किरायेदार की मृत्यु के बाद सभी वारिसों को पक्षकार बनाना जरूरी नहीं, संयुक्त किरायेदार पूरे किरायेदारी अधिकारों का प्रतिनिधित्व कर सकता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-07-21 06:22 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी किरायेदार की मृत्यु के बाद बेदखली के मुकदमे में उसके सभी कानूनी वारिसों को पक्षकार बनाना अनिवार्य नहीं है। यदि संयुक्त किरायेदारों में से कोई एक किरायेदारी का प्रभावी ढंग से प्रतिनिधित्व कर रहा है या कब्जे में है, तो वही पूरे किरायेदारी अधिकारों का प्रतिनिधित्व करेगा और उसके विरुद्ध पारित आदेश अन्य संयुक्त किरायेदारों पर भी बाध्यकारी होगा।

जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि किरायेदार की मृत्यु के बाद किरायेदारी उसके उत्तराधिकारियों को संयुक्त और अविभाज्य इकाई के रूप में हस्तांतरित होती है। मकान मालिक के संदर्भ में यह किरायेदारी अपनी एकता बनाए रखती है। इसलिए सभी वारिसों को मुकदमे में शामिल करना उसकी वैधता के लिए आवश्यक शर्त नहीं है।

कोर्ट ने कहा,

"किरायेदार की मृत्यु के बाद किरायेदारी उसके कानूनी उत्तराधिकारियों को संयुक्त और अविभाज्य रूप में प्राप्त होती है। ऐसे में यदि संयुक्त किरायेदारों में से कोई एक कब्जे में है या प्रभावी रूप से किरायेदारी का प्रतिनिधित्व कर रहा है, तो कानून की दृष्टि में वह सभी संयुक्त किरायेदारों का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए सभी कानूनी वारिसों को पक्षकार बनाना न तो अनिवार्य है और न ही उनके शामिल न होने से बेदखली की कार्यवाही अवैध हो जाती है, जब तक कि अलग या स्वतंत्र किरायेदारी अधिकार का विशेष रूप से दावा और प्रमाण न हो।"

मामले में वर्ष 2014 में एक व्यावसायिक परिसर से बेदखली, बकाया किराया और हर्जाने की मांग को लेकर वाद दायर किया गया। मूल किरायेदार ने लिखित बयान दाखिल किया, लेकिन वर्ष 2019 में मुकदमे के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद मकान मालिक के आवेदन पर उनके पुत्र आशीष कुमार अग्रवाल को एकमात्र कानूनी प्रतिनिधि के रूप में मुकदमे में शामिल कर लिया गया।

बाद में ट्रायल कोर्ट द्वारा एकपक्षीय कार्यवाही शुरू किए जाने पर आशीष कुमार अग्रवाल ने आवेदन देकर कहा कि मृतक के सभी कानूनी वारिसों को पक्षकार नहीं बनाया गया और उन्हें विधिवत नोटिस भी नहीं मिला।

ट्रायल कोर्ट ने एकपक्षीय कार्यवाही तो वापस ले ली लेकिन उत्तराधिकार प्रतिस्थापन का आदेश रद्द करने से इनकार कर दिया। पुनरीक्षण अदालत ने भी इस आदेश को बरकरार रखा, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।

हाईकोर्ट ने कहा कि दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 22 के तहत सभी वारिसों को शामिल करना आवश्यक नहीं है, बल्कि यह देखना महत्वपूर्ण है कि मृतक की संपत्ति और अधिकारों का प्रभावी प्रतिनिधित्व हो रहा है या नहीं।

अदालत ने कहा कि प्रभावी प्रतिनिधित्व की जांच के लिए तीन पहलुओं को देखा जाता है— क्या मुकदमे का ईमानदारी और सावधानी से संचालन किया गया, क्या रिकॉर्ड पर मौजूद पक्षकार और बाहर रह गए वारिसों का हित समान है तