इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक अपीलों में वकीलों द्वारा कागजी बंडल उपलब्ध न होने के आधार पर बार-बार सुनवाई टालने की मांग पर चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि इससे न्यायिक समय की भारी बर्बादी हो रही है और जजों को न्यायिक निर्णय लेने के बजाय “क्लर्कों की तरह” काम करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

जस्टिस सलिल कुमार राय और जस्टिस पदम नारायण मिश्रा की खंडपीठ ने यह टिप्पणी दो आपराधिक अपीलों की सुनवाई के दौरान की। इन मामलों में अधिवक्ता ने यह कहते हुए सुनवाई टालने का अनुरोध किया कि उन्हें कागजी बंडल नहीं मिला।

खंडपीठ ने कहा कि सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करीब 80 प्रतिशत आपराधिक अपीलों में अपीलकर्ता के वकील कागजी बंडल नहीं मिलने या उसके तैयार होने की जानकारी नहीं होने के आधार पर स्थगन मांगते हैं।

कोर्ट ने कहा,

“इस तरह की कार्यप्रणाली इस संस्था की गरिमा को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। इससे कानून की अदालत एक प्रशासनिक सूचना केंद्र जैसी बन जाती है और हमें न्यायिक निर्णय लेने की गंभीर जिम्मेदारी निभाने वाले जजों के बजाय क्लर्कों की तरह पूछताछ काउंटर पर बैठने के लिए मजबूर होना पड़ता है।”

ये टिप्पणियां वर्ष 2023 की दो संबंधित आपराधिक अपीलों की सुनवाई के दौरान की गईं। कोर्ट ने बताया कि दोनों अपीलें 21 जुलाई 2026 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध थीं और उस तारीख तक उनके कागजी बंडल तैयार हो चुके थे।

हालांकि, 5 अगस्त को सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता के वकील ने यह कहते हुए स्थगन मांगा कि उन्हें कागजी बंडल नहीं मिला। जब कोर्ट ने बताया कि कागजी बंडल 21 जुलाई को ही तैयार हो चुका था, तो वकील ने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी।

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि वह वकील के खिलाफ कोई आरोप नहीं लगा रही है। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में यह विश्वास करना मुश्किल है कि वकील को कागजी बंडल तैयार होने की जानकारी नहीं थी।

कोर्ट ने कहा कि वह इस पहलू पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं कर रही है, लेकिन परिस्थितियों को देखते हुए कागजी बंडल तैयार होने की जानकारी न होने की दलील “आज सुनवाई टालने का महज बहाना” लगती है।

खंडपीठ ने आपराधिक अपीलों में कागजी बंडल और स्थगन से जुड़ी व्यापक समस्या पर भी ध्यान दिया। कोर्ट ने कहा कि कई मामलों में कागजी बंडल तीन या चार वर्ष पहले ही तैयार हो चुके होते हैं, लेकिन वकील बाद में भी यही कहते रहते हैं कि उन्हें कागजी बंडल नहीं मिला।

हाईकोर्ट ने अपने नियमों का अध्ययन करने के बाद कहा कि ऐसा कोई नियम नहीं है, जिसके तहत अदालत का प्रशासनिक विभाग कारण सूची या वेबसाइट पर आधिकारिक सूचना प्रकाशित करने के लिए बाध्य हो कि किसी आपराधिक अपील का कागजी बंडल तैयार हो चुका है और उसे कार्यालय से प्राप्त किया जा सकता है।

खंडपीठ ने संबंधित अनुभाग अधिकारी और रजिस्ट्रार को बुलाया। उन्होंने बताया कि कागजी बंडल तैयार होने के बाद पक्षकारों के वकीलों को फोन के जरिए सूचना दी जाती है। हालांकि, ऐसी सूचना दिए जाने का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं रखा जाता।

कोर्ट ने कहा कि यह व्यवस्था तब मददगार नहीं है, जब बड़ी संख्या में वकील कागजी बंडल नहीं मिलने की दलील देकर सुनवाई टालने की मांग कर रहे हों।

खंडपीठ ने सक्षम समिति से हाईकोर्ट के नियमों में संशोधन करने या प्रशासनिक आदेश जारी करने पर विचार करने का अनुरोध किया। इसके तहत संबंधित अनुभाग को हर सप्ताह उन आपराधिक अपीलों की सूचना प्रकाशित करने के लिए कहा जा सकता है, जिनके कागजी बंडल तैयार हो चुके हैं।

कोर्ट ने सुझाव दिया कि ऐसी सूचना हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट या किसी अन्य उचित माध्यम से प्रकाशित की जा सकती है। साथ ही इन अपीलों को कागजी बंडल प्राप्त करने के लिए वकीलों को निर्धारित समय दिए जाने के बाद ही सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए।

खंडपीठ ने कहा कि इस तरह का सक्रिय कदम अदालत को अपीलों का गुण-दोष के आधार पर फैसला करने में सक्षम बनाएगा और न्यायिक समय की “भारी बर्बादी” रोकने में मदद करेगा।

हालांकि, इन टिप्पणियों के बावजूद कोर्ट ने उस दिन की सुनवाई स्थगित की, क्योंकि अपीलकर्ता के वकील ने कहा कि उन्हें कागजी बंडल प्राप्त नहीं हुआ। अपील को सामान्य प्रक्रिया के तहत दोबारा सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया।

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