अंतरराष्ट्रीय अपराधी होने का हवाला: अबू सलेम को 2 दिन की आपात पैरोल देने पर महाराष्ट्र सरकार की सहमति, एस्कॉर्ट अनिवार्य
बॉम्बे हाईकोर्ट को मंगलवार को महाराष्ट्र सरकार ने बताया कि 1993 मुंबई बम धमाकों के मामले में दोषी करार दिए जा चुके गैंगस्टर अबू सलेम को परिवार से मिलने के लिए दो दिन की आपातकालीन पैरोल देने पर सहमति बना ली गई। हालांकि राज्य सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि सलेम को बिना सुरक्षा एस्कॉर्ट के रिहा नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह एक “अंतरराष्ट्रीय अपराधी” है, और उसे एस्कॉर्ट का खर्च खुद वहन करना होगा।
यह मामला जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस श्याम चंदक की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया। अबू सलेम ने अपनी वकील फरहाना शाह के माध्यम से याचिका दायर कर अपने भाई अबू हकीम अंसारी के निधन के मद्देनज़र 14 दिन की आपातकालीन पैरोल की मांग की थी। उनके भाई का निधन 14 नवंबर 2025 को हुआ था।
मंगलवार सुबह जब मामला अदालत में पुकारा गया तो राज्य की ओर से मुख्य लोक अभियोजक मंकुवर देशमुख ने अदालत को बताया कि जेल अधिकारियों ने सलेम को दो दिन की आपातकालीन पैरोल देने पर सहमति दी है, लेकिन इसके साथ यह शर्त रखी गई कि उसे एस्कॉर्ट के साथ ही छोड़ा जाएगा और एस्कॉर्ट का पूरा खर्च सलेम को ही उठाना होगा।
इस पर सलेम की ओर से पेश वकील फरहाना शाह ने आपत्ति जताई। उन्होंने अदालत को बताया कि सलेम को उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जाना है और मुंबई से आज़मगढ़ की यात्रा में ही 25 से 26 घंटे लग जाते हैं। ऐसे में दो दिन की पैरोल में आना-जाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
खंडपीठ ने इसके बाद राज्य से एस्कॉर्ट के खर्च के बारे में जानकारी मांगी। इस पर देशमुख ने कुछ दस्तावेज अदालत के समक्ष रखे और बताया कि एस्कॉर्ट का खर्च लाखों रुपये तक हो सकता है। इस पर फरहाना शाह ने दलील दी कि उनके मुवक्किल ने पहले ही 25 साल जेल में गुज़ार दिए और ऐसे में उन्हें बिना एस्कॉर्ट के पैरोल पर रिहा किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अब एस्कॉर्ट की कोई ज़रूरत नहीं है और सलेम पैरोल का हकदार है, इसलिए उसे बिना सुरक्षा के छोड़ा जा सकता है। राज्य की ओर से इसका कड़ा विरोध किया गया। मुख्य लोक अभियोजक ने कहा कि सलेम एक अंतरराष्ट्रीय अपराधी है और उसे बिना एस्कॉर्ट बाहर नहीं जाने दिया जा सकता।
इस पर फरहाना शाह ने दोहराया कि उनका मुवक्किल भारतीय नागरिक है और उसे कानून के तहत पैरोल का अधिकार प्राप्त है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह एक विस्तृत जवाब दाखिल करे, जिसमें राज्य की आशंकाओं, सुरक्षा कारणों और एस्कॉर्ट खर्च का पूरा विवरण दिया जाए। इसके बाद मामले की सुनवाई एक सप्ताह के लिए स्थगित कर दी गई।
याचिका में अबू सलेम ने यह भी बताया कि उसने अपने भाई के अंतिम संस्कार और उससे जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होने के लिए 15 नवंबर 2025 को ही 14 दिन की आपातकालीन पैरोल के लिए आवेदन किया था, लेकिन जेल अधिकारियों ने 20 नवंबर 2025 के आदेश से उसकी मांग खारिज कर दी।
सलेम का यह भी आरोप है कि चूंकि वह नियमित पैरोल का पात्र था, इसलिए उसने अपने भाई की गंभीर बीमारी को देखते हुए तीन महीने पहले ही नियमित पैरोल के लिए आवेदन किया। उसका दावा है कि जेल प्रशासन ने जानबूझकर उस आवेदन पर कोई फैसला नहीं लिया और उसे लंबित रखा ताकि वह पैरोल का लाभ न उठा सके। उसके अनुसार, यह आवेदन उसी दिन लंबित रखा गया जब उसके भाई की मृत्यु हुई।
अबू सलेम ने यह भी बताया कि नवंबर, 2005 में गिरफ्तारी के बाद से वह लगातार जेल में है और इतने वर्षों में उसे केवल अपनी मां और सौतेली मां के निधन के बाद ही कुछ दिनों की पैरोल दी गई थी।