दो या अधिक लंबित आपराधिक मामलों वाले वकील के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने वाले BCI नियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

Update: 2026-01-27 11:58 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और तेलंगाना बार काउंसिल से 2023 के BCI नियम को चुनौती देने वाली याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें दो या अधिक गंभीर आपराधिक मामलों में आरोपित अधिवक्ताओं को बार काउंसिल चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराया गया है।

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने मामले पर विचार करने पर सहमति जताते हुए नोटिस जारी किया।

चुनौती दिया गया नियम

याचिका में बार काउंसिल ऑफ इंडिया नियम, 2023 के नियम 4 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है, जो बार काउंसिल/BCI के चुनावों के लिए योग्यता, अयोग्यता और आचार संहिता से संबंधित है।

विवादित नियम के अनुसार, कोई अधिवक्ता बार काउंसिल का सदस्य बनने के लिए अयोग्य होगा यदि:

उस पर चुनाव से कम से कम 9 महीने पहले तक

दो या उससे अधिक गंभीर आपराधिक मामले (जिनमें 7 वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान हो) लंबित हों।

हालांकि, नियम में यह भी स्पष्ट किया गया है कि केवल एक ऐसे मामले की लंबितता अपने आप में अयोग्यता नहीं बनेगी।

इसके अतिरिक्त, अधिवक्ता के खिलाफ चुनाव से 9 महीने पहले कोई अनुशासनात्मक समिति की कार्यवाही लंबित नहीं होनी चाहिए, वह नियमित रूप से प्रैक्टिस कर रहा हो, और किसी अन्य नौकरी या पेशे में संलग्न न हो।

नियम के तहत, हस्तलेखन विशेषज्ञ के रूप में कार्य करने या किसी पक्ष के समर्थन में गवाह के रूप में पेश होने वाले अधिवक्ता भी चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य माने जाएंगे।

याचिका की पृष्ठभूमि

यह याचिका तेलंगाना के एक अधिवक्ता द्वारा दायर की गई है, जिनका तेलंगाना स्टेट बार काउंसिल चुनाव के लिए दाखिल नामांकन पत्र रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि उनके खिलाफ दो आपराधिक मामले लंबित थे, जिनका उन्होंने खुलासा नहीं किया था।

नामांकन की अस्वीकृति को हाई-पावर्ड इलेक्शन कमेटी के समक्ष चुनौती दी गई, लेकिन समिति ने भी रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले को बरकरार रखा।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह नियम 'दोष सिद्ध होने तक निर्दोष माने जाने' (Presumption of Innocence) के संवैधानिक सिद्धांत के विरुद्ध है।

उनका कहना है कि सिर्फ मामलों की लंबितता के आधार पर अयोग्यता ठहराना अनुच्छेद 14 और 21 के तहत प्रदत्त समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लंघन है।

मांगी गई राहतें

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से निम्नलिखित राहतें मांगी गई हैं:

नियम 4 (संशोधित) को, 29.10.2025 की अधिसूचना के तहत किए गए संशोधन सहित,

असंवैधानिक, अल्ट्रा वायर्स, शून्य और अप्रवर्तनीय घोषित किया जाए,

क्योंकि यह केवल लंबित मामलों के आधार पर अयोग्यता उत्पन्न करता है और एक कठोर व सीमित उपचार व्यवस्था लागू करता है।

नामांकन अस्वीकृति आदेश (क्रमांक 161 दिनांक 03.01.2026) तथा उससे संबंधित संचार (दिनांक 04.01.2026) को रद्द किया जाए और

प्रतिवादियों को याचिकाकर्ता का नामांकन स्वीकार कर उन्हें तेलंगाना बार काउंसिल चुनाव लड़ने की अनुमति देने का निर्देश दिया जाए।

अगली सुनवाई

खंडपीठ ने मामले की अगली सुनवाई 20 फरवरी को निर्धारित की है।

याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट प्रिया हिंगोरानी, नरेंद्र हुड्डा और बी.एस. प्रसाद ने पक्ष रखा।

याचिका AOR यन्नम नारपा रेड्डी की सहायता से दायर की गई है।

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