Dowry Deaths: सुप्रीम कोर्ट ने दहेज की लगातार बनी हुई समस्या पर बार-बार चिंता जताई

Update: 2026-06-21 03:54 GMT

भोपाल में ट्विशा शर्मा की मौत - जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने संस्थागत भेदभाव और प्रक्रिया में खामियों के आरोपों पर स्वतः संज्ञान लिया और CBI जांच के आदेश दिए - और ग्रेटर नोएडा में दहेज के लिए परेशान किए जाने के आरोपों के बीच दीपिका नागर की मौत ने एक बार फिर शादीशुदा महिलाओं की उनके ससुराल में होने वाली मौतों के मुद्दे पर लोगों का ध्यान खींचा।

इन मामलों की जांच जारी रहने के बावजूद, पिछले दो सालों में सुप्रीम कोर्ट ने कई अहम फैसले सुनाए हैं कि दहेज के कारण होने वाली मौतों और घरेलू क्रूरता से जुड़े मामलों में अदालतों को कैसे निपटना चाहिए।

मोटे तौर पर ये फैसले तीन मुख्य बातों पर ज़ोर देते हैं –

i) दहेज के कारण मौत के मामलों में ज़मानत देते समय अदालतों को बहुत सावधानी बरतनी चाहिए।

ii) अगर शादी के सात साल के भीतर किसी महिला की असामान्य परिस्थितियों में मौत होती है, तो अभियोजन पक्ष (prosecution) के पक्ष में कानूनी धारणा (statutory presumption) एक अहम भूमिका निभाती है।

iii) कानूनी सुधारों के बावजूद, दहेज भारतीय समाज में गहराई तक समाया हुआ है।

दहेज के कारण मौत के मामलों में ज़मानत

हाल के फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि अदालतों को दहेज के कारण मौत के मामलों में बिना सोचे-समझे ज़मानत नहीं देनी चाहिए।

महेश चंद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026 LiveLaw (SC) 452) मामले में, कोर्ट ने दहेज के कारण मौत के आरोपी पति को दी गई ज़मानत रद्द कर दी।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने दहेज के कारण होने वाली मौतों को एक गंभीर सामाजिक समस्या बताया और कहा कि अदालतों को यह ध्यान रखना चाहिए कि ज़मानत के आदेशों से ऐसा संदेश न जाए कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों को हल्के में लिया जा रहा है।

कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जब शादी के सात साल के भीतर ससुराल में किसी महिला की मौत होती है और दहेज के लिए परेशान करने के आरोप होते हैं, तो अदालतों को 'भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023' की धारा 118 को ध्यान में रखना चाहिए, जो पहले के 'साक्ष्य अधिनियम' (Evidence Act) की धारा 113B के समान है।

इसी बेंच ने 'चेतराम वर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' (2026 LiveLaw (SC) 141) और 'लाल मुनि देवी बनाम बिहार राज्य और अन्य' (2026 LiveLaw (SC) 298) मामलों में भी ऐसा ही रुख अपनाया। दोनों ही मामलों में कोर्ट ने उन हाई कोर्ट के आदेशों की आलोचना की जिनमें आरोपों की गंभीरता, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और दहेज से जुड़ी मौतों के मामले में कानून के तहत मानी जाने वाली धारणा (statutory presumption) पर ठीक से विचार किए बिना ज़मानत दे दी गई थी।

'चेतराम वर्मा' मामले में कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के ज़मानत आदेश को अब तक देखे गए सबसे चौंकाने वाले और निराशाजनक ज़मानत आदेशों में से एक बताया। कोर्ट ने कहा कि दहेज से मौत के मामले में ज़मानत पर फ़ैसला करते समय कोर्ट को अपराध की प्रकृति, तय सज़ा, आरोपी और मृतक के बीच संबंध, घटना की जगह, मेडिकल सबूत और BSA की धारा 118 के तहत कानूनी धारणा पर विचार करना चाहिए।

इसी तरह 'शबीन अहमद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' (2025 LiveLaw (SC) 278) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ससुर और सास को दी गई ज़मानत रद्द की। कोर्ट ने कहा कि जब शादी के कुछ ही समय बाद किसी युवा दुल्हन की संदिग्ध हालात में मौत हो जाती है तो न्यायपालिका को ज़्यादा सतर्कता बरतनी चाहिए। कोर्ट ने चेतावनी दी कि दहेज के लिए उत्पीड़न और हिंसा में सीधी भागीदारी के सबूत होने के बावजूद ज़मानत देने से आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता का भरोसा कम हो सकता है।

