संविधान सभी नागरिकों का है, न कि कुछ खास लोगों का: CJI सूर्यकांत

Update: 2026-05-22 04:22 GMT

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने गुरुवार को कहा कि संविधान हर नागरिक का समान रूप से है और यह कुछ ऐसे खास लोगों के लिए आरक्षित विशेषाधिकार नहीं है, जो महंगी कानूनी प्रक्रियाओं और बेहतरीन कानूनी प्रतिनिधित्व का खर्च उठा सकते हैं।

सीनियर वकील इंदिरा जयसिंह की संस्मरण 'द कॉन्स्टिट्यूशन इज़ माई होम: कन्वर्सेशन्स ऑन अ लाइफ इन लॉ' के विमोचन समारोह में मुख्य भाषण देते हुए CJI ने संवैधानिकवाद, अधिकारों के न्यायशास्त्र के विकास और भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को आकार देने में बेंच (न्यायालय) और बार (वकीलों) की सहयोगात्मक भूमिका पर विचार व्यक्त किए।

संस्मरण के शीर्षक से प्रेरणा लेते हुए CJI ने संविधान को एक "साझा घर" बताया, और कहा कि यह एक कानूनी दस्तावेज या शासन के दस्तावेज से कहीं बढ़कर है।

उन्होंने कहा,

"एक घर सिर्फ एक भौतिक ढांचा नहीं होता; यह अपनेपन की एक जगह होती है। यह यादों और आकांक्षाओं, दोनों को समान रूप से संजोए रखता है।"

इसके अलावा, उन्होंने कहा कि संविधान की यात्रा की तुलना एक ऐसे घर से की जो पीढ़ियों दर पीढ़ियों विरासत में मिलता है, संरक्षित किया जाता है और समय के साथ उसमें बदलाव किए जाते हैं।

इस बात पर ज़ोर देते हुए कि संवैधानिक लोकतंत्र केवल एक लिखित दस्तावेज के अस्तित्व से ही कायम नहीं रहता, CJI ने कहा कि संवैधानिकवाद के लिए यह ज़रूरी है कि सार्वजनिक सत्ता मूल्यों, जवाबदेही, संस्थागत संतुलन और बुनियादी सिद्धांतों के प्रति निष्ठा के एक ढांचे के भीतर कार्य करे।

सीजेआई ने आगे कहा,

"केवल एक लिखित दस्तावेज का होना ही अपने आप में संवैधानिक लोकतंत्र के चरित्र को परिभाषित नहीं करता।"

साथ ही यह भी जोड़ा कि संवैधानिकवाद इस बात को सुनिश्चित करने के प्रति एक व्यापक प्रतिबद्धता का प्रतिनिधित्व करता है कि शासन प्रभावी और जवाबदेह, दोनों बना रहे।

भारत के संवैधानिक इतिहास का ज़िक्र करते हुए CJI ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने औपनिवेशिक शासन और मनमानी सत्ता को देखने के बाद, जान-बूझकर 'चेक्स एंड बैलेंसेज़' (नियंत्रण और संतुलन) की एक संरचना तैयार की थी। उन्होंने केशवानंद भारती, मिनर्वा मिल्स और मेनका गांधी जैसे ऐतिहासिक फैसलों को संवैधानिक संतुलन को बनाए रखने और स्वतंत्रता, गरिमा तथा निष्पक्षता के अर्थ का विस्तार करने में मील के पत्थर के रूप में उद्धृत किया।

उन्होंने कहा कि कानूनी प्रणाली ने "आत्म-सुधार की एक उल्लेखनीय क्षमता" का प्रदर्शन किया, जिससे संस्थाओं को संवैधानिक संकट के क्षणों के दौरान अपने मूल सिद्धांतों की ओर लौटने का अवसर मिला है।

संवैधानिक विकास में वकीलों की भूमिका को रेखांकित करते हुए CJI ने कहा कि परिवर्तनकारी कानूनी विचार अक्सर बार (वकीलों) द्वारा उठाए गए तर्कों के रूप में शुरू होते हैं। बाद में वे स्थापित न्यायिक सिद्धांत बन जाते हैं।

उन्होंने कहा,

"अदालतें कानूनी सवालों के जवाब देती हैं, लेकिन ज़्यादातर मामलों में बार (वकील) ही होते हैं जो सबसे पहले उन सवालों को आकार देते हैं।"

उन्होंने कहा कि जो अवधारणाएं अब मौलिक अधिकारों का अभिन्न अंग मानी जाती हैं—जिनमें गरिमा, निजता, आजीविका, न्याय तक पहुँच और वास्तविक स्वतंत्रता शामिल हैं—वे केवल संवैधानिक पाठ के माध्यम से नहीं, बल्कि संवैधानिक अदालतों और बार के सदस्यों के बीच निरंतर संवाद और जुड़ाव के माध्यम से विकसित हुईं।

जनहित याचिका (PIL) का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसने न्याय तक पहुंच को व्यापक बनाया, क्योंकि इसके ज़रिए उन लोगों की चिंताओं को अदालतों के सामने लाया गया, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से पारंपरिक कानूनी प्रक्रियाओं से बाहर रखा गया था।

CJI ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि संविधान को नई तकनीकों, बदलती सामाजिक वास्तविकताओं और अधिकारों की विकसित होती समझ से पैदा होने वाली नई चुनौतियों के प्रति हमेशा तत्पर और संवेदनशील रहना चाहिए।

न्याय तक पहुंच के संबंध में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए CJI ने कहा कि संविधान पर "हर नागरिक का समान अधिकार है—चाहे वह शहरी हो या ग्रामीण, अत्यंत गरीब हो या हाशिए पर पड़ा व्यक्ति—जो इसके दायरे में न्याय की तलाश करता है और इसके वादों पर अपना भरोसा रखता है।"

उन्होंने कहा,

"संविधान कुछ चुनिंदा संभ्रांत लोगों का विशेषाधिकार नहीं है, जो खर्चीली कानूनी प्रक्रियाओं का खर्च उठा सकते हैं और अपनी बात मनवाने के लिए बेहतरीन वकीलों की सेवाएं ले सकते हैं—ऐसी बातें जिन्हें देने का इरादा हमारे संविधान का कभी था ही नहीं।"

जजों, वकीलों और संस्थाओं को संविधान का "अस्थायी संरक्षक" बताते हुए CJI ने कहा कि हर पीढ़ी की यह ज़िम्मेदारी है कि वह संविधान के मूल मूल्यों को संरक्षित रखे। साथ ही उन्हें समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप भी ढाले।

जयसिंह को उनके संस्मरण (memoir) के लिए बधाई देते हुए उन्होंने कहा कि उनकी कानूनी यात्रा और संवैधानिक सवालों के साथ दशकों पुराना जुड़ाव, बार के युवा और वरिष्ठ—दोनों ही सदस्यों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनना चाहिए।

उन्होंने कहा,

"कानूनी पेशे का सार अंततः केवल कानूनी कौशल तक ही सीमित नहीं है। यह निष्ठा के बारे में भी है: संस्थाओं के प्रति निष्ठा, शाश्वत सिद्धांतों के प्रति निष्ठा, और सबसे बढ़कर—स्वयं न्याय के प्रति निष्ठा।"

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