डॉ. आंबेडकर शोर-शराबे नहीं, बौद्धिक विकास और वंचितों के उत्थान को देते थे प्राथमिकता: बॉम्बे हाइकोर्ट ने जन्म जयंती समारोहों पर उठाए सवाल
बॉम्बे हाइकोर्ट ने डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती पर तेज आवाज, नारेबाजी और पटाखों के साथ होने वाले आयोजनों पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि डॉ. आंबेडकर संभवतः ऐसे उत्सव के बजाय बौद्धिक विकास, सामाजिक सुधार और वंचित वर्गों के सशक्तिकरण पर केंद्रित आयोजन को प्राथमिकता देते थे।
जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के और जस्टिस निवेदिता मेहता की खंडपीठ ने नागपुर स्थित संविधान चौक पर डॉ. आंबेडकर जयंती की पूर्व संध्या पर हुए कार्यक्रमों के दौरान अत्यधिक शोर, नारेबाजी और पटाखों पर आपत्ति जताई। अदालत के समक्ष न्यायमित्र ने कहा था कि यह आचरण ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियम, 2000 और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आम नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन है।
खंडपीठ ने अपने 28 अप्रैल के आदेश में कहा,
“हमें यह विचार रखने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है कि क्या यह उत्सव वास्तव में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों के अनुरूप है।”
अदालत ने कहा कि डॉ. आंबेडकर भारतीय संविधान के शिल्पकार और सामाजिक लोकतंत्र के प्रबल समर्थक थे, जिनकी सोच यह थी कि किसी व्यक्ति की प्रगति दूसरे की गरिमा की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।
खंडपीठ ने कहा कि डॉ. आंबेडकर मानवाधिकारों के महान रक्षक, दार्शनिक, समाज सुधारक, अर्थशास्त्री, विधिवेत्ता और विश्वप्रसिद्ध चिंतक थे। उन्होंने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि अधिकार केवल कानून से नहीं, बल्कि समाज की नैतिक और सामाजिक चेतना से भी सुरक्षित होते हैं।
अदालत ने कहा,
“अपने अधिकारों की रक्षा करते समय दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना भी आवश्यक है। हर व्यक्ति को अपने घर में शांति और आराम का अधिकार है।”
खंडपीठ ने टिप्पणी की कि राष्ट्रीय महापुरुषों की जयंती केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि उनके आदर्शों और बलिदानों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम है। अदालत ने कहा कि डॉ. आंबेडकर संभवतः अपनी जयंती को महिलाओं के सशक्तिकरण, वंचितों के उत्थान, जातिगत भेदभाव के उन्मूलन और सामाजिक चेतना के प्रसार से जोड़कर देखना पसंद करते।
हाईकोर्ट ने आयोजनकर्ताओं से पूछा कि क्या जयंती मनाते समय डॉ. आंबेडकर के सिद्धांतों और विचारों का प्रचार-प्रसार वास्तव में किया गया।
अदालत ने यह भी कहा कि रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक तेज आवाजें, नारेबाजी और पटाखे ध्वनि प्रदूषण नियमों का उल्लंघन हैं तथा बुजुर्गों, बच्चों और बीमार व्यक्तियों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। अदालत ने पक्षियों पर भी इसके दुष्प्रभाव का उल्लेख किया।
खंडपीठ ने कहा कि जहां उत्सव मनाना सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का हिस्सा है, वहीं जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार सर्वोपरि है। उत्सव, पर्व या विरोध-प्रदर्शन जनस्वास्थ्य, सुरक्षा और पर्यावरणीय मानकों का उल्लंघन नहीं कर सकते।
इसी के साथ अदालत ने आयोजकों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। नागपुर पुलिस आयुक्त को भी यह बताने का निर्देश दिया गया कि आम नागरिकों के अनुच्छेद 21 के अधिकारों की रक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए।
मामले की अगली सुनवाई 9 जून, 2026 को होगी।