महात्मा गांधी के विचारों पर परीक्षा पास की, कोविड में भी जेल में रहा: बॉम्बे हाइकोर्ट ने POCSO दोषी की उम्रकैद घटाकर 12 साल की
बॉम्बे हाइकोर्ट ने नाबालिग बच्ची के साथ यौन अपराध के एक गंभीर मामले में दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए सजा में आंशिक राहत दी।
अदालत ने POCSO Act के तहत दोषी ठहराए गए व्यक्ति की उम्रकैद की सजा को घटाकर 12 साल का कारावास कर दिया। अदालत ने यह फैसला आरोपी के जेल में रहते हुए सुधारात्मक गतिविधियों में भाग लेने, उसके कम उम्र में अपराध किए जाने और किसी पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड के अभाव को ध्यान में रखते हुए दिया।
जस्टिस सारंग कोतवाल और जस्टिस संदीश पाटिल की खंडपीठ ने यह आदेश 2 फरवरी को पारित किया।
उक्त मामला कलामुद्दीन मोहम्मद इस्तेयार अंसारी उर्फ कोयल से जुड़ा है जिसे दिसंबर, 2020 में विशेष अदालत ने POCSO Act की धारा 6 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
अदालत ने सजा में नरमी बरतते हुए यह महत्वपूर्ण तथ्य दर्ज किया कि आरोपी ने जेल में रहते हुए कई शैक्षणिक और सामाजिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। इनमें तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ, पुणे द्वारा प्रमाणित 'किताबों के विश्लेषण' की परीक्षा, रामचंद्र प्रतिष्ठान, मुंबई द्वारा आयोजित निबंध प्रतियोगिता और मुंबई सर्वोदय मंडल द्वारा 'महात्मा गांधी के विचारों' पर आधारित परीक्षा शामिल है, जिसे आरोपी ने सफलतापूर्वक पास किया।
खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि इन सभी तथ्यों को सामूहिक रूप से देखने पर सजा के स्तर पर कुछ उदारता दिखाई जा सकती है।
अदालत ने यह भी नोट किया कि अपराध के समय आरोपी की उम्र मात्र 20 साल थी वह दिसंबर 2016 से लगातार हिरासत में है और कोविड-19 महामारी के दौरान भी उसे आपात पैरोल पर रिहा नहीं किया गया। इसके अलावा आरोपी के खिलाफ कोई अन्य आपराधिक इतिहास भी नहीं पाया गया।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अपराध की गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इसी आधार पर जस्टिस कोतवाल और जस्टिस पाटिल ने कहा कि न्यूनतम दस साल की सजा से अधिक सजा देना आवश्यक है और 12 साल की कैद न्याय के हितों को पूरा करती है।
मामले के तथ्यों पर अदालत ने दो टूक कहा कि अभियोजन ने आरोपों को संदेह से परे साबित किया। यह घटना 9 दिसंबर, 2016 की है, जब पीड़िता पानी भरने आरोपी के घर गई। उसी दौरान आरोपी ने बच्ची के साथ जबरन यौन कृत्य किया। बच्ची ने डर के मारे घर जाकर अपनी मां को पूरी घटना बताई, जिसके बाद तुरंत पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई।
अदालत ने आरोपी की इस दलील को भी खारिज किया कि पीड़िता को उसके माता-पिता ने झूठा बयान देने के लिए सिखाया होगा। हाइकोर्ट ने कहा कि पांच साल की बच्ची के मन में आरोपी के खिलाफ कोई निजी दुश्मनी होना या इतनी गंभीर झूठी कहानी गढ़ना अत्यंत असंभव है। बच्ची और उसकी मां के बयान स्वाभाविक और भरोसेमंद हैं।
अंत में अदालत ने यह भी आदेश दिया कि आरोपी को अब तक जेल में बिताई गई अवधि का लाभ दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 428 के तहत दिया जाएगा।
इन टिप्पणियों के साथ अपील का निपटारा किया।