इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जारी कीं गाइडलाइंस: गैर-कानूनी प्रिवेंटिव डिटेंशन के लिए मजिस्ट्रेट और पुलिस अधिकारियों से वसूला जाएगा मुआवज़ा

Update: 2026-06-09 15:51 GMT

एक अहम फ़ैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि वह उन नागरिकों को ₹25,000 प्रति दिन का मुआवज़ा दे, जिन्हें BNSS के तहत शांति भंग करने के आरोप में प्रिवेंटिव डिटेंशन के प्रावधानों के तहत 24 घंटे से ज़्यादा समय तक गैर-कानूनी रूप से हिरासत में रखा गया।

जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने आगे निर्देश दिया कि यह मुआवज़ा सीधे दोषी मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारियों की सैलरी से वसूला जाना चाहिए।

इसके अलावा, बेंच ने आदेश दिया कि जो मजिस्ट्रेट और पुलिस अधिकारी इस चूक के लिए प्रथम दृष्टया ज़िम्मेदार पाए जाते हैं, उनके ख़िलाफ़ ड्यूटी में लापरवाही के लिए संबंधित सर्विस नियमों के अनुसार अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

बेंच ने यह भी निर्देश दिया कि ऐसे लोगों की रिहाई के लिए आम तौर पर ज़मानत (Surety) की मांग नहीं की जानी चाहिए। साथ ही, पर्सनल बॉन्ड की राशि ₹20,000 से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए।

डिविज़न बेंच ने राज्य में एक चिंताजनक ट्रेंड को देखते हुए यह आदेश पारित किया, जहां पुलिस अधिकारी और मजिस्ट्रेट शांति भंग होने की महज़ आशंका पर लोगों को कई दिनों के लिए जेल भेज रहे हैं और "बेहद गैर-ज़िम्मेदाराना तरीके" से काम कर रहे हैं।

मामले का संक्षिप्त विवरण

बेंच हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले दिव्यांग वकील चंद्र पाल सिंह द्वारा दायर 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

उनका मामला यह था कि 22 फरवरी, 2026 को गाज़ियाबाद पुलिस उन्हें ज़बरदस्ती ले गई। यह कार्रवाई एक पड़ोसी की मामूली शिकायत पर की गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि उन्होंने गेट लगाकर रास्ता रोक दिया।

उन्हें कानून के अनुसार 24 घंटे के भीतर किसी मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया और अगले दिन सिर्फ़ असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ़ पुलिस के सामने पेश किया गया। इसके बाद उन्हें CrPC की धारा 151/BNSS की धारा 170 के तहत जेल भेज दिया गया।

अगले दिन, सिंह और उनके भतीजे ने BNSS की धारा 170, 126 और 135 के तहत शांति बनाए रखने के लिए ₹50,000 का बॉन्ड भरा। इसके बावजूद उन्हें रिहा नहीं किया गया। सिंह द्वारा 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका दायर करने और हाईकोर्ट के दखल देकर राज्य सरकार से निर्देश मांगने के बाद ही उन्हें 25 फरवरी को रिहा किया गया। हालांकि, उनके भतीजे को 26 फरवरी को रिहा किया गया।

हाईकोर्ट का आदेश

इस मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए बेंच ने पाया कि राज्य सरकार की एक स्पष्ट नीति (23 मार्च, 2021 की) होने के बावजूद - जो सार्वजनिक शांति बनाए रखने के मामलों में ज़िला मजिस्ट्रेट, एग्ज़ीक्यूटिव और स्पेशल मजिस्ट्रेट को दिशा-निर्देश देती है - पुलिस अधिकारी और मजिस्ट्रेट "बहुत ही गैर-ज़िम्मेदाराना तरीके" से काम कर रहे हैं।

कोर्ट ने देखा कि जिन लोगों को शांति भंग होने से रोकने के लिए उसके सामने लाया जाता है, उन्हें अक्सर कई दिनों के लिए जेल भेज दिया जाता है।

बेंच ने राज्य भर में BNSS की धारा 170 के संबंध में हो रही गलती की ओर भी इशारा किया। इस धारा में किसी बॉन्ड को भरने या ज़मानत (surety) देने का कोई प्रावधान नहीं है।

फिर भी बेंच ने पाया कि जब भी शांति भंग करने के आरोप में किसी को गिरफ़्तार किया जाता है तो मजिस्ट्रेट गैर-कानूनी रूप से ₹50,000 के बॉन्ड और उतनी ही राशि की एक या दो ज़मानत की मांग करते हैं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि बेंच ने गाज़ियाबाद पुलिस कमिश्नर द्वारा दायर अनुपालन हलफनामे (Compliance Affidavit) पर भी ध्यान दिया, जिसमें कहा गया कि फिलहाल कोई भी व्यक्ति हिरासत में नहीं है।

हालांकि, बेंच ने बताया कि रिपोर्ट से पता चलता है कि लोगों को पहले गिरफ़्तार किया गया और कई दिनों तक जेल में रखा गया था, और उन्हें कोर्ट के आदेश के बाद ही "अच्छा काम दिखाने" के लिए रिहा किया गया।

इस पृष्ठभूमि में बेंच ने उस व्यक्ति को मौद्रिक मुआवज़ा देने के सवाल पर विचार किया जिसके आज़ादी के अधिकार का उल्लंघन सरकारी कर्मचारियों द्वारा किया गया हो।

