कलकत्ता हाईकोर्ट ने पत्नी की हत्या के मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी मामले को 'दुर्लभतम में दुर्लभ' मानते समय केवल अपराध की गंभीरता और क्रूरता पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। अदालत को आरोपी के सुधार और पुनर्वास की संभावना पर भी विचार करना जरूरी है।

जस्टिस शंपा सरकार और जस्टिस स्मिता दास डे की पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने मौत की सजा देने के लिए जिन विशेष कारणों पर भरोसा किया, वे काफी हद तक हिंदू विवाह की रस्मों और वैवाहिक संबंधों से जुड़ी भावनाओं पर आधारित थे।

ट्रायल कोर्ट ने क्या कहा था?

मामले में आरोपी ने अपनी पत्नी की उसके पिता के घर पर, दिनदहाड़े और परिवार के सदस्यों की मौजूदगी में हत्या कर दी थी। ट्रायल कोर्ट ने इसे "बेहद क्रूर, शैतानी और सुनियोजित" कृत्य माना था।

ट्रायल कोर्ट ने यह भी कहा था कि आरोपी अपनी पत्नी के प्रेम, स्नेह, योगदान और त्याग को भूल गया, जबकि विवाह के दौरान दोनों ने वैदिक मंत्रों का आदान-प्रदान किया था। इसी आधार पर मामले को 'दुर्लभतम में दुर्लभ' मानते हुए मौत की सजा दी गई थी।

हाईकोर्ट ने क्यों बदली सजा?

हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अपराध की गंभीर परिस्थितियों और आरोपी से जुड़ी कम करने वाली परिस्थितियों के बीच कानूनी संतुलन नहीं बनाया।

पीठ ने कहा कि पत्नी की उसके मायके में और परिवार के सामने हत्या होना अपने आप में आरोपी के "दemonic" या असाधारण रूप से क्रूर चरित्र को साबित नहीं करता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि हत्या कितनी भी क्रूर क्यों न हो, सजा तय करते समय यह देखना जरूरी है कि आरोपी के सुधार या पुनर्वास की कोई संभावना है या नहीं।

आरोपी के पक्ष में किन बातों पर गौर किया गया?

हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी का कोई आपराधिक पूर्व इतिहास नहीं था। सुधार गृह में उसका आचरण संतोषजनक रहा और प्रोबेशन अधिकारी ने भी उसके सुधार की संभावना बताई थी। वह काउंसलिंग भी ले रहा था।

अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि आरोपी की उम्र 37 वर्ष थी, उसका एक नाबालिग बेटा था जिसने अपनी मां को खो दिया था और उसकी वृद्ध मां की जिम्मेदारी भी उस पर थी।

कोर्ट ने यह भी कहा कि घटना से पहले आरोपी, उसकी पत्नी और परिवार के अन्य सदस्यों ने साथ में चाय पी थी। करीब आधे घंटे बाद हुए विवाद के बाद हत्या हुई। इससे यह संकेत मिलता है कि अपराध संभवतः पहले से पूरी तरह सुनियोजित नहीं था।

मौत की सजा बनी उम्रकैद

हाईकोर्ट ने दोहराया कि उम्रकैद सामान्य नियम है और मौत की सजा अपवाद।

इस आधार पर अदालत ने मौत की सजा की पुष्टि करने से इनकार करते हुए उसे आजीवन कठोर कारावास में बदल दिया।

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