विवाहित बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति से बाहर नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-07-31 10:53 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति की नीति में केवल तलाकशुदा या परित्यक्ता बेटियों को पात्र मानकर अन्य विवाहित बेटियों को बाहर रखना संविधान के अनुच्छेद 14 में प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि बेटी और बेटे के बीच इस प्रकार का भेदभाव असंवैधानिक है।

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने बिहार सरकार की 10 दिसंबर 2014 की नीति की संबंधित शर्त को असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द किया।

अदालत ने उस महिला की अपील स्वीकार कर ली, जिसकी अनुकंपा नियुक्ति की मांग केवल इस आधार पर ठुकरा दी गई कि वह न तो तलाकशुदा थी और न ही परित्यक्ता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा,

"यह अदालत कई बार स्पष्ट कर चुकी है कि बेटी और बेटे के बीच किया गया कोई भी वर्गीकरण अपने आप में असंवैधानिक है। केवल तलाकशुदा या परित्यक्ता बेटियों तक पात्रता सीमित करने वाला वर्गीकरण कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकता।"

अदालत ने राज्य सरकार की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि विवाह के बाद बेटी सामान्यतः अपने मायके से संबंध समाप्त कर पति के घर रहने लगती है।

पीठ ने कहा,

"कानून में ऐसा कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि विवाह के बाद बेटी अपने मायके से संबंध तोड़ देती है और केवल अपने ससुराल में ही रहती है।"

मामला उस महिला से जुड़ा था जिसने अपने सरकारी कर्मचारी पिता के निधन के बाद अनुकंपा नियुक्ति की मांग की थी। अधिकारियों ने उसका आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उसकी ओर से मामा ने आपत्ति जताई है और बिहार सरकार की नीति के अनुसार केवल तलाकशुदा या परित्यक्ता विवाहित बेटियां ही पात्र हैं।

महिला की ओर से अदालत को बताया गया कि उसके मामा बाद में अनापत्ति प्रमाणपत्र दे चुके हैं, इसलिए अब उनकी आपत्ति का कोई महत्व नहीं है। साथ ही यह भी दलील दी गई कि विवाहित बेटियों के साथ किया गया यह भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

वहीं, राज्य सरकार ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति कोई अधिकार नहीं बल्कि नीति के अनुसार दी जाने वाली सुविधा है। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि विवाह के बाद बेटी सामान्यतः अपने मायके से अलग हो जाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि महिला ने स्पष्ट रूप से बताया है कि भले ही उसका तलाक कानूनी रूप से अंतिम रूप नहीं ले पाया हो, लेकिन वह अपने मायके में ही रह रही है और उसकी मां तथा भाई उसका सहारा हैं।

अदालत ने कहा,

"किसी दावे पर विचार करने से केवल अत्यधिक तकनीकी आधार अपनाकर इनकार नहीं किया जा सकता।"

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि मामा की ओर से उठाई गई आपत्ति अब समाप्त हो चुकी है। इसके बाद अदालत ने पटना हाईकोर्ट के फैसले और महिला का आवेदन खारिज करने वाले आदेश, दोनों को रद्द कर दिया।

अंत में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को निर्देश दिया कि वह महिला के अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर आठ सप्ताह के भीतर योग्यता के आधार पर नया निर्णय ले।

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