दहेज से मौत के मामलों में सबूत से जुड़े सिद्धांत

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसलों में दहेज से मौत के मामलों में लागू होने वाली कानूनी धारणाओं पर बार-बार ज़ोर दिया।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 118 (जो पहले भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 113B थी) के तहत, कोर्ट यह मान सकता है कि पति या उसके रिश्तेदारों ने दहेज के कारण मौत का कारण बना है, अगर यह साबित हो जाए कि महिला की मौत से कुछ समय पहले उसे दहेज के लिए क्रूरता या उत्पीड़न का शिकार बनाया गया और मौत शादी के सात साल के भीतर सामान्य परिस्थितियों के अलावा किसी अन्य तरीके से हुई।

इस धारणा से अपने आप अपराध साबित नहीं होता। हालाँकि, एक बार जब बुनियादी तथ्य साबित हो जाते हैं, तो आरोपी पर इस धारणा को गलत साबित करने की ज़िम्मेदारी आ जाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने ज़मानत देते समय इस प्रावधान को नज़रअंदाज़ करने के लिए कई बार हाई कोर्ट्स की आलोचना की है (योगेंद्र पाल सिंह बनाम राघवेंद्र सिंह उर्फ ​​प्रिंस, 2025 LiveLaw (SC) 1150; चेतराम वर्मा बनाम यूपी राज्य; और लाल मुनि देवी बनाम बिहार राज्य के मामलों में)। कोर्ट ने कहा है कि यह धारणा तब और भी अहम हो जाती है, जब मेडिकल सबूत गला घोंटने, शारीरिक चोटों या अन्य संदिग्ध हालात की ओर इशारा करते हों।

कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि ससुराल में हुई मौतों के मामलों में सज़ा कैसे बरकरार रखी जा सकती है।

गौर आचार्य बनाम त्रिपुरा राज्य और अन्य, 2026 LiveLaw (SC) 538 के मामले में कोर्ट ने हत्या और क्रूरता के लिए पति की सज़ा को बरकरार रखा, क्योंकि यह पाया गया कि मौत हत्या थी, आत्महत्या नहीं।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने मेडिकल सबूतों पर भरोसा किया, जिनसे मौत से पहले लगी कई चोटों और आत्महत्या के लिए फांसी लगाने पर आमतौर पर दिखने वाले निशानों की अनुपस्थिति का पता चला।

इस फ़ैसले में एविडेंस एक्ट की धारा 106 के महत्व पर भी ज़ोर दिया गया। कोर्ट ने समझाया कि जब अभियोजन पक्ष यह साबित कर देता है कि मौत हत्या थी और ससुराल के अंदर हुई तो घर में रहने वालों को इसका कोई ठोस कारण बताना होगा। मृतक को लगी चोटों के बारे में पति का कोई कारण न बता पाना एक और दोषी ठहराने वाला सबूत बन गया।

दहेज निषेध कानून इसलिए असंवैधानिक नहीं है, क्योंकि कुछ मामलों में इसका गलत इस्तेमाल होता है।

कोर्ट के हालिया फ़ैसलों का एक और अहम पहलू उन आरोपों से जुड़ा है कि IPC की धारा 498A का अक्सर गलत इस्तेमाल होता है। कोर्ट ने IPC की धारा 498A (अब BNS की धारा 85) और वैवाहिक कानूनों के गलत इस्तेमाल से जुड़ी चिंताओं को भी कई बार माना है।

हाल के कई फ़ैसलों में कोर्ट ने अस्पष्ट या सामान्य आरोपों के ज़रिए पति के रिश्तेदारों को फंसाने की प्रवृत्ति के खिलाफ़ चेतावनी दी है और इस बात पर ज़ोर दिया है कि सामान्य वैवाहिक विवादों में आपराधिक कानून का इस्तेमाल हथियार के तौर पर नहीं किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने इन चिंताओं को दहेज हत्या के मुकदमों से अलग माना है।

जनश्रुति (पीपल्स वॉयस) बनाम भारत संघ और अन्य, 2025 LiveLaw (SC) 464 के मामले में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने IPC की धारा 498A (जो अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 में शामिल है) की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने माना कि इसके गलत इस्तेमाल के मामले हो सकते हैं। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि गलत इस्तेमाल के हर एक मामले के मुकाबले, ऐसे सैकड़ों असली मामले भी होते हैं जिनमें यह प्रावधान घरेलू क्रूरता के खिलाफ एक ज़रूरी सुरक्षा कवच का काम करता है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि दहेज प्रथा समाज में गहराई तक फैली एक बुराई है और शोषण के कई मामलों की रिपोर्ट ही नहीं हो पाती। कोर्ट ने माना कि कभी-कभार होने वाले गलत इस्तेमाल के आधार पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून को रद्द नहीं किया जा सकता।

