएगा। सर्जरी की आवश्यकता पर अंतिम राय एक्सपर्ट डॉक्टर्स को महिला के पूरे मेडिकल हिस्ट्री और वर्तमान स्थिति का आकलन करने के बाद बनानी होगी।
कोर्ट ने कहा,
“विकलांगता अपने आप में प्रजनन संबंधी स्वायत्तता से इनकार करने या प्रजनन अंग को हटाने का एकमात्र आधार नहीं हो सकती।”
कोर्ट के अनुसार यदि चिकित्सकीय मूल्यांकन से यह सामने आता है कि ऐसी सर्जरी महिला के कल्याण और गरिमा की रक्षा के लिए उसके सर्वोत्तम हित में है तभी इस तरह के हस्तक्षेप पर विचार किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि उसने केवल मेडिकल बोर्ड गठित करने की अनुमति दी है, ताकि विशेषज्ञ महिला की जटिल मेडिकल बैकग्राउंड को देखते हुए यह तय कर सकें कि सर्जरी आवश्यक है या नहीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसे सर्जरी के लिए खुली अनुमति नहीं माना जा सकता।
यह मामला महिला के माता-पिता की ओर से दायर याचिका से जुड़ा था। याचिका में संबंधित अधिकारियों को महिला की गर्भाशय निकालने की सर्जरी पर विचार करने का निर्देश देने की मांग की गई।
याचिका के अनुसार, वर्ष 2005 में जन्मी महिला सेरेब्रल पाल्सी, स्पास्टिक मॉडरेट हेमिपेरेसिस और मध्यम बौद्धिक अक्षमता से पीड़ित है। उसका आईक्यू 42 बताया गया और उसके पास 83 प्रतिशत स्थायी विकलांगता है जिसे गैर-प्रगतिशील बताया गया।
महिला के माता-पिता ने अदालत को बताया कि मासिक धर्म के दौरान वह स्वयं अपनी देखभाल और मासिक धर्म संबंधी स्वच्छता बनाए रखने में सक्षम नहीं है। उनका यह भी कहना था कि वह प्रस्तावित सर्जरी के लिए स्वयं सहमति देने की स्थिति में नहीं है।
दिल्ली सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि महिला का इलाज दीप चंद बंधु अस्पताल में चल रहा है और गर्भाशय निकालने की सर्जरी डॉक्टरों के बोर्ड की मंजूरी के बाद ही की जा सकती है।
इन दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने अधिकारियों को एक स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड गठित करने और चार सप्ताह के भीतर यह तय करने का निर्देश दिया कि महिला की मेडिकल कंडिशन को देखते हुए सर्जरी आवश्यक है या नहीं।