सरकारी नीतियों के विरोध पर नागरिक को शहर से बाहर नहीं किया जा सकता: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि सरकार की नीतियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन आयोजित करना या असहमति जताना किसी नागरिक को शहर से बाहर (Extern) करने का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि ऐसी कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन है।
जस्टिस माधव जे. जामदार ने सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के सचिव सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी के खिलाफ जारी एक्सटर्नमेंट आदेश और उसके खिलाफ पारित अपीलीय आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता की गतिविधियों से लोगों में भय, खतरा या सार्वजनिक शांति भंग होने की स्थिति पैदा हुई।
याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज अधिकांश एफआईआर केंद्र सरकार के कुछ फैसलों के विरोध में आयोजित मोर्चों, धरनों और प्रदर्शनों से संबंधित थीं। इनमें मुख्य रूप से बिना पुलिस अनुमति प्रदर्शन करने को लेकर तत्कालीन आईपीसी की धारा 188 के तहत मामले दर्ज किए गए थे।
हाईकोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धारा 56 के तहत एक्सटर्नमेंट तभी किया जा सकता है, जब किसी व्यक्ति की गतिविधियों से वास्तव में लोगों या संपत्ति को खतरा हो या उसके हिंसक अपराधों में शामिल होने के उचित आधार हों। केवल विरोध प्रदर्शन करने या सरकार के खिलाफ आवाज उठाने से यह शर्त पूरी नहीं होती।
सुप्रीम कोर्ट के Anuradha Bhasin v. Union of India फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए दी गई शक्तियों का इस्तेमाल नागरिकों की लोकतांत्रिक असहमति या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता। इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने एक्सटर्नमेंट का आदेश रद्द कर याचिका स्वीकार कर ली।