इस तरह, जहां कोर्ट ने वैवाहिक मामलों में गलत इस्तेमाल से जुड़ी चिंताओं को माना है, वहीं साथ ही इस बात पर भी ज़ोर दिया है कि दहेज के कारण होने वाली मौतें एक गंभीर सामाजिक समस्या बनी हुई हैं, जिनसे निपटने के लिए सख्त न्यायिक कदम उठाने की ज़रूरत है।

दहेज की मांग की शिकायत करने वाली महिलाओं के लिए सुरक्षा

राहुल गुप्ता बनाम स्टेशन हाउस ऑफिसर और अन्य (2026 LiveLaw (SC) 381) मामले में एक पति ने अपनी पत्नी और उसके परिवार के खिलाफ दहेज "देने" के आरोप में आपराधिक कार्रवाई की मांग की, क्योंकि उन्होंने अपने खिलाफ की गई शिकायत में दहेज के भुगतान का ज़िक्र किया था।

इस दलील को खारिज करते हुए जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने दहेज निषेध अधिनियम की धारा 7(3) का हवाला दिया और कहा कि दहेज की मांग के बारे में शिकायत करते समय पीड़ित महिला और उसके परिवार द्वारा दिए गए बयानों का इस्तेमाल उन्हें दहेज देने के आरोप में मुकदमा चलाने के आधार के तौर पर नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर दहेज देने का कोई स्वतंत्र सबूत हो तो मुकदमा चलाया जा सकता है, लेकिन सिर्फ़ पीड़ित द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर ऐसा नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट की बड़ी चिंता: दहेज एक सामाजिक बुराई बनी हुई है

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसलों में सिर्फ़ अलग-अलग आपराधिक मामलों से आगे बढ़कर दहेज की सामाजिक जड़ों पर भी बात की है।

महेश चंद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में, कोर्ट ने देखा कि समाज के कुछ हिस्सों में, खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार और कर्नाटक में, दहेज के कारण होने वाली मौतें एक गंभीर समस्या बनी हुई हैं। कोर्ट ने अफ़सोस जताया कि शिक्षा में सुधार और महिलाओं के लिए बेहतर मौकों के बावजूद, शादी के बाद भी दहेज की मांग जारी रहती है।

कोर्ट ने NCRB के आंकड़ों का ज़िक्र किया, जिनके मुताबिक 2023 में दहेज से जुड़ी मौतों के मामलों में 6,156 लोगों की जान गई। उत्तर प्रदेश में ऐसी 2,122 मौतें दर्ज की गईं, जबकि बिहार में 1,143 मौतें हुईं। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि उसी साल देश भर में हत्या के 833 मामलों में दहेज को मकसद बताया गया था।

कोर्ट ने बताया कि कैसे शादी के बाद अक्सर दहेज की मांग बढ़ जाती है; कई परिवार शादी से पहले बड़ी मांग नहीं करते, लेकिन शादी पक्की होने के बाद दबाव बनाना शुरू कर देते हैं, यह सोचकर कि दुल्हन के परिवार के पास मानने के अलावा कोई चारा नहीं होगा।

यूपी राज्य बनाम अजमल बेग, 2025 LiveLaw (SC) 1209 मामले में जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने दहेज के ऐतिहासिक विकास को समझा और इस बात की पड़ताल की कि कानून द्वारा प्रतिबंधित होने के बावजूद यह क्यों जारी है।

इसमें 'हाइपरगैमी' (hypergamy) या बेटियों की शादी ऐसे परिवारों में करने की प्रथा की भूमिका पर चर्चा की गई, जिनका सामाजिक दर्जा ऊंचा माना जाता है। कोर्ट ने देखा कि धीरे-धीरे इसने दहेज को "दूल्हे की कीमत" (groom-price) वाली व्यवस्था में बदल दिया, जहां मांगी जाने वाली रकम दूल्हे की शिक्षा, नौकरी और सामाजिक रुतबे से जुड़ी होती है।

