विशेष अपील वापस लेने के बाद उसी आधार पर दोबारा कार्रवाई नहीं कर सकता राज्य, पुराने फैसले से बंधा रहेगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-08-11 10:38 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि राज्य किसी फैसले के खिलाफ दायर विशेष अपील को बिना दबाव के वापस ले लेता है और अपील खारिज हो जाती है तो वह उस फैसले में दर्ज निष्कर्षों को स्वीकार करने के बाद उन्हीं आधारों को लेकर दोबारा विवाद नहीं उठा सकता।

अदालत ने कहा कि किसी प्रशासनिक आदेश के जरिए पहले ही खारिज किए जा चुके आधारों पर दावे को फिर से अस्वीकार करना अदालत के फैसले के खिलाफ अपील या पुनर्विचार करने के समान है, जिसका प्रशासनिक अधिकारी को अधिकार नहीं है।

जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की पीठ ने कहा कि राज्य ने 2022 के फैसले के खिलाफ दायर विशेष अपील को बिना दबाव के वापस लेकर उस फैसले में दर्ज निष्कर्षों को स्वीकार कर लिया था। इसलिए बाद की कार्यवाही में उन्हीं आधारों को दोबारा उठाने से राज्य कानूनन रोक दिया गया।

अदालत ने कहा,

“विशेष अपील संख्या 65/2023 को बिना दबाव के खारिज कराकर राज्य ने इस अदालत के रिट-ए संख्या 5390/2022 में दिए निष्कर्षों को स्वीकार कर लिया और इसलिए कानूनन उन्हीं आधारों को दोबारा उठाने से रोक दिया गया।”

मामला उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग द्वारा वर्ष 2016 में तकनीकी शिक्षा निदेशालय कानपुर के अधीन पुस्तकालयाध्यक्ष के 69 पदों पर भर्ती से जुड़ा था।

इन पदों के लिए स्नातक के साथ पुस्तकालय विज्ञान में डिप्लोमा की योग्यता निर्धारित की गई। लिखित परीक्षा 28 जुलाई 2019 को हुई और इंटरव्यू के बाद 10 दिसंबर 2021 को परिणाम घोषित किया गया।

इसी दौरान वर्ष 2019 में अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद ने नियमों में बदलाव करते हुए पुस्तकालयाध्यक्ष के पद को समूह-ग से समूह-ख में कर दिया और इसके लिए पुस्तकालय विज्ञान में स्नातकोत्तर डिग्री तथा राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा की योग्यता निर्धारित की।

इसके बाद राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश तकनीकी शिक्षा शिक्षण सेवा नियमावली, 2021 लागू की, जो 9 जून 2021 से प्रभावी हुई। सितंबर 2021 में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने भी पुस्तकालयाध्यक्ष के 87 पदों के लिए अलग विज्ञापन जारी किया।

चयन पूरा होने के बावजूद नियुक्तियां नहीं होने पर चयनित अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

5 दिसंबर 2022 को एकल पीठ ने कहा था कि बाद में बदले गए नियमों को लंबित चयन प्रक्रिया पर लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसके लिए कोई संशोधन सूचना जारी नहीं की गई थी। अदालत ने यह भी कहा था कि राज्य ने मूल भर्ती की मांग वापस नहीं ली थी और चयन आयोग को उसे रद्द या संशोधित करने का अधिकार नहीं था।

एकल पीठ ने अधिकारियों को चयनित अभ्यर्थियों को एक महीने के भीतर नियुक्ति देने का निर्देश दिया था। हालांकि, यदि अधिकारी इस निष्कर्ष से अलग राय रखते हैं तो उन्हें उसी अवधि में अदालत के फैसले में की गई टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी गई थी।

इस फैसले के खिलाफ राज्य ने विशेष अपील दायर की, लेकिन उस पर कोई अंतरिम रोक नहीं मिली। अवमानना की कार्यवाही के दौरान राज्य ने 23 मार्च 2024 को चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्ति का दावा खारिज कर दिया। इसके बाद इस आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाएं एकल पीठ ने 30 जुलाई 2024 को खारिज कर दीं।

मामला खंडपीठ के समक्ष पहुंचने के बाद 9 फरवरी 2026 को राज्य ने 2022 के फैसले के खिलाफ अपनी विशेष अपील यह कहते हुए वापस ले ली कि वह पहले ही उस फैसले के अनुपालन में आदेश पारित कर चुका है।

खंडपीठ ने कहा कि बाद की कार्यवाही में राज्य ने जिन आधारों पर नियुक्ति से इनकार किया वे सभी पहले ही 2022 के फैसले में उठाए जा चुके थे और अदालत उन्हें खारिज कर चुकी थी। ऐसे में वही मुद्दे दोबारा उठाना स्वीकार नहीं किया जा सकता।

