'बुलडोजर कार्रवाई कानून नहीं, प्रतिशोध का हथियार बन गई है': इलाहाबाद हाईकोर्ट
'बुलडोजर न्याय' पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन की सख्त टिप्पणी, बोले- आरोपियों के घर गिराकर समाज की 'खून की प्यास' शांत कर रही है सरकार
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन ने उत्तर प्रदेश सरकार की हालिया 'बुलडोजर कार्रवाई' पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य आरोपियों के घर इसलिए ढहा रहा है ताकि "बुलडोजर न्याय की आदत डाल दिए गए समाज की कथित खून की प्यास (Bloodlust) शांत की जा सके।"
उन्होंने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य यह मानकर चल रहा है कि समाज दूसरों के दुर्भाग्य में सुख (Schadenfreude) महसूस करता है और कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना भीड़तंत्र जैसी त्वरित सजा (Vigilante Style Summary Justice) दिए जाने पर सरकार की सराहना करेगा। जस्टिस श्रीधरन ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में संवैधानिक न्यायालयों का दायित्व है कि वे संविधान और कानून के अनुरूप न्यायशास्त्र विकसित करें।
ये टिप्पणियां जस्टिस श्रीधरन ने 51 पृष्ठों के अपने अलग फैसले में कीं, जो हमीरपुर के एक परिवार की संपत्तियों को ध्वस्त किए जाने से संबंधित मामले में दिया गया। परिवार के एक सदस्य के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), आईटी अधिनियम, पॉक्सो अधिनियम और उत्तर प्रदेश गैरकानूनी धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत मामला दर्ज होने के तुरंत बाद प्रशासन ने उनके मकानों को निशाना बनाया था।
खंडपीठ, जिसमें जस्टिस सिद्धार्थ नंदन भी शामिल थे, इस बात पर एकमत रही कि किसी आरोपी को दंडित करने के उद्देश्य से उसके घर को गिराना कानून का दुरुपयोग और प्रतिशोधात्मक कार्रवाई है। हालांकि, इस बात पर दोनों न्यायाधीशों की राय अलग रही कि क्या एफआईआर दर्ज होने के बाद दो वर्ष तक राज्य को आरोपी के घर पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई से रोका जाना चाहिए।
अपने फैसले की शुरुआत जस्टिस श्रीधरन ने उर्दू शायर बशीर बद्र की प्रसिद्ध पंक्तियों— "लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में"—से की। उन्होंने कहा कि एक घर केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि परिवार की आशाओं, सम्मान और सुरक्षा का प्रतीक होता है। इसे अचानक छीन लेना परिवार को निराशा की गहरी खाई में धकेल देता है।
जस्टिस श्रीधरन ने आरोपी के घर को तत्काल गिराने की कार्रवाई को "Retributive Exercise of Executive Discretion" यानी कार्यपालिका के विवेकाधिकार का प्रतिशोधात्मक प्रयोग बताया और कहा कि यदि राज्य नगर निगम कानूनों का इस्तेमाल किसी आरोपी को दंडित करने के लिए करता है, तो यह कानून की दृष्टि में अत्यंत दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई है, जिसे अदालतों को रोकना चाहिए या पीड़ितों को मुआवजा दिलाना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि अवैध कॉलोनियों में रहने वाले अधिकांश लोग गरीबी और बेरोजगारी के कारण वहां रहने को मजबूर होते हैं, जबकि प्रभावशाली और संपन्न लोगों के अवैध निर्माण अक्सर राजनीतिक संरक्षण और भ्रष्टाचार के कारण कार्रवाई से बचे रहते हैं।
भ्रष्टाचार पर चिंता जताते हुए जस्टिस श्रीधरन ने अयोध्या राम मंदिर दान चोरी विवाद का उल्लेख किया और कहा कि यदि राम मंदिर जैसे पवित्र स्थल पर दान की चोरी भी समाज को झकझोर नहीं पाती, तो यह भारतीय समाज की नैतिक गिरावट का प्रतीक है। उन्होंने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 में संशोधन कर दोषियों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान करने पर भी विचार करने का सुझाव दिया।