कोर्ट ने पाया कि यह प्रथा महिलाओं को कमतर आंकने की व्यवस्था को दिखाती है। कोर्ट ने गौर किया कि शादी के बाज़ार में महिला की कीमत अक्सर उसकी अपनी पहचान और काबिलियत के बजाय उसके द्वारा लाए गए दहेज से आंकी जाती है।

कोर्ट ने कहा कि हालांकि इस्लामिक कानून 'मेहर' (mehr) को पति द्वारा पत्नी को दी जाने वाली अनिवार्य रकम मानता है, लेकिन सामाजिक और आर्थिक प्रभावों के कारण मुस्लिम शादी की प्रथाओं में भी दहेज का चलन बढ़ गया है। नतीजतन, नाममात्र का मेहर और भारी दहेज अक्सर साथ-साथ चलते हैं, जिससे मेहर का सुरक्षात्मक मकसद कमज़ोर हो जाता है।

इसी फैसले के परिणामस्वरूप देश भर के लिए कई निर्देश जारी किए गए। कोर्ट ने सरकारों से कहा कि वे शादी में बराबरी को बढ़ावा देने वाले शिक्षा सुधारों पर विचार करें, दहेज निषेध अधिकारियों की सही नियुक्ति सुनिश्चित करें, पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को खास ट्रेनिंग दें और दहेज के कारण मौत और क्रूरता के लंबित मामलों की समीक्षा करके उन्हें जल्दी निपटाने की कोशिश करें।

योगेंद्र पाल सिंह बनाम राघवेंद्र सिंह उर्फ ​​प्रिंस मामले में जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस एन महादेवन की बेंच ने कहा कि दहेज की वजह से शादी अब एक कमर्शियल लेन-देन बनकर रह गई है और दहेज के कारण होने वाली मौतों के मामलों में सख्त न्यायिक कार्रवाई ज़रूरी है। कोर्ट ने कहा कि दहेज के कारण मौतें पितृसत्ता और घरेलू हिंसा का सबसे घिनौना रूप हैं।

शंकर बनाम राजस्थान राज्य (2026 LiveLaw (SC) 324) मामले में जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह ने कहा कि बराबरी की संवैधानिक गारंटी और दशकों के कानूनी सुधारों के बावजूद, दहेज के लिए उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और लिंग-आधारित अपराध बड़े पैमाने पर हो रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि यह एक विरोधाभास है कि कागज़ों पर तो कानूनी प्रगति दिखती है, लेकिन असल ज़िंदगी में महिलाओं के खिलाफ हिंसा जारी है।

कोर्ट ने देखा कि पितृसत्ता आज भी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित करती है, खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत में, जहाँ घरों में अधिकार मुख्य रूप से पुरुषों के पास होते हैं। कोर्ट ने कहा कि कल्याणकारी योजनाएँ और कानूनी सुधार बदलाव को बढ़ावा तो दे सकते हैं, लेकिन वे अकेले शादी और परिवार में महिलाओं की भूमिका के बारे में गहराई से जमी हुई मान्यताओं को नहीं बदल सकते।

फैसले का समापन एक सवाल के साथ हुआ – दशकों के कानूनों, सुधारों और न्यायिक हस्तक्षेपों के बाद भी, समाज में महिलाओं के शरीर, पसंद और ज़िंदगी पर नियंत्रण इतना गहरा क्यों बना हुआ है?

गौर आचार्य बनाम त्रिपुरा राज्य और अन्य मामले में कोर्ट ने दहेज और घरेलू हिंसा के मामलों की एक और आम बात पर ज़ोर दिया। कोर्ट ने देखा कि मरने वाली महिला ने बार-बार दुर्व्यवहार और उत्पीड़न की शिकायत की थी, लेकिन रिश्तेदारों और गाँव के बुज़ुर्गों की सुलह की कोशिशों के बाद उसे बार-बार उसके ससुराल भेज दिया जाता था।

उसकी कहानी को आँखें खोलने वाला बताते हुए कोर्ट ने चेतावनी दी कि दुर्व्यवहार के संकेतों को नज़रअंदाज़ न करें और यह न मान लें कि समय के साथ हालात सुधर जाएँगे।

कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों से यह बात सामने आती है कि दहेज के कारण होने वाली मौतें सामान्य आपराधिक मामले नहीं हैं। जहां गंभीर आरोप और प्रथम दृष्टया सबूत मौजूद हों, वहां बिना सोचे-समझे ज़मानत नहीं दी जा सकती। साथ ही कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि घरेलू क्रूरता से जुड़े कानून ज़रूरी हैं क्योंकि दहेज आज भी एक व्यापक सामाजिक सच्चाई है।

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