बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि यौन इरादे से किसी बच्चे का अंडरगारमेंट उतारना, भले ही इसके बाद कोई अन्य कृत्य न किया गया हो, लैंगिक अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के तहत यौन हमले का प्रयास माना जा सकता है।

अदालत ने साढ़े तीन साल की बच्ची से जुड़े मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की सजा पांच साल से घटाकर साढ़े तीन साल के कठोर कारावास में बदल दी। इसके लिए POCSO Act की धारा 18 लागू की गई।

जस्टिस अभय एस. वाघवसे एक ऐसी अपील पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें एडिशनल सेशंस जज द्वारा भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354 और POCSO Act की धारा 9(एम) के साथ धारा 10 के तहत दर्ज दोषसिद्धि को चुनौती दी गई।

अभियोजन पक्ष के अनुसार आरोपी बच्ची को मवेशियों के बाड़े में ले गया और उसने बच्ची के साथ-साथ अपने अंडरगारमेंट भी उतार दिए। अभियोजन का आरोप था कि इसके बाद उसने बच्ची का यौन उत्पीड़न किया।

अपीलकर्ता ने दलील दी कि साक्ष्यों से वास्तविक यौन हमला साबित नहीं होता। उसने कहा कि अभियोजन के आरोपों को सही मानने पर भी उसका कृत्य अधिकतम यौन हमला करने के प्रयास की श्रेणी में आ सकता है।

हाईकोर्ट ने बच्ची की मां और दादा द्वारा बच्ची से सुनी गई बातों के संबंध में दिए गए बयानों में असंगतियां पाईं। अदालत ने यह भी गौर किया कि बच्ची के निजी अंगों में लालिमा होने के संबंध में मां के दावे को चिकित्सकीय साक्ष्यों से समर्थन नहीं मिला।

POCSO Act की धारा 7 की जांच करते हुए अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष जिस कृत्य को साबित कर सका, वह यौन इरादे से बच्ची का अंडरगारमेंट उतारना था। चूंकि आरोपी इसके आगे कोई कृत्य नहीं कर पाया इसलिए उसका आचरण यौन हमला करने के प्रयास के रूप में माना जाएगा।

अदालत ने कहा,

“अंडरगारमेंट उतारने का कृत्य ही ऐसा है जिसे साबित किया गया और यह स्पष्ट रूप से यौन इरादे से किया गया। जब आरोपी अंडरगारमेंट उतारने से आगे नहीं बढ़ा तो इस कृत्य को यौन हमला करने का प्रयास कहा जा सकता है।”

चूंकि पीड़िता की उम्र 12 वर्ष से कम थी इसलिए POCSO Act की धारा 9(एम), जो गंभीर प्रकृति के यौन हमले से संबंधित है लागू हुई। अदालत ने आगे कहा कि इस मामले में POCSO Act की धारा 18 भी लागू होती है, जो अपराध करने के प्रयास के लिए सजा का प्रावधान करती है।

अदालत के अनुसार धारा 9(एम) के तहत अपराध के लिए अधिकतम कारावास सात साल था। ऐसे में अपराध के प्रयास के लिए लागू सजा की गणना इस अवधि के आधे के आधार पर की गई, जो साढ़े तीन साल होती है।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से उठाई गई आपत्ति पर विचार करते हुए अदालत ने कहा कि बच्ची और उसकी मां की अदालत में दी गई मौखिक गवाही को प्राथमिकता दी जाएगी। इसके मुकाबले दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 164 के तहत दर्ज बच्ची का बयान केवल पुष्टिकारी साक्ष्य था न कि मूल साक्ष्य।

अदालत ने टिप्पणी की,

“यहां मूल साक्ष्य यानी पीड़िता और उसकी मां की गवाही को प्राथमिकता दी जाएगी न कि CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज पीड़िता के बयान को, क्योंकि वह केवल पुष्टिकारी साक्ष्य है, मूल साक्ष्य नहीं।”

इस आधार पर हाईकोर्ट ने अपील आंशिक रूप से स्वीकार की दोषसिद्धि में संशोधन किया और आरोपी की सजा घटाकर साढ़े तीन साल के कठोर कारावास में बदल दी।

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: