पेशेवर कामों के लिए वकीलों पर केस चलाना मतलब 'बार का अंत': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वकील के खिलाफ साज़िश की FIR रद्द की

Update: 2026-05-27 05:21 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में राज्य के कमर्शियल टैक्स डिपार्टमेंट को वकील के खिलाफ FIR दर्ज करने के लिए फटकार लगाई। वकील ने यह काम अपनी पेशेवर हैसियत से किया था।

एक कड़ा संदेश देते हुए जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने कहा कि अगर वकीलों पर पेशेवर काम करने के लिए केस चलाया जाता है तो यह "बार के अस्तित्व का ही अंत" होगा। साथ ही एडवोकेट्स एक्ट के तहत प्रैक्टिस करने के वकील के अधिकार का भी अंत होगा।

इस तरह बेंच ने हाईकोर्ट में 'एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड' और याचिकाकर्ता-समर्पण जैन के खिलाफ FIR और उसके बाद दायर चार्जशीट रद्द की। बेंच ने रामपुर के एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट द्वारा पारित संज्ञान आदेश को भी रद्द किया।

संक्षेप में मामला

जैन को उनके क्लाइंट (मोहम्मद हारिस) M/s MH Enterprises के मालिक हैं। उन्होंने गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स एक्ट, 2017 की धारा 107 के तहत वैधानिक अपील दायर करने के लिए नियुक्त किया था।

इन अपीलों में डिप्टी कमिश्नर, GST, सेक्टर-1, रामपुर द्वारा वित्तीय वर्ष 2022-23 और 2023-24 के दौरान लगाए गए भारी टैक्स, ब्याज और जुर्माने के आकलन को चुनौती दी गई।

अपने क्लाइंट के निर्देशों पर काम करते हुए जैन ने 15 अगस्त, 2025 को ऑनलाइन वैधानिक अपीलें दायर कीं, जिसमें उन्होंने करदाता के 'इलेक्ट्रॉनिक क्रेडिट लेजर' से 'इनपुट टैक्स क्रेडिट' (ITC) का उपयोग करके विवादित टैक्स का अनिवार्य 10% 'प्री-डिपॉजिट' (अग्रिम जमा) जमा किया।

जैन का यह पक्ष था कि प्री-डिपॉजिट के लिए क्लाइंट के ITC और इलेक्ट्रॉनिक क्रेडिट लेजर का उपयोग करना गुजरात हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले के अनुसार अनुमेय था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी सही ठहराया था।

हालांकि, अपीलीय प्राधिकरण ने वैधानिक प्री-डिपॉजिट के इस तरीके को स्वीकार करने से इनकार किया और अपील को उसकी 'मेंटेनेबिलिटी' (सुनवाई योग्य होने) के आधार पर खारिज किया।

इसके बाद शिकायतकर्ता (GST के डिप्टी कमिश्नर/प्रतिवादी संख्या 3) ने न केवल याचिकाकर्ता के क्लाइंट के खिलाफ, बल्कि याचिकाकर्ता के खिलाफ भी विवादित FIR दर्ज की। उन पर आरोप था कि उन्होंने 'इनपुट टैक्स क्रेडिट' का उपयोग करके 'इलेक्ट्रॉनिक क्रेडिट लेजर' से विवादित टैक्स का 10% प्री-डिपॉजिट जमा किया था। इस खास मामले में शिकायतकर्ता ने कहा कि याचिकाकर्ता के क्लाइंट ने अपने आदेश के खिलाफ अपील करते समय एक गैर-कानूनी तरीका अपनाया था।

FIR में यह भी आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता के क्लाइंट ने याचिकाकर्ता के साथ मिलकर GST की चोरी की थी, जिससे सरकारी खजाने को आर्थिक नुकसान हुआ। इसके बाद पुलिस रिपोर्ट आई, जिस पर संबंधित कोर्ट ने संज्ञान भी लिया।

इस मामले की पूरी कार्यवाही को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता-जैन ने हाईकोर्ट का रुख किया। उन्होंने दलील दी कि अपील दायर करते समय और विवादित टैक्स के लिए ज़रूरी फीस जमा करते समय उन्होंने अपनी "पेशेवर हैसियत" से काम किया था और जो कुछ भी किया, अपनी जानकारी के हिसाब से सबसे अच्छा किया।

यह तर्क दिया गया कि भले ही याचिकाकर्ता से कोई गलती हुई हो, लेकिन वह अपनी "पेशेवर हैसियत" से ही काम कर रहा था। ऐसा कुछ भी नहीं था, जिससे यह साबित हो सके कि वह अपने क्लाइंट के कारोबार में साझीदार था और इसलिए, कोई साज़िश करने वाला था।

सुनवाई के दौरान, जब एडिशनल एडवोकेट जनरल से इस मुद्दे पर सवाल किया गया तो उनके पास कहने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं था। इसी तरह शिकायतकर्ता-GST अधिकारी के पास भी इस बात का कोई जवाब नहीं था कि उन्होंने FIR में उस वकील का नाम उसके पेशेवर काम के लिए क्यों शामिल किया।

आवेदक पर उसके पेशेवर काम के लिए मुकदमा चलाने पर कड़ी आपत्ति जताते हुए बेंच ने पाया कि यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 में निहित सिद्धांतों की जड़ों पर ही चोट कर रही है। बेंच ने कहा कि ऐसा होने की इजाज़त नहीं दी जा सकती।

बेंच ने टिप्पणी की,

"एक वकील अपने पेशे के नाते अपने मुवक्किल का प्रतिनिधित्व करने के लिए अधिकृत होता है; मुवक्किल का मामला किसी भी तरह का हो सकता है, जिसे अदालत में दायर किया जाना हो या जिसका बचाव किया जाना हो। एक वकील अपने पेशे के नाते हत्या, बलात्कार, आतंकवादी अपराधों के आरोपी लोगों का बचाव करने के लिए अधिकृत होता है। उनका बचाव करना उसका कर्तव्य है। यदि, किसी पेशेवर कार्य को करने के लिए—जैसे कि अपील दायर करना—किसी वकील को उसके मुवक्किल के साथ साज़िश में शामिल माना जाता है तो यह 'बार' (वकीलों के समुदाय) के अस्तित्व और 'वकील अधिनियम' के तहत वकालत करने के वकील के अधिकार का ही अंत हो जाएगा।"

अदालत ने आगे कहा कि एक वकील को निडर होकर काम करना चाहिए और अपने पेशेवर कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे राज्य का कोई अधिकारी अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने का हकदार होता है।

बेंच ने गौर किया कि वकीलों पर मुकदमा चलाने से नागरिकों को उनके बहुमूल्य कानूनी सहायता के अधिकार से परोक्ष रूप से वंचित होना पड़ेगा, क्योंकि कोई भी वकील 'वकालतनामा' दायर करने से पहले अपने खुद के बचाव के बारे में ही सोच रहा होगा।

अदालत ने टिप्पणी की कि भले ही GST के उपायुक्त (Deputy Commissioner) को यह लगता हो कि विवादित कर की 'प्री-डिपॉजिट' (अग्रिम जमा राशि) को 'इनपुट टैक्स क्रेडिट' में से 'इलेक्ट्रॉनिक लेजर' में डेबिट नहीं किया जा सकता था, फिर भी ऐसा करने का वकील का पेशेवर निर्णय, किसी भी तरह से उसे करदाता के साथ साज़िश करने वाला नहीं बनाता है।

बेंच ने टिप्पणी की,

"यह पूरी तरह से एक पेशेवर कार्य है और इसका उसके मुवक्किल के व्यवसाय से बिल्कुल भी कोई लेना-देना नहीं है। यह अपील दायर करने की प्रक्रिया के दौरान किया गया था। इससे अधिक कुछ नहीं। यह कानून के एक विशेष दृष्टिकोण पर आधारित था—चाहे वह दृष्टिकोण सही हो, गलत हो, या पूरी तरह से गलत हो।"

परिणामस्वरूप, बेंच ने याचिका स्वीकार की, FIR रद्द की। साथ ही उस 'संज्ञान आदेश' (cognizance order) को भी निरस्त किया, जहां तक उसका संबंध याचिकाकर्ता से था।

Case Title: Samarpan Jain vs State Of U.P. And 2 Others 2026 LiveLaw (AB) 296

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