अदालत ने पुनर्विचार और पुनःविचार-वर्जन के सिद्धांत को लागू करते हुए कहा कि किसी बाद की कार्यवाही में पुनर्विचार-वर्जन तभी लागू होता है, जब पहले और बाद की कार्यवाही में विवादित मुद्दा मूल रूप से वही हो, पक्षकार वही हों वे समान अधिकार के आधार पर मुकदमा लड़ रहे हों पहले फैसला देने वाली अदालत को बाद की कार्यवाही पर भी अधिकार क्षेत्र प्राप्त हो और विवाद का पहले गुण-दोष के आधार पर अंतिम निर्णय हो चुका हो।

हाईकोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि कोई प्रशासनिक अधिकारी सक्षम अदालत के फैसले पर अपील या पुनर्विचार नहीं कर सकता।

कोर्ट ने कहा,

“कानून स्पष्ट है कि कोई प्राधिकारी सक्षम अदालत द्वारा पारित आदेश के खिलाफ अपील या पुनर्विचार के अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकता।”

अदालत ने कहा कि 23 मार्च 2024 का प्रशासनिक आदेश वास्तव में 5 दिसंबर 2022 के फैसले के खिलाफ अपील करने जैसा था, जबकि अधिकारियों के पास ऐसा कोई अधिकार क्षेत्र नहीं था।

राज्य की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि पुराने वेतनमान में पुस्तकालयाध्यक्ष का कोई पद बचा ही नहीं था, क्योंकि सभी पदों को नए नियमों के तहत उच्चीकृत किया जा चुका था।

हाईकोर्ट ने इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि यह मुद्दा पहले ही उठाया जा सकता था, इसलिए बाद की कार्यवाही में इसे उठाना पुनर्विचार-वर्जन के सिद्धांत से बाधित है। अदालत ने यह भी पाया कि राज्य के जवाब में इस संबंध में कोई स्पष्ट आधार नहीं लिया गया।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के मोहनिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किसी प्रशासनिक आदेश की वैधता उसी में बताए गए कारणों के आधार पर परखी जाती है। बाद में नए कारण जोड़कर उस आदेश का बचाव नहीं किया जा सकता।

अदालत ने पाया कि 23 मार्च 2024 के आदेश में नियुक्ति से इनकार करने का कारण यह नहीं था कि पुस्तकालयाध्यक्ष के पद उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए इस आधार पर आदेश को सही ठहराने की कोशिश नहीं की जा सकती।

अदालत ने 2021 की नियमावली के परिशिष्ट-दो की क्रम संख्या छह का भी उल्लेख किया। इसमें 1996 से 2000 के बीच डिप्लोमा स्तर के संस्थानों में नियुक्त पुस्तकालयाध्यक्षों को कैरियर उन्नयन योजना के तहत अगले उच्च ग्रेड में पदोन्नति के लिए विचार किए जाने की व्यवस्था थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि पुस्तकालयाध्यक्ष के पद और उन पर कार्यरत कर्मचारी व्यवस्था में बने हुए थे।

खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि 2022 के फैसले में अधिकारियों को दी गई स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं था कि वे पहले से तय मुद्दों पर दोबारा फैसला कर सकते हैं। अदालत ने कहा कि उस फैसले में दी गई स्वतंत्रता को पूरे निर्देश के संदर्भ में पढ़ना होगा।

अदालत ने कहा कि अधिकारियों को किसी अन्य उचित और तर्कसंगत आधार पर दावा खारिज करने की स्वतंत्रता थी लेकिन उन आधारों पर नहीं जिन पर हाईकोर्ट पहले ही निर्णय दे चुका था और जिन्हें खारिज कर चुका था।

चूंकि 2022 के फैसले पर कोई रोक नहीं थी और बाद की कार्यवाही के समय वह फैसला रद्द भी नहीं हुआ, इसलिए उसके निष्कर्ष पक्षकारों पर बाध्यकारी थे। हाईकोर्ट ने कहा कि एकल पीठ को उन निष्कर्षों को बाद की कार्यवाही में निष्प्रभावी करने का अधिकार नहीं था।

खंडपीठ ने एकल पीठ का फैसला रद्द करते हुए दोनों अपीलें स्वीकार कर लीं। हाईकोर्ट ने चयनित अभ्यर्थियों को 5200-20200 रुपये के वेतनमान और 2800 रुपये के ग्रेड वेतन पर पुस्तकालयाध्यक्ष के पद पर नियुक्त करने का निर्देश दिया।

नियुक्ति का आदेश हाईकोर्ट के फैसले की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने की तारीख से एक महीने के भीतर जारी करने को कहा गया।

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