पीड़ित का आपराधिक इतिहास 'मॉब जस्टिस' का बचाव करने का आधार नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट ने प्रतिद्वंद्वी की 'लिंचिंग' के आरोपी की जमानत याचिका खारिज की
बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति आदतन अपराधी है या उसका आपराधिक रिकॉर्ड रहा है, उसे भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार डालना या 'मॉब जस्टिस' करना जायज नहीं ठहराया जा सकता। यह मामला एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा है जो लगभग 15 लोगों की उस भीड़ का हिस्सा था, जिसने पुरानी रंजिश के चलते एक व्यक्ति पर हमला कर उसकी हत्या कर दी थी।
जस्टिस मिलिंद जाधव ने शरद दिगंबर गोराने की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि वह भीड़ को पीड़ित पर हमला करने के लिए 'निर्देश' दे रहा था, ताकि उसे 'सबक सिखाया जा सके'। साथ ही, वह भीड़ से पीड़ित के घर में आग लगाने के लिए भी कह रहा था।
जज ने बताया कि शरद ही वह व्यक्ति है, जिसने कुल्हाड़ी से पीड़ित पर लगातार वार किए। उसने पड़ोसियों को भी धमकी दी कि वे पीड़ित को बचाने की कोशिश न करें, जबकि पीड़ित को लोहे की छड़ों, बांस की डंडियों और चाकुओं से बुरी तरह पीटा जा रहा था। जज के अनुसार, पीड़ित के शरीर पर कुल 38 चोटें थीं।
जस्टिस जाधव ने कहा,
"यह घटना केवल मारपीट में मौत का मामला नहीं है, बल्कि प्रथम दृष्टया यह 'मॉब लिंचिंग' (भीड़ द्वारा हत्या) का मामला है, जिसमें कानून के शासन की पूरी तरह से अनदेखी की गई। ऐसा लगता है कि घातक हथियारों से लैस भीड़ ने पीड़ित के ही घर में घुसकर उसे बेरहमी से पीटा और मार डाला। पीड़ित को आई चोटों की संख्या और प्रकृति से पता चलता है कि हमला किस तरह से किया गया। घर के बाहर कई लोगों की मौजूदगी में यह घटना होना, इसकी गंभीरता को और बढ़ा देता है। इस तरह की 'मॉब लिंचिंग' कानून के शासन की नींव पर प्रहार करती है और इसे निजी दुश्मनी से जुड़े सामान्य मामलों की तरह नहीं देखा जा सकता।"
28 अक्टूबर के अपने आदेश में जस्टिस जाधव ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री से पता चलता है कि जब पीड़ित के परिवार वालों ने बीच-बचाव करने की कोशिश की, तो उन्हें धमकाया गया। विशेष रूप से, जब पीड़ित को पीटा जा रहा था, तब उसकी मां को असहाय कर दिया गया था। मौके पर इकट्ठा हुए पड़ोसियों को भी भीड़ की धमकियों के कारण बीच-बचाव करने से रोक दिया गया।
बेंच ने टिप्पणी की,
"ऐसी स्थितियों में बल प्रयोग और डराने-धमकाने का सीधा असर घटना से प्रभावित लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। इससे समुदाय के लोगों के बीच डर और असुरक्षा की भावना भी पैदा होती है। जिस तरह से यह घटना घटी, उससे प्रथम दृष्टया पता चलता है कि पीड़ित को काबू करने और किसी भी तरह के प्रभावी हस्तक्षेप को रोकने के लिए लोगों की एक बड़ी भीड़ का इस्तेमाल किया गया। मेरी राय में जमानत की अर्जी पर विचार करते समय इस तरह की घटना के सामाजिक प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।"
जज ने कहा कि जब लोगों का एक समूह कानून को अपने हाथ में ले लेता है और विवाद सुलझाने के लिए हिंसा का सहारा लेता है, तो इसके परिणाम केवल पीड़ित तक ही सीमित नहीं रहते। उन्होंने आगे कहा कि ऐसा आचरण सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा है और कानून द्वारा दी जाने वाली सुरक्षा में नागरिकों के भरोसे को कमजोर करता है।
जज ने विशेष रूप से शरद के वकील सना खान की उस दलील को खारिज किया, जिसमें कहा गया कि पीड़ित एक 'हिस्ट्रीशीटर' (पुराना अपराधी) था और उसकी गोराने (आवेदक) परिवार के साथ पुरानी दुश्मनी थी।
जज ने कहा,
"भले ही यह मान लिया जाए कि पीड़ित का आपराधिक इतिहास था और वह एक हिस्ट्रीशीटर था, फिर भी आवेदक और अन्य आरोपियों को उसके पिछले आचरण के लिए उसे सजा देने का कोई अधिकार नहीं था। पीड़ित के खिलाफ किसी भी आरोप से कानून के अनुसार ही निपटा जाना चाहिए। आपराधिक इतिहास होने का मतलब यह नहीं है कि कोई व्यक्ति निजी बदला ले या भीड़ के जरिए न्याय (मॉब जस्टिस) करे। किसी अपराधी के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार केवल कानूनी अधिकारियों के पास होता है, न कि उन व्यक्तियों के पास जो अपनी निजी रंजिश के कारण ऐसा करते हैं। आवेदक की प्रथम दृष्टया भूमिका और अपराध करने के तरीके को देखते हुए, मेरा मानना है कि घटना की गंभीरता और पीड़ित के परिवार तथा समाज पर इसके असर को देखते हुए जमानत नहीं दी जानी चाहिए।"
इसके अलावा, जज ने जमानत याचिका में 'तकनीकी' दलील देने के लिए वकील खान की आलोचना की। वकील ने तर्क दिया था कि उनके मुवक्किल शरद को गिरफ्तारी के आधार (Grounds of Arrest) नहीं बताए गए। जज ने कहा कि अपराध की जघन्यता, गंभीरता और उसे अंजाम देने के तरीके को देखते हुए, गिरफ्तारी के आधार से जुड़ी ऐसी तकनीकी दलील देना बिल्कुल भी उचित नहीं है।
जज ने कहा,
"जहां तक संभव हो सका और अभियोजन पक्ष ने अपनी पूरी क्षमता से जो किया, उसके आधार पर मुझे प्रथम दृष्टया लगता है कि गिरफ्तारी के कारणों के बारे में बता दिया गया और जरूरी फॉर्म भी दे दिया गया, जिस पर आवेदक के हस्ताक्षर हैं। इस स्थिति को देखते हुए, जिस तकनीकी आधार पर आवेदक रिहाई की मांग कर रहा है, उसे भी खारिज किया जाता है, क्योंकि यह टिक नहीं सकता।"
इन टिप्पणियों के साथ पीठ ने जमानत याचिका खारिज की।
Case Title : Sharad Digambar Gorane vs State of Maharashtra