बॉम्बे हाईकोर्ट ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस को दक्षिणी राज्यों के बाहर 'इंडियन एक्सप्रेस' नाम का इस्तेमाल करने से रोकने वाला अंतरिम आदेश बरकरार रखा
बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक्सप्रेस पब्लिकेशन्स (मदुरै) प्राइवेट लिमिटेड को दक्षिणी राज्यों के बाहर 'द न्यू इंडियन एक्सप्रेस' नाम का इस्तेमाल करने से रोकने वाले अंतरिम आदेश को बरकरार रखा है; उन्हें केवल दक्षिणी राज्यों के लिए ही इसके अधिकार दिए गए।
जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की डिवीजन बेंच ने कहा कि सिंगल-जज के आदेश में कोई गलती नहीं थी।
सिंगल-जज ने माना था कि शुरुआती तौर पर 'इंडियन एक्सप्रेस ट्रेडमार्क' पर पूरी तरह से 'द इंडियन एक्सप्रेस (P) लिमिटेड' का अधिकार है।
खास बात यह है कि सिंगल-जज जस्टिस रियाज़ छागला ने 13 नवंबर, 2025 को एक विस्तृत आदेश पारित किया था, जिसमें 'इंडियन एक्सप्रेस' द्वारा दायर अंतरिम अर्ज़ी को मंज़ूरी दी गई।
जस्टिस छागला ने माना था कि एक्सप्रेस पब्लिकेशन्स द्वारा तय दक्षिणी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बाहर न्यू इंडियन एक्सप्रेस का इस्तेमाल पार्टियों के बीच हुए समझौते के तहत मिली सीमित अनुमति से ज़्यादा था।
यह विवाद 1995 के समझौता ज्ञापन (MoS) से शुरू हुआ, जिसे बाद में 1997 में मद्रास हाईकोर्ट ने सहमति डिक्री बना दिया था। इसके साथ ही 2005 में एक सप्लीमेंटल MoS भी किया गया।
इन समझौतों के तहत "इंडियन एक्सप्रेस" नाम (मार्क) का पूरा मालिकाना हक इंडियन एक्सप्रेस के पास रहा और एक्सप्रेस पब्लिकेशन्स को केवल पांच दक्षिणी राज्यों और कुछ खास केंद्र शासित प्रदेशों में अपना अखबार छापने के लिए 'द न्यू इंडियन एक्सप्रेस' नाम का इस्तेमाल करने का सीमित अधिकार दिया गया।
इंडियन एक्सप्रेस हाईकोर्ट तब पहुंचा जब एक्सप्रेस पब्लिकेशन्स ने सितंबर 2024 में मुंबई में द न्यू इंडियन एक्सप्रेस मुंबई डायलॉग्स नाम का एक कार्यक्रम आयोजित किया।
उसने तर्क दिया कि तय इलाकों के बाहर इस नाम का कोई भी इस्तेमाल चाहे वह प्रकाशन, प्रचार या कमर्शियल कार्यक्रमों के लिए हो MoS का उल्लंघन है। उसके रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क का उल्लंघन है और 'पासिंग ऑफ' (गलत तरीके से किसी और के नाम का इस्तेमाल करना) के बराबर है।
एक्सप्रेस पब्लिकेशन्स ने जवाब दिया कि MoS में दक्षिणी राज्यों के बाहर अपने अखबार के विज्ञापन या प्रचार पर साफ तौर पर कोई रोक नहीं लगाई गई।
हालांकि, जस्टिस छागला ने एक्सप्रेस पब्लिकेशन्स को दक्षिणी राज्यों के बाहर उक्त नामों का इस्तेमाल करने से रोक दिया।
इससे नाराज़ होकर, एक्सप्रेस पब्लिकेशन्स ने जस्टिस डांगरे की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच के सामने सिंगल-जज के फैसले के खिलाफ अपील की।