बॉम्बे हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि यदि कोई किरायेदार बाद में संपत्ति का सह-मालिक बन जाता है तो उसके खिलाफ बेदखली की कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि स्वामित्व का अधिकार मिलने के बाद किरायेदार की स्थिति बदल जाती है।
जस्टिस राजेश एस. पाटिल इस मामले की सुनवाई कर रहे थे। मामला एक बेदखली वाद से जुड़ा था, जिसमें अवैध निर्माण, उप-किरायेदारी, उपयोग में बदलाव, वास्तविक आवश्यकता और किराया बकाया जैसे आधारों पर कार्रवाई की गई।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि कार्यवाही लंबित रहते हुए किरायेदार ने 22 अप्रैल, 2016 को संपत्ति के एक सह-मालिक के उत्तराधिकारियों से 50 प्रतिशत हिस्सा खरीद लिया। इसके बाद उसने तर्क दिया कि अब वह सह-मालिक बन चुका है, इसलिए उसके खिलाफ बेदखली की कार्यवाही जारी नहीं रह सकती।
हाईकोर्ट ने मोहींदर प्रसाद जैन बनाम मनोहर लाल जैन (2006) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि भले ही कोई एक सह-मालिक बेदखली की कार्यवाही शुरू कर सकता है, लेकिन यदि परिस्थितियों में बदलाव हो जाए या अन्य सह-मालिक आपत्ति करें, तो ऐसी कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती।
अदालत ने कहा कि जब किरायेदार संपत्ति में हिस्सा खरीद लेता है तो उसकी दोहरी स्थिति बन जाती है, वह एक ओर किरायेदार रहता है और दूसरी ओर सह-मालिक भी बन जाता है। ऐसे में उसके खिलाफ बेदखली की कार्रवाई जारी रखना कानूनी रूप से उचित नहीं है।
अदालत ने टिप्पणी की कि इस तरह की स्थिति में स्वामित्व का अधिकार अधिक प्रभावी हो जाता है और बेदखली का आधार समाप्त हो जाता है।
मामले के तथ्यों में यह भी सामने आया कि किरायेदार ने संपत्ति के बंटवारे के लिए अलग से कार्यवाही भी शुरू की थी। साथ ही एक सह-मालिक ने भी बेदखली कार्यवाही जारी रखने में असहमति जताई थी।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने अपीलीय अदालत का फैसला रद्द किया और ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को बहाल कर दिया, जिसमें बेदखली का दावा खारिज किया गया।
यह फैसला स्पष्ट करता है कि संपत्ति में स्वामित्व अधिकार प्राप्त होने के बाद किरायेदार के खिलाफ बेदखली की कार्रवाई जारी नहीं रह सकती।