बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार (18 अगस्त) को तर्कवादी और अंधविश्वास विरोधी कार्यकर्ता डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में दोषी सचिन अंदुरे को जमानत दे दी। कोर्ट ने उसकी उम्रकैद की सजा को भी निलंबित कर दिया है।

जस्टिस सारंग कोतवाल और जस्टिस रंजितसिंह भोंसले की डिवीजन बेंच ने यह आदेश पारित किया। आदेश की विस्तृत प्रति अभी उपलब्ध नहीं हुई है।

अंदुरे ने मई 2024 में विशेष अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को चुनौती देते हुए जमानत और सजा निलंबित करने की मांग की थी। विशेष अदालत ने उसे और सह-आरोपी शरद कलसकर को IPC की धारा 302 और 34 के तहत हत्या का दोषी ठहराया था। कलसकर को अप्रैल 2026 में बॉम्बे हाईकोर्ट की एक अन्य बेंच ने जमानत दे दी थी।

अंदुरे की ओर से मुख्य दलील थी कि CBI ने उसका Test Identification Parade (TIP) नहीं कराया था और कुछ गवाहों ने पहली बार अदालत में उसकी पहचान की। बचाव पक्ष ने गवाहों के बयानों में विरोधाभास और लंबे समय से जेल में रहने का भी हवाला दिया। यह भी कहा गया कि उसकी अपील पर जल्द सुनवाई की संभावना नहीं है।

वहीं, दाभोलकर परिवार ने जमानत का विरोध किया। परिवार की ओर से कहा गया कि जमानत देने से समाज में गलत संदेश जाएगा। दलील दी गई कि दाभोलकर के अलावा गोविंद पानसरे, गौरी लंकेश और एम.एम. कलबुर्गी जैसे विचारकों की भी इसी तरह हत्या हुई और इसके पीछे तर्कवाद तथा अंधविश्वास के खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबाने की साजिश थी।

डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की 20 अगस्त 2013 को पुणे में मॉर्निंग वॉक के दौरान दो बाइक सवार हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। 2014 में बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के बाद CBI ने जांच अपने हाथ में ली थी।

मई 2024 में विशेष अदालत ने अंदुरे और कलसकर को हत्या का दोषी ठहराया था, जबकि डॉ. वीरेंद्र तावड़े, विक्रम भावे और अधिवक्ता संजीव पुनालेकर को हत्या, आपराधिक साजिश और अन्य आरोपों से बरी कर दिया था। अदालत ने आरोपियों को UAPA की आतंकवादी कृत्य संबंधी धारा और संबंधित Arms Act प्रावधानों के तहत भी दोषी नहीं ठहराया था।

दाभोलकर परिवार ने तीनों आरोपियों की बरी किए जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की है। वहीं, अंदुरे और कलसकर ने अपनी दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए अलग अपीलें दाखिल की हैं।

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