S. 482 CrPC | पहले से उपलब्ध, लेकिन छोड़े गए आधारों पर लगातार रद्द करने वाली याचिकाएं स्वीकार्य नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-04-08 17:42 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को एक आरोपी द्वारा उसी आपराधिक कार्यवाही के संबंध में दायर 'तीसरी' रद्द करने वाली याचिका खारिज की। इस याचिका में ऐसा आधार उठाया गया, जो पहले से उपलब्ध था, लेकिन उस समय नहीं उठाया गया।

जस्टिस समित गोपाल की बेंच ने स्पष्ट रूप से फैसला दिया कि CrPC की धारा 482 के तहत लगातार दायर की गई ऐसी रद्द करने वाली याचिकाएं स्वीकार्य नहीं हैं, जिनमें उन आधारों पर आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की गई हो जो पहले से उपलब्ध थे।

सिंगल जज ने टिप्पणी करते हुए कहा,

"आवेदक द्वारा पिछली दो याचिकाओं के समय छोड़ा गया कोई भी आधार—भले ही उस समय वह उपलब्ध था—बाद के समय में फिर से नहीं उठाया जा सकता।"

उन्होंने टुकड़ों में चुनौतियां देने की इस प्रथा की निंदा की और आवेदक के बार-बार किए जा रहे प्रयासों को 'फोरम हंटिंग' (अपनी पसंद की अदालत खोजने) का कृत्य करार दिया।

संक्षेप में मामला

आवेदक रामदुलार सिंह ने याचिका दायर कर 2019 की चार्जशीट, समन आदेश और वाराणसी में एक अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित धोखाधड़ी और जालसाजी के मामले की पूरी कार्यवाही को चुनौती दी थी।

सुनवाई के दौरान, प्रतिवादी के वकील ने याचिका की स्वीकार्यता के संबंध में कड़ा प्रारंभिक आपत्ति उठाई। कोर्ट के संज्ञान में यह बात लाई गई कि आवेदक ने इसी मामले के लिए CrPC की धारा 482 के तहत पहले ही 2 याचिकाएं दायर की थीं।

बेंच ने पाया कि पहली याचिका सितंबर 2019 में खारिज की गई। उस याचिका में आवेदक ने ट्रायल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में खुद को प्रस्तुत किए बिना ही आरोपमुक्त (discharge) होने की मांग की थी, और उसने जमानत भी प्राप्त नहीं की थी।

दूसरी याचिका 2022 में एक गैर-जमानती वारंट (NBW) को चुनौती देने के लिए दायर की गई, और उसमें पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग भी की गई।

अंत में, प्रतिवादी ने यह तर्क दिया कि कार्यवाही रद्द करने की मांग को 2022 में ही प्रभावी रूप से छोड़ दिया गया। यह तीसरी याचिका केवल मामले में ट्रायल में देरी करने की एक चाल थी।

दूसरी ओर, आवेदक के वकील ने यह तर्क दिया कि पिछली याचिकाओं से संबंधित तथ्यों का वर्तमान याचिका में पूरी तरह से खुलासा किया गया। उन्होंने दलील दी कि 2022 का हाईकोर्ट का आदेश केवल NBW से संबंधित था, और उसमें कार्यवाही को रद्द करने की मांग पर कोई फैसला नहीं दिया गया।

इसलिए उन्होंने तर्क दिया कि चार्जशीट और समन आदेश को चुनौती देने वाली वर्तमान याचिका स्वीकार्य होनी चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि यह मामला पूरी तरह से एक सिविल विवाद से जुड़ा है और आपराधिक कार्यवाही प्रक्रिया का दुरुपयोग है, जिसे केवल आवेदक को परेशान करने के लिए शुरू किया गया।

इस पृष्ठभूमि में जस्टिस गोपाल ने शुरू में ही यह बात नोट की कि MC Ravikumar बनाम DS Velmurugan 2025 LiveLaw (SC) 737 मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2025 के फैसले के अनुसार, किसी आरोपी व्यक्ति के लिए यह उचित नहीं है कि वह बार-बार हाईकोर्ट के अंतर्निहित क्षेत्राधिकार का हवाला देकर एक के बाद एक दलीलें पेश करे, जबकि ऐसी सभी दलीलें पहली बार में ही उपलब्ध थीं।

हाईकोर्ट ने विजय कुमार घई बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2022 के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 'फोरम शॉपिंग' (forum shopping) की निंदनीय प्रथा की कड़ी आलोचना की थी।

जस्टिस गोपाल ने टिप्पणी की कि आवेदक द्वारा पिछली दो याचिकाओं के समय छोड़े गए किसी आधार को बाद के समय में फिर से नहीं उठाया जा सकता। कोर्ट ने नोट किया कि आवेदक की आपत्तियां पूरी तरह से 'अधूरी' (piecemeal) थीं।

भले ही 2022 की याचिका में पूरी कार्यवाही को चुनौती दी गई, लेकिन उस समय आवेदक ने इसे छोड़ दिया था, और अब उसी चुनौती को वर्तमान याचिका में फिर से उठाया गया।

अतः, हाईकोर्ट ने यह राय व्यक्त की कि वर्तमान याचिका सुनवाई योग्य नहीं है, क्योंकि यह उसी आवेदक द्वारा अपने खिलाफ चल रही कार्यवाही को रद्द करवाने का एक दोहराया गया प्रयास है।

Case title - Ramdular Singh vs State of UP and another 2026 LiveLaw (AB) 191

Tags:    

Similar News