क्या बैंकों का एसोसिएशन 'कॉशन लिस्ट' के ज़रिए वकीलों को ब्लैकलिस्ट कर सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुरक्षित रखा
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया। इस याचिका में इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (IBA) द्वारा जारी और बैंकों को भेजी गई 'कॉशन लिस्ट' (सावधानी सूची) को चुनौती दी गई। इस लिस्ट में एक वकील का नाम शामिल है, जिस पर आरोप है कि उसने लापरवाही बरतकर कर्ज़ लेने वाले को धोखाधड़ी करने में मदद की।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने वकील की SLP (विशेष अनुमति याचिका) पर फ़ैसला सुरक्षित रखा। यह याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ दायर की गई, जिसमें हाईकोर्ट ने कॉशन लिस्ट रद्द करने की वकील की रिट याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया था।
सिंडिकेट बैंक (जो अब केनरा बैंक है) ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता बैंक का पैनल वकील था उसने कर्ज़ लेने वाले को बैंक के साथ धोखाधड़ी करने में मदद की। यह मदद तब की गई, जब वह कर्ज़ के बदले ज़मानत के तौर पर दी जाने वाली अचल संपत्ति के लिए 'सर्च और टाइटल रिपोर्ट' तैयार कर रहा था। आरोप है कि उसने रिपोर्ट में यह बात नहीं बताई कि संपत्ति का कुछ हिस्सा कर्ज़ लेने वाले ने पहले ही बेच दिया था। इस तरह उसने एक ग़लत क़ानूनी राय जारी की, जिससे बैंक को वित्तीय जोखिम उठाना पड़ा।
वकील ने 5 फरवरी, 2020 को जारी की गई उस कॉशन लिस्ट रद्द करने की मांग की थी, जिसमें याचिकाकर्ता का नाम सीरियल नंबर 781 पर दर्ज था। उसने यह निर्देश देने की भी मांग की कि इंडियन बैंक्स एसोसिएशन उस कॉशन लिस्ट को उन बैंकों और वित्तीय संस्थानों को न भेजे, जहां याचिकाकर्ता पैनल वकील के तौर पर काम करता था। साथ ही, एसोसिएशन ऐसे संस्थानों को याचिकाकर्ता को ब्लैकलिस्ट करने की सलाह भी न दे।
IBA ने दलील दी कि यह रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं है, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 12 के दायरे में नहीं आती। हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया और उसे ख़ारिज किया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
याचिकाकर्ता ने दलील दी है कि उसका नाम IBA की वेबसाइट पर मौजूद कॉशन लिस्ट में बिना किसी उचित प्रक्रिया का पालन किए डाल दिया गया। RBI के जुलाई 2009 के 'धोखाधड़ी में शामिल तीसरे पक्षों के नामों की रिपोर्टिंग के लिए प्रक्रियात्मक दिशानिर्देश' का पालन नहीं किया गया। उसे कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई। उसे अपनी बात रखने का कोई उचित मौक़ा नहीं दिया गया। साथ ही कथित धोखाधड़ी की कोई विस्तृत जाँच-पड़ताल भी नहीं की गई।
उसने आगे दलील दी है कि अन्य बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने भी पैनल वकील के तौर पर उसकी सेवाएं समाप्त कर दी हैं। इससे न केवल उसे भारी वित्तीय नुक़सान हुआ, बल्कि उसकी साख और प्रतिष्ठा को भी ठेस पहुंची है। साथ ही उसके मौलिक अधिकारों का भी हनन हुआ है।
सुनवाई के दौरान, एमिक्स क्यूरी (न्याय-मित्र) सीनियर एडवोकेट मनिंदर सिंह ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह सूची याचिकाकर्ता के अपना पेशा करने के अधिकार का उल्लंघन करती है। उन्होंने यह भी कहा कि एडवोकेट्स एक्ट के अनुसार, किसी भी पेशेवर कदाचार के लिए अधिवक्ताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का विशेष अधिकार केवल बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के पास है।
BCI की ओर से एडवोकेट राधिका गौतम और केंद्रीय कानून मंत्रालय की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे ने BCI के अधिकार क्षेत्र के संबंध में सिंह के रुख का समर्थन किया।
सुनवाई के दौरान, जस्टिस नरसिम्हा ने BCI और राज्य बार काउंसिलों द्वारा पेशेवर कदाचार से निपटने के लिए मौजूदा तंत्रों की प्रभावशीलता के बारे में चिंता व्यक्त की।
अदालत ने बुधवार को हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ वकील द्वारा दायर SLP पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया।
Case Title – Ajay Vijh v. Indian Banks Association