पूरे महाराष्ट्र में नेताओं की खरीद-फरोख्त चल रही है; अगर आपके खिलाफ FIR हैं तो पाला बदल लीजिए, वहां एक 'वॉशिंग मशीन' है: बॉम्बे हाईकोर्ट

Update: 2026-07-03 06:09 GMT

बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार (2 जुलाई) को मौखिक रूप से टिप्पणी की कि पूरे महाराष्ट्र राज्य में नेताओं की खरीद-फरोख्त (हॉर्स ट्रेडिंग) चल रही है। कोर्ट ने सत्ताधारी पार्टी की ओर इशारा करते हुए कहा कि कोई भी राजनीतिक नेता 'वॉशिंग मशीन' में शामिल होकर अपने खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों को बंद करवा सकता है।

जस्टिस माधव जामदार, सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी (49) की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। सईद ने केंद्र सरकार और BJP के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के कारण महाराष्ट्र पुलिस द्वारा उनके खिलाफ जारी किए गए 'एक्सटर्नमेंट ऑर्डर' (राज्य से बाहर निकालने का आदेश) को चुनौती दी थी।

जज ने एक्सटर्नमेंट ऑर्डर रद्द करते हुए कहा कि सरकार के खिलाफ केवल विरोध प्रदर्शन करना ऐसी कार्रवाई का आधार नहीं हो सकता। जज ने विरोध प्रदर्शनों को दबाने की सरकार की प्रवृत्ति की कड़ी आलोचना करते हुए मौखिक टिप्पणी की कि "नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है।"

जस्टिस जामदार ने महाराष्ट्र के राजनीतिक क्षेत्र में सांसदों (MPs) और विधायकों (MLAs) के पाला बदलने और चल रही 'खरीद-फरोख्त' पर भी टिप्पणी की। यह टिप्पणी तब आई जब जज ने गौर किया कि सईद एक राजनीतिक पार्टी SDPI से जुड़े हैं।

जज ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा,

"परसों एक 10 साल के बच्चे की दुर्घटना में मौत हो गई और राज्य विधानसभा में किस बात पर चर्चा हो रही थी - कि पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer) का चुनाव कैसे होता है और कैसे वह एक पार्टी से दूसरी पार्टी में चले गए... यह क्या है? आपको (सईद) भी पाला बदल लेना चाहिए... वैसे भी पूरे महाराष्ट्र में खरीद-फरोख्त चल रही है। आपके (सईद) खिलाफ कुछ FIR हैं... पाला बदलने पर विचार करें, वहां एक वॉशिंग मशीन है।"

लिखाए गए आदेश में जस्टिस जामदार ने स्पष्ट किया कि सरकार के फैसलों का केवल विरोध करना किसी नागरिक को राज्य से बाहर निकालने का आधार नहीं बन सकता और ऐसा करने से उनके बोलने और सम्मान के मौलिक अधिकार पर असर पड़ेगा।

जस्टिस जमदार ने आदेश में कहा,

"याचिकाकर्ता ने अपनी हैसियत से भारत सरकार के कुछ फैसलों के खिलाफ़ मोर्चे और धरने आयोजित किए। यह महाराष्ट्र पुलिस एक्ट के तहत किसी व्यक्ति को शहर से बाहर निकालने (एक्सटर्नमेंट) का आधार नहीं हो सकता। यह कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण है। इसलिए एक्सटर्नमेंट आदेश रद्द करते हुए याचिका का निपटारा किया जाता है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के अनुसार, नागरिकों को न केवल अपनी राय व्यक्त करने की आज़ादी है, बल्कि सम्मान के साथ जीने का अधिकार भी है। भारत सरकार के कुछ फैसलों का विरोध करने के कारण याचिकाकर्ता के खिलाफ़ की गई कार्रवाई उसके मौलिक अधिकारों को प्रभावित करती है।"

इसके साथ ह, बेंच ने याचिका का निपटारा कर दिया और डिप्टी कमिश्नर ऑफ़ पुलिस (ज़ोन 6) और डिविज़नल कमिश्नर, कोंकण डिविज़न द्वारा क्रमशः 3 दिसंबर, 2025 और 27 मार्च, 2026 को पारित उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनके तहत सईद को एक साल के लिए शहर से बाहर निकाला गया था।

Case Title: Saeed Ahmad Abdul Wahid Chaudhary vs State of Maharashtra (Writ Petition 1700 of 2026)

Tags:    

Similar News