पति पर अवैध संबंध व बच्चे को मारने की झूठी आरोपबाजी 'मानसिक क्रूरता': कलकत्ता हाइकोर्ट ने दिया तलाक का आदेश

Update: 2026-03-10 10:37 GMT

कलकत्ता हाइकोर्ट ने कहा कि पति या पत्नी के खिलाफ बिना सबूत के गंभीर और अपमानजनक आरोप लगाना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है और यह विवाह समाप्त करने का आधार बन सकता है। अदालत ने इसी आधार पर पति की अपील स्वीकार करते हुए उसे तलाक दे दिया।

जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य और जस्टिस सुप्रतिम भट्टाचार्य की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। हाइकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें पति की तलाक याचिका खारिज कर दी गई थी।

मामले में पति ने मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक की मांग की थी। हालांकि बांकुड़ा जिले के खत्रा में एडिशनल जिला जज की अदालत ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि पति पत्नी द्वारा की गई क्रूरता को साबित नहीं कर सका।

हाइकोर्ट में अपील करते हुए पति ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने पत्नी द्वारा लिखित जवाब में लगाए गए गंभीर आरोपों पर ध्यान नहीं दिया, जबकि उन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं था।

पत्नी ने अपने लिखित बयान में आरोप लगाया कि बेटी के जन्म के बाद पति के परिवार ने उनकी दूसरी बेटी को मारने की कोशिश की।

उसने यह भी आरोप लगाया कि पति का किसी अन्य महिला से अवैध संबंध है। इसके अलावा पत्नी ने कहा कि पति ने उसका मोबाइल नंबर अन्य लोगों को देकर उन्हें उसके साथ अनैतिक प्रस्ताव देने के लिए उकसाया।

इन आरोपों के आधार पर पत्नी ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए और 307 सहित दहेज निषेध कानून के तहत आपराधिक शिकायत भी दर्ज कराई।

हाइकोर्ट ने साक्ष्यों की जांच के बाद पाया कि पत्नी इन आरोपों को साबित नहीं कर सकी। अदालत ने उसके बयान में गंभीर विरोधाभास भी पाया। पत्नी ने दावा किया कि 15 फरवरी, 2019 को उसके ससुराल वालों ने बच्ची को मारने की कोशिश की, लेकिन जिरह के दौरान उसने स्वीकार किया कि वह 15 दिसंबर 2018 के बाद ससुराल लौटी ही नहीं थी। इस स्वीकारोक्ति से उसका आरोप स्वतः ही कमजोर पड़ गया।

अदालत ने यह भी पाया कि पति के कथित अवैध संबंध को साबित करने के लिए कोई स्वतंत्र साक्ष्य पेश नहीं किया गया। न तो कोई दस्तावेजी सबूत और न ही कोई कॉल रिकॉर्ड या गवाह प्रस्तुत किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि पति ने पत्नी का फोन नंबर दूसरों को दिया।

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि बिना आधार के अपमानजनक और गंभीर आरोप लगाना मानसिक क्रूरता माना जाता है, क्योंकि इससे जीवनसाथी और उसके परिवार को सामाजिक अपमान और मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ती है।

अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि पति केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल में कार्यरत है और ऐसे आरोप उसके पेशेवर जीवन पर भी गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं।

हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि दोनों पक्ष दिसंबर 2018 से अलग रह रहे हैं और किसी ने भी वैवाहिक जीवन फिर से शुरू करने की इच्छा नहीं जताई। ऐसे में समय के साथ संबंध पूरी तरह कड़वाहट में बदल चुका है।

इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाइकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने पत्नी के बेबुनियाद आरोपों के प्रभाव को नजरअंदाज किया। इसलिए अदालत ने ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द करते हुए पति की अपील स्वीकार की और दोनों के विवाह को तलाक की डिक्री देकर समाप्त कर दिया।

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