बेंच ने 'दौदयाल बनाम राजस्थान राज्य' (2026 LiveLaw (SC) 567) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का ज़िक्र किया। इस फैसले में 'नीलाबती बेहरा बनाम ओडिशा राज्य' (1993) के ऐतिहासिक मामले का हवाला दिया गया, जिसमें यह कहा गया कि जब राज्य मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के अपने सार्वजनिक कर्तव्य को निभाने में विफल रहता है, तो 'मिसाल कायम करने वाले हर्जाने' (Exemplary Damages) के तौर पर मौद्रिक मुआवज़ा दिया जा सकता है।

कोर्ट ने 'अमित जानी बनाम यूपी राज्य और अन्य (2020)' और 'शिव कुमार वर्मा और अन्य बनाम यूपी राज्य और 3 अन्य' मामलों में समान बेंच के फैसलों का भी हवाला दिया। इन फैसलों में कहा गया था कि CrPC के चैप्टर-VIII के तहत हिरासत का आदेश तभी दिया जा सकता है जब बॉन्ड न भरा गया हो, न कि किसी और स्थिति में। यानी, हिरासत का आदेश सिर्फ़ बॉन्ड न भरने की स्थिति में ही दिया जा सकता है।

इस पृष्ठभूमि में बेंच ने माना कि BNSS के प्रावधान लागू होने के बाद एक नई पॉलिसी बनाकर 2021 की राज्य पॉलिसी में तय ₹25,000 के मुआवज़े की रकम बढ़ाई जानी चाहिए।

हालांकि, जब तक राज्य सरकार नई पॉलिसी लागू नहीं करती, और गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में लिए गए और जेल में बंद लोगों की आज़ादी के अधिकार के खुलेआम उल्लंघन को ध्यान में रखते हुए बेंच ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

1. BNSS/CrPC के प्रावधानों के तहत किसी व्यक्ति को प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) में लेने के बाद उसे शांति बनाए रखने और अच्छा व्यवहार करने का वचन देते हुए एक पर्सनल बॉन्ड (बिना पैसे जमा किए हस्ताक्षर वाला बॉन्ड) भरना होगा।

2. ऐसे बॉन्ड की रकम ₹20,000 से ज़्यादा नहीं होगी और इसके लिए किसी ज़मानतदार (surety) की ज़रूरत नहीं होगी। अगर बॉन्ड की रकम बढ़ाई जाती है तो मजिस्ट्रेट को इसके कारण लिखित में देने होंगे। हिरासत वाले दिन, अगर हिरासत में लिया गया व्यक्ति बॉन्ड भर देता है, तो उसे रिहा कर दिया जाएगा।

3. अगर आरोपी उसी दिन मजिस्ट्रेट/पुलिस कमिश्नर के सामने पेश किए जाने पर शांति बनाए रखने के लिए पर्सनल बॉन्ड भरने से इनकार करता है तो जेल भेजने से पहले उसके इनकार को लिखित और ऑडियो-विज़ुअल तरीके से रिकॉर्ड किया जाएगा।

4. उसे उस तारीख पर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाएगा, जो उसने पर्सनल बॉन्ड भरने से इनकार करते समय बताई थी, ताकि वह अपनी चुनी हुई तारीख पर पर्सनल बॉन्ड पेश कर सके।

5. इसके अलावा, जिन मामलों में किसी व्यक्ति को बिना किसी ठोस कारण के इस आदेश का उल्लंघन करते हुए 24 घंटे से ज़्यादा समय तक हिरासत में रखा जाता है, वहां राज्य सरकार द्वारा हिरासत में लिए गए व्यक्ति को मुआवज़े के तौर पर ₹25,000 प्रति दिन की रकम दी जाएगी।

6. अगर संबंधित मजिस्ट्रेट और/या पुलिस अधिकारी (या दोनों, जैसा भी मामला हो) इस चूक के लिए ज़िम्मेदार पाए जाते हैं, तो उनके ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने और उनकी जवाबदेही तय करने के बाद, यह रकम उनकी सैलरी से काटकर वसूल की जाएगी।

7. इस चूक के लिए प्रथम दृष्टया ज़िम्मेदार पाए गए मजिस्ट्रेट और/या पुलिस अधिकारी (या दोनों) के ख़िलाफ़, उनके संबंधित सेवा नियमों के अनुसार कर्तव्य में लापरवाही के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

मौजूदा मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए बेंच ने पाया कि याचिकाकर्ता वकील को 22 फरवरी से 25 फरवरी तक जेल में अवैध रूप से हिरासत में रखा गया, इसलिए अदालत ने माना कि वह कुल ₹75,000 के मुआवज़े के हकदार हैं।

राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि वह यह रकम 6 हफ़्ते के भीतर अदा करे और बाद में इसे संबंधित असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ़ पुलिस और/या संबंधित SHO से वसूल करे।

रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया गया कि वे इस आदेश की एक प्रति एक हफ़्ते के भीतर उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को भेजें, ताकि वे पुलिस कमिश्नरेट या ज़िलों के सभी पुलिस प्रमुखों को सर्कुलर जारी करके ज़रूरी अनुपालन सुनिश्चित कर सकें।

Case : Chander Pal Singh v State of UP and others

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