बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 65 या 70(2) के तहत अपराधों के मामलों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 482(4) के तहत अग्रिम जमानत (गिरफ्तारी से पहले जमानत) पर लगी रोक पूरी तरह लागू नहीं होती है।

कोर्ट ने कहा कि इस बात की जांच के लिए अर्जी पर विचार किया जा सकता है कि क्या कथित अपराध के तत्व शुरुआती तौर पर (prima facie) मौजूद हैं; अगर ऐसा है, तो कानूनी रोक लागू होगी और अर्जी सुनवाई के लायक नहीं मानी जाएगी।

जस्टिस एम. एम. नेरलिकर अलग-अलग अपराधों में अग्रिम जमानत की मांग करने वाली दो अर्जियों पर सुनवाई कर रहे थे, जहां BNSS की धारा 482(4) के कारण अर्जी की स्वीकार्यता (Maintainability) का मुद्दा उठा था। पहले मामले में आवेदक पर 'बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम, 2012' (POCSO Act) की धारा 4 और 6 तथा BNS की धारा 64(2)(i), 64(2)(m) और 65(1) के तहत आरोप लगाए गए। 15 साल की पीड़िता ने आरोप लगाया कि आवेदक ने कई बार उसका यौन शोषण किया। बाद में पता चला कि वह दो महीने की गर्भवती है।

दूसरे मामले में आवेदक पर BNS की धारा 137(2) के तहत आरोप लगाया गया। 14 साल की पीड़िता ने शुरू में कहा कि कोई यौन शोषण नहीं हुआ और वह अपनी मर्जी से आवेदक के साथ गई, लेकिन बाद में आरोप लगाया कि उसने अश्लील तस्वीरें और वीडियो वायरल करने की धमकी देकर उसका यौन शोषण किया।

आवेदकों ने तर्क दिया कि BNSS की धारा 482(4) के तहत लगी रोक पूरी तरह लागू नहीं होती है और कोर्ट यह जांच सकता है कि क्या कानूनी रोक लगाने वाले तत्व शुरुआती तौर पर मौजूद हैं। कोर्ट ने कहा कि धारा 482(4) के तहत अगर किसी व्यक्ति पर BNS की धारा 65 या धारा 70(2) के तहत अपराध का आरोप है और उसकी गिरफ्तारी होनी है तो उस मामले में धारा 482 लागू नहीं होगा। इसलिए सवाल यह है कि क्या यह प्रावधान पूरी तरह से रोक लगाता है या क्या कोर्ट यह देख सकता है कि कथित अपराध के ज़रूरी तत्व पहली नज़र में (prima facie) मौजूद हैं या नहीं।

कोर्ट ने कहा,

"...धारा 482 के तहत अग्रिम ज़मानत (Anticipatory Bail) पर विचार करते समय कोर्ट को सबसे पहले यह देखना होगा कि क्या धारा 65 या 70(2) के ज़रूरी तत्व मौजूद हैं। अगर वे तत्व मौजूद हैं तो अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी पर विचार नहीं किया जा सकता। अगर वे तत्व मौजूद नहीं हैं, तो अर्ज़ी पर विचार किया जा सकता है और ज़मानत दी जा सकती है।"

इसलिए कोर्ट ने माना कि धारा 482(4) पूरी तरह से रोक नहीं लगाता है। यह तभी लागू होता है, जब धारा 65 या धारा 70(2) के तहत पहली नज़र में आरोप मौजूद हों। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कोर्ट रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री का बारीकी से विश्लेषण नहीं कर सकता, क्योंकि इससे उस प्रावधान का मकसद ही खत्म हो जाएगा।

कोर्ट ने कहा,

"...आरोपी व्यक्तियों के लिए BNSS की धारा 482 के तहत अग्रिम ज़मानत का दावा करने का बहुत कम मौका है... BNSS की धारा 482[4] में इस्तेमाल किए गए शब्दों 'अपराध करने का आरोप का मतलब यह है कि अगर पीड़ित यह दावा करती है कि किसी ने कुछ गलत किया है, तो उसके दावे को तथ्यों की पहली नज़र में पुष्टि के तौर पर स्वीकार करना होगा।"

इसलिए कोर्ट ने कहा कि अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी पर केवल इस हद तक विचार किया जा सकता है कि क्या BNS की धारा 65 या धारा 70[2] के ज़रूरी तत्वों के आधार पर पहली नज़र में कोई मामला बनता है।

इस कसौटी को लागू करते हुए कोर्ट ने पाया कि दोनों अर्ज़ियों में धारा 65(1) का ज़िक्र किया गया। इसके ज़रूरी तत्व - यानी बलात्कार होना और महिला की उम्र 16 साल से कम होना - पहली नज़र में साबित हो रहे थे। पहले मामले में पीड़िता 15 साल 5 महीने की थी और उसने आरोप लगाया कि रेप के कारण वह गर्भवती हो गई; दूसरे मामले में पीड़िता 14 साल 4 महीने की थी और उसने आरोप लगाया कि अश्लील तस्वीरें और वीडियो वायरल करने की धमकी देकर उसके साथ रेप किया गया।

इसके आधार पर कोर्ट ने कहा कि दोनों अर्जियां सुनवाई के लायक नहीं हैं और आपराधिक अर्जियों को खारिज किया।

Case Title: Kasif Sahabuddin Khan v. State of Maharashtra [Criminal Application (ABA) No. 794 of 2026] & Ajay Ganesh Ade v. State of Maharashtra & Anr. [Criminal Application (ABA) No. 771 of 2026]

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