अली ख़ामेनेई के पोस्टर हटाने के आरोपों पर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- आरोप सामान्य और अस्पष्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश पुलिस पर ईरान के धार्मिक नेताओं के चित्र मनमाने ढंग से हटाने का आरोप लगाते हुए दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया। अदालत ने कहा कि याचिका में पुलिस के खिलाफ लगाए गए आरोप सामान्य और अस्पष्ट हैं तथा किसी विशेष घटना का उल्लेख नहीं किया गया।
जस्टिस राजन राय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने मजलिस उलेमा-ए-हिंद की ओर से उसके महासचिव मौलाना सैयद कल्बे जवाद नकवी द्वारा दायर जनहित याचिका का निस्तारण करते हुए राहत देने से इनकार किया।
याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया कि उत्तर प्रदेश के सभी जिला पुलिस प्रमुखों और थाना प्रभारियों को निर्देश दिया जाए कि वे शांतिपूर्ण ढंग से धार्मिक नेताओं के चित्र प्रदर्शित करने या धार्मिक शोक सभाओं में भाग लेने वाले लोगों के खिलाफ कोई दमनात्मक कार्रवाई न करें।
याचिकाकर्ता ने विशेष रूप से अदालत से मांग की थी कि पुलिस को आयतुल्ला सैयद अली ख़ामेनेई और आयतुल्ला सैयद अली अल-सिस्तानी सहित अन्य धार्मिक नेताओं के बैनर, चित्र या पोस्टर, यदि वे निजी आवासों या व्यावसायिक परिसरों में विधिसम्मत तरीके से लगाए गए हों, हटाने या हटवाने से रोका जाए।
साथ ही, 12 जून 2026 को अधिकारियों को भेजे गए अभ्यावेदन पर निर्णय लेने का भी निर्देश देने की मांग की गई।
हाईकोर्ट ने याचिका का अवलोकन करने के बाद कहा कि इसमें केवल यह सामान्य आरोप लगाया गया कि पुलिस शिया समुदाय के प्रिय ईरानी धार्मिक नेताओं के पोस्टर हटवा रही है। हालांकि, किसी भी ऐसी घटना का स्पष्ट विवरण नहीं दिया गया, जहां किसी विशेष मकान, भवन या परिसर से पोस्टर हटाया गया हो या यह बताया गया हो कि कथित कार्रवाई किस प्रकार की गई।
अदालत ने कहा कि ऐसे सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर इतनी व्यापक राहत देने का कोई कारण नहीं बनता।
खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी विशेष पुलिस अधिकारी के खिलाफ किसी कानून के तहत कोई ठोस शिकायत या कारण उत्पन्न होता है, तो संबंधित व्यक्ति कानून में उपलब्ध उचित उपाय अपना सकता है।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जनहित याचिका का निस्तारण किया।