संयुक्त परिवार के सदस्यों के बीच बंटवारे के मुकदमे में बाहरी व्यक्ति द्वारा की गई संपत्ति की बिक्री को चुनौती नहीं दी जा सकती: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि संयुक्त परिवार की संपत्ति को किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति के पक्ष में हस्तांतरित किए जाने को परिवार के सदस्यों के बीच चल रहे बंटवारे के मुकदमे का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिस बाहरी व्यक्ति ने संपत्ति हस्तांतरित की है, उसके पास उस संपत्ति का मालिकाना हक था या नहीं, यह सवाल संयुक्त परिवार की संपत्तियों के बंटवारे से जुड़े मुकदमे में तय नहीं किया जा सकता।
जस्टिस संदीप वी.मारने ने यह टिप्पणी एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें याचिकाकर्ताओं ने सिटी सिविल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी, जिसके जरिए बंटवारे के मुकदमे में वादपत्र में संशोधन की उनकी अर्जियां खारिज कर दी गईं।
बंटवारे का मूल मुकदमा पाटिल परिवार के सदस्यों ने दायर किया। इसमें एक जमीन, सर्वे नंबर 151ए, को संयुक्त परिवार की संपत्ति घोषित करने और उसका हिस्सों के अनुसार बंटवारा करने की मांग की गई।
हालांकि, मुकदमा दायर होने से पहले ही यह जमीन खोट परिवार ने 14 जनवरी 1971 के दस्तावेज के जरिए बाफना चैरिटेबल ट्रस्ट को हस्तांतरित की थी। इसके बाद ट्रस्ट ने अदालत से सर्वे नंबर 151ए को बंटवारे के मुकदमे से हटाने का आदेश हासिल किया।
इसके बाद वादियों ने बाफना चैरिटेबल ट्रस्ट को मुकदमे में पक्षकार बनाने और सर्वे नंबर 151ए को फिर से मुकदमे में शामिल करने के लिए वादपत्र में संशोधन की मांग की।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि ट्रस्ट ने जमीन को मुकदमे से हटाने की मांग केवल इस आधार पर की थी कि उसे मुकदमे में प्रतिवादी नहीं बनाया गया।
हाईकोर्ट ने पाया कि वादियों को मुकदमा दायर करते समय ही इस बात की जानकारी थी कि खोट परिवार 14 जनवरी 1971 के दस्तावेज के जरिए सर्वे नंबर 151ए की जमीन बाफना चैरिटेबल ट्रस्ट को हस्तांतरित कर चुका था। इसके बावजूद वादियों ने जानबूझकर ट्रस्ट को पक्षकार नहीं बनाया, ताकि मुकदमे में अलग-अलग कारणों से जुड़े दावों को एक साथ लाने की समस्या न हो।
कोर्ट ने कहा कि अब ट्रस्ट को मुकदमे में शामिल करने की अनुमति देने से वादियों का रुख असंगत हो जाएगा।
हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि संयुक्त परिवार की संपत्ति के किसी कर्ता या सह-उत्तराधिकारी द्वारा किए गए हस्तांतरण को बंटवारे के मुकदमे में चुनौती दी जा सकती है।
कोर्ट ने कहा,
“कर्ता या किसी अन्य सह-उत्तराधिकारी द्वारा संयुक्त परिवार की संपत्ति के हस्तांतरण को बंटवारे के मुकदमे में चुनौती दी जा सकती है। लेकिन यह चुनौती बंटवारे के मुकदमे से अलग नहीं हो सकती। हस्तांतरण की वैधता और बंटवारे से जुड़े विवाद का समाधान संयुक्त रूप से किए गए मुकदमे में ही हो सकता है।”
लेकिन मौजूदा मामले में जमीन का हस्तांतरण किसी सह-उत्तराधिकारी ने नहीं, बल्कि एक बाहरी व्यक्ति यानी खोट परिवार ने किया। इसलिए हाईकोर्ट ने कहा कि खोट परिवार द्वारा बाफना चैरिटेबल ट्रस्ट के पक्ष में किए गए हस्तांतरण की वैधता पाटिल परिवार के सदस्यों के बीच चल रहे बंटवारे के मुकदमे में तय नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने कहा,
“खोट परिवार के पास बाफना चैरिटेबल ट्रस्ट को संपत्ति का मालिकाना हक हस्तांतरित करने का अधिकार था या नहीं, यह सवाल पाटिल परिवार की संयुक्त पारिवारिक संपत्तियों के बंटवारे के मुकदमे में तय नहीं किया जा सकता।”
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि प्रस्तावित संशोधन समय-सीमा के कारण स्पष्ट रूप से बाधित थे। वादियों को 1971 के दस्तावेज की जानकारी मुकदमा दायर करते समय ही थी, लेकिन बाफना चैरिटेबल ट्रस्ट के खिलाफ राहत मांगने वाला संशोधन मई 2010 में दाखिल किया गया।
इसी तरह अतुल बिल्डर्स से संबंधित संशोधन भी समय-सीमा से बाधित पाया गया, क्योंकि अतुल बिल्डर्स बाफना चैरिटेबल ट्रस्ट के अधिकारों की जगह आया था।
कोर्ट ने कहा कि संशोधन की अनुमति देने से मुकदमे का मूल स्वरूप ही बदल जाता। संयुक्त परिवार की संपत्ति के बंटवारे के सवाल से शुरू हुआ मुकदमा खोट परिवार द्वारा बाफना चैरिटेबल ट्रस्ट के पक्ष में किए गए हस्तांतरण की वैधता की जांच में बदल जाता।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि सिटी सिविल कोर्ट ने वादपत्र में संशोधन की अर्जियां खारिज करके कोई गलती नहीं की।
जस्टिस संदीप वी. मर्ने ने रिट याचिका खारिज की।