'मीडिया यह नहीं कह सकता कि वह कोई सार्वजनिक काम नहीं कर रहा': सुप्रीम कोर्ट ने जुर्माने के खिलाफ TV टुडे की याचिका खारिज की

Update: 2026-08-10 09:31 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को TV टुडे नेटवर्क की याचिका खारिज की। इस याचिका में दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें बच्चे के यौन शोषण की शिकार पीड़िता की पहचान उजागर करने वाली जानकारी प्रसारित करके उसकी निजता और गोपनीयता के अधिकारों का उल्लंघन करने के लिए नेटवर्क पर ₹5 लाख का जुर्माना लगाया गया था।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने ब्रॉडकास्टर की इस दलील को खारिज किया कि हाईकोर्ट ने यह मानकर गलती की थी कि मीडिया एक सार्वजनिक काम करता है। इसलिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट अधिकार क्षेत्र के दायरे में आ सकता है।

TV टुडे की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने अपने ही फैसले में तय किए गए सिद्धांतों को नजरअंदाज किया, जब उसने माना कि ब्रॉडकास्टर एक "सार्वजनिक काम" कर रहा था, जिससे वह अनुच्छेद 226 के अधिकार क्षेत्र में आता है।

वकील ने फैसले में बताए गए पैमानों का हवाला देते हुए कहा,

"कृपया विवादित आदेश देखें। कोर्ट कहता है कि हम एक सार्वजनिक काम कर रहे हैं। कोर्ट उन सिद्धांतों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर देता है जो उसने खुद तय किए।"

हालांकि, जस्टिस बागची ने मामले की स्वीकार्यता (Maintainability) के मुद्दे पर ब्रॉडकास्टर के रुख पर सवाल उठाया।

जस्टिस बागची ने टिप्पणी की,

"क्या आप सचमुच स्वीकार्यता पर बहस कर रहे हैं? उस मांग का तो सवाल ही नहीं उठता।"

सीनियर वकील ने कहा कि एक बड़ा मुद्दा यह है कि क्या रिट याचिका पर विचार करने के उद्देश्य से प्रेस को सार्वजनिक काम करने वाला माना जा सकता है।

जस्टिस बागची ने जवाब दिया कि प्रेस संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत गारंटीकृत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में योगदान देता है।

जज ने कहा,

"प्रेस अनुच्छेद 19(1)(a) में योगदान देने के अलावा और क्या करता है? जब इंटरनेट तक आपकी पहुंच रोक दी जाती है तो आप अनुच्छेद 19(1)(a) का सहारा लेते हैं। अब, जब 'टॉर्ट' (नागरिक गलत काम) के लिए जुर्माना लगाया जाता है तो आप कहते हैं कि यह सार्वजनिक काम नहीं है? संप्रभु (sovereign) और सार्वजनिक काम के बीच अंतर होता है।"

CJI सूर्य कांत ने भी सवाल किया कि ब्रॉडकास्टर प्रेस द्वारा किए जाने वाले काम के महत्व को स्वीकार करने में क्यों हिचकिचा रहा था।

CJI ने टिप्पणी की,

"आप एक शक्तिशाली मीडिया प्लेयर हैं। आप ईमानदारी से कह सकते थे कि आपने जो किया वह जनहित में हो सकता है, लेकिन..."

बाद में CJI ने कहा कि मीडिया को मुकदमे में बचाव के तौर पर इसे नकारने के बजाय, बहुत ज़रूरी सार्वजनिक कर्तव्य निभाने पर गर्व करना चाहिए।

CJI ने कहा,

"यह एक स्थापित सिद्धांत है। लेकिन जैसा कि मेरे साथी जज ने कहा, आपको गर्व से कहना चाहिए कि आप बहुत ज़रूरी सार्वजनिक कर्तव्य निभाते हैं। आपको शर्मिंदा क्यों होना चाहिए और बचाव के तौर पर अलग तर्क क्यों देना चाहिए? आपको गर्व से ऐसा कहना चाहिए।"

वकील ने तर्क दिया कि प्रेस को सार्वजनिक काम करने वाला मानने से मीडिया संगठन "अनुच्छेद 226 की सख्ती" के दायरे में आ जाएंगे। इससे कई रिट याचिकाओं का सिलसिला शुरू हो सकता है। उन्होंने हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच के एक फैसले का भी ज़िक्र किया, जिसमें कहा गया कि प्रेस के खिलाफ रिट याचिका पर सुनवाई के मकसद से प्रेस कोई सार्वजनिक काम नहीं करता है।

जस्टिस बागची ने बताया कि पीड़िता ने खास तौर पर TV टुडे के खिलाफ कार्रवाई की थी और घटना के प्रकाशन में शामिल न होने की इच्छा जताई, लेकिन ब्रॉडकास्टर ने फिर भी प्रसारण जारी रखा।

इसके बाद CJI ने कहा कि अगर TV टुडे चाहे तो ₹5 लाख की रकम को उसकी तरफ से "छोटी स्वैच्छिक दान राशि" माना जा सकता है।

जब सीनियर वकील ने फिर से कहा कि इसमें एक बड़ा मुद्दा शामिल है। इस फैसले से कई याचिकाएं दाखिल होने का सिलसिला शुरू हो सकता है, तो कोर्ट ने इससे असहमति जताई।

बेंच ने कहा,

"हाईकोर्ट ने इसका सही जवाब दिया।"

जब वकील ने फिर से कहा कि इस फैसले से ऐसी ही कार्रवाइयों का सिलसिला शुरू हो जाएगा तो कोर्ट ने टिप्पणी की:

"हम इसे बढ़ावा देते हैं।"

Case : TV TODAY NETWORK LIMITED v. ABC AND ORS.| SLP(C) No. 27299/2026

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