मामले में कुछ तो गड़बड़ है: चार्जशीट तैयार होने के एक साल बाद भी कोर्ट में दाखिल नहीं करने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उठाए सवाल, गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव से मांगा जवाब
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए पूछा कि करीब एक साल पहले चार्जशीट तैयार किए जाने के बावजूद उसे संबंधित अदालत में दाखिल क्यों नहीं किया गया। अदालत ने टिप्पणी की कि मामले में ऐसा कुछ है, जो पहली नजर में दिखाई नहीं दे रहा।
खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार के गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर देरी का कारण बताने और ऐसे मामलों में की जाने वाली सुधारात्मक या दंडात्मक कार्रवाई की जानकारी देने का निर्देश दिया।
जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस राजीव भारती की खंडपीठ निहारिका मिश्रा की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में पुलिस अधिकारियों को उस एफआईआर में चार्जशीट दाखिल करने का निर्देश देने की मांग की गई, जो आपराधिक धमकी और अश्लील सामग्री प्रकाशित या प्रसारित करने से संबंधित धाराओं के तहत दर्ज की गई।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि 25 अगस्त 2026 को हाईकोर्ट के सामने पुलिस अधिकारियों ने कहा था कि चार्जशीट भेज दी गई और जल्द ही अदालत में दाखिल होने की संभावना है। इसके बावजूद पुलिस ने अब तक इसे संबंधित अदालत में पेश नहीं किया।
राज्य सरकार की ओर से अपर सरकारी वकील ने अधिकारियों से मिले निर्देशों के आधार पर बताया कि 26 अक्टूबर 2025 को चार्जशीट तैयार की गई और 20 दिसंबर 2025 को इसे क्षेत्राधिकारी के पास भेज दिया गया। हालांकि, 13 जनवरी 2026 को सहायक अभियोजन अधिकारी ने इस पर आपत्तियां उठाईं, जिसके बाद मामले को आगे की जांच के लिए वापस भेज दिया गया। राज्य सरकार ने कहा कि चार्जशीट जल्द से जल्द संबंधित अदालत में दाखिल करने का प्रयास किया जाएगा।
इस पर खंडपीठ ने पाया कि राज्य सरकार की ओर से दी गई ताजा जानकारी 25 अगस्त 2026 के पिछले आदेश में दर्ज तथ्यों से मेल नहीं खाती। अदालत ने कहा कि सहायक अभियोजन अधिकारी की आपत्तियों के बाद मामले को आगे की जांच के लिए भेजे जाने की जानकारी पहले की सुनवाई के दौरान अपर सरकारी वकील को नहीं दी गई।
खंडपीठ ने कहा कि जब राज्य की सर्वोच्च अदालत यानी हाईकोर्ट के सामने मामला विचाराधीन था, तब अधिकारियों से अपेक्षा थी कि वे पूरी जानकारी के साथ अदालत के समक्ष उपस्थित होते। ऐसी स्थिति में तथ्यों को छिपाने की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि चार्जशीट तैयार कर ली गई, लेकिन करीब एक साल बीत जाने के बाद भी उसे अंतिम रूप देकर संबंधित अदालत में दाखिल नहीं किया गया। खंडपीठ के अनुसार, अधिकारियों के लिए किसी मामले को करीब एक साल तक लंबित रखे रहने का कोई औचित्य नहीं हो सकता।
हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 177 का भी उल्लेख किया। पीठ ने कहा कि इस प्रावधान में पुलिस रिपोर्ट दाखिल करने के लिए कोई निश्चित समयसीमा तय नहीं की गई, लेकिन इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को बिना देरी के भेजी जानी चाहिए।
अदालत ने कहा कि उसके सामने अक्सर ऐसे मामले आते हैं, जिनमें अधिकारी बताते हैं कि चार्जशीट तैयार कर पर्यवेक्षी अधिकारियों को भेज दी गई है, लेकिन बाद में उसे संबंधित अदालत में दाखिल नहीं किया जाता। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि अधिकारी एक ओर चार्जशीट तैयार होने के बावजूद उसे अपने पास लंबित नहीं रख सकते और दूसरी ओर, याचिकाकर्ता भी इस आश्वासन के आधार पर अपनी याचिका वापस लेने के लिए बाध्य नहीं हो सकते कि चार्जशीट आगे भेज दी गई।
खंडपीठ ने राज्य सरकार से यह भी अपेक्षा जताई कि वह उचित नियम या दिशा-निर्देश बनाए, जिनमें चार्जशीट तैयार होने के बाद उसे संबंधित अदालत में दाखिल करने की समयसीमा निर्धारित हो।
अदालत ने सवाल उठाया कि जब BNSS की धारा 177 पुलिस रिपोर्ट बिना देरी के मजिस्ट्रेट को भेजने की मांग करती है, तो अधिकारी चार्जशीट को अपने पास लंबित क्यों रख रहे हैं। इसी संदर्भ में पीठ ने टिप्पणी की कि मामले में कुछ तो ऐसा है, जो पहली नजर में दिखाई नहीं दे रहा।
हाईकोर्ट ने गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव को तीन सप्ताह के भीतर व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। हलफनामे में बताना होगा कि चार्जशीट संबंधित अदालत में क्यों नहीं भेजी गई और उसे पर्यवेक्षी अधिकारी तथा जांच अधिकारी के बीच बार-बार क्यों भेजा जाता रहा। साथ ही, ऐसे मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ की जाने वाली सुधारात्मक या दंडात्मक कार्रवाई का भी ब्योरा देना होगा।
मामले को 19 नवंबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि अपर मुख्य सचिव व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल नहीं करते हैं, तो उन्हें संबंधित रिकॉर्ड के साथ व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अदालत की सहायता करनी होगी। इस बीच, खंडपीठ ने उम्मीद जताई कि मौजूदा मामले में पुलिस रिपोर्ट जल्द संबंधित अदालत में दाखिल कर दी जाएगी।