क्लाइंट के फ़ायदे के लिए वकील होने की बात छिपाकर PIL दाखिल करना 'अदालत के अधिकार का गंभीर दुरुपयोग': इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में जनहित याचिका (PIL) खारिज करते हुए कहा कि वकील होने की बात छिपाकर ऐसी याचिका दाखिल करना, जो असल में किसी क्लाइंट के फ़ायदे के लिए हो, "अदालत के PIL अधिकार क्षेत्र का गंभीर दुरुपयोग" है।
पेशे से वकील याचिकाकर्ता को अपना तरीका सुधारने की चेतावनी देते हुए कोर्ट ने कहा कि PIL सिस्टम के इस तरह के दुरुपयोग की इजाज़त नहीं दी जा सकती।
चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की बेंच ने ऐसे याचिकाकर्ता की PIL पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया, जिसने खुद को सामाजिक कार्यकर्ता बताया।
याचिकाकर्ता ने टेंडर देने में कथित मनमानी की जांच जल्द पूरी करने और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए निर्देश देने की मांग की। उसने विभागीय जांच पूरी होने तक प्रतिवादियों में से एक के रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले लाभों को रोकने की भी मांग की।
शुरुआत में ही, बेंच ने गौर किया कि हालांकि याचिकाकर्ता ने रिट याचिका में खुद को जन कल्याणकारी गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल सामाजिक कार्यकर्ता बताया, लेकिन उसने यह नहीं बताया कि वह एक वकील है।
कोर्ट ने पाया कि मुख्यमंत्री को दी गई उसकी अर्जी में उसे साफ तौर पर झांसी में रहने वाले वकील के तौर पर बताया गया, जिसे सुनवाई के दौरान उसके वकील ने भी माना।
कोर्ट ने आगे कहा कि PIL की पूरी सामग्री से पता चलता है कि याचिकाकर्ता 'मेसर्स बाजपेयी ट्रेडर्स' को पहले दिए गए कॉन्ट्रैक्ट को रद्द करने और उसके बाद दो अन्य फर्मों को कॉन्ट्रैक्ट दिए जाने से नाराज़ था।
याचिका के साथ लगी अर्जी की बारीकी से जांच करने के बाद बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता का असली मकसद सामने आ गया।
उसने गौर किया कि अर्जी में खास तौर पर बाद की टेंडर प्रक्रिया को रद्द करने और कॉन्ट्रैक्ट 'मेसर्स बाजपेयी ट्रेडर्स' को देने की मांग की गई। साथ ही संबंधित अधिकारी को सस्पेंड करने और उच्च-स्तरीय जांच की भी मांग की गई।
इस पहलू पर ज़ोर देते हुए कोर्ट ने कहा:
"यह तथ्य कि याचिकाकर्ता एक वकील है। उसने खुद को सोशल एक्टिविस्ट बताकर जनहित में याचिका दाखिल करते हुए किसी खास पार्टी को कॉन्ट्रैक्ट देने की मांग की, असल में जनहित याचिका के अधिकार क्षेत्र का गंभीर दुरुपयोग है।"
बेंच ने इस बात पर भी गौर किया कि 'मेसर्स बाजपेयी ट्रेडर्स' ने पहले भी उसी वकील के ज़रिए रिट याचिकाएं दाखिल करके कॉन्ट्रैक्ट रद्द किए जाने को चुनौती दी, जो मौजूदा PIL में पेश हो रहा है। हालांकि पहली याचिका वापस ले ली गई, लेकिन दूसरी याचिका अभी भी लंबित थी, जिसमें डिवीज़न बेंच ने पहले ही निर्देश दिया कि प्राइवेट प्रतिवादी को दिया गया टेंडर उस रिट याचिका के नतीजे के अधीन होगा।
कोर्ट के अनुसार, ऐसा लगता है कि मौजूदा PIL कोर्ट की छुट्टियों के दौरान दायर की गई ताकि पिछली कार्यवाही के लंबित होने के बावजूद कोई आदेश प्राप्त किया जा सके।
कोर्ट ने आगे कहा कि यह तथ्य कि याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी में M/s बाजपेयी ट्रेडर्स के लिए राहत मांगी, जबकि उनका प्रतिनिधित्व करने वाले वकील पहले रिट याचिकाओं में उसी फर्म के लिए पेश हो चुके थे, यह महज एक संयोग नहीं हो सकता।
कोर्ट ने PIL अधिकार क्षेत्र के दुरुपयोग पर कड़ा रुख अपनाते हुए निम्नलिखित टिप्पणी की:
"वकीलों द्वारा अपनी स्थिति छिपाकर और जनहित का दावा करते हुए PIL दायर करना, जो असल में उनके मुवक्किलों का हित होता है, PIL अधिकार क्षेत्र की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग है, जिसकी अनुमति नहीं दी जा सकती"।
नतीजतन, कोर्ट ने PIL खारिज कर दी और याचिकाकर्ता को अपना व्यवहार सुधारने की चेतावनी दी। साथ ही यह भी कहा कि भविष्य में ऐसा कोई भी आचरण करने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।
Case title - Rakesh Mishra vs State of U.P. and 4 others 2026 LiveLaw (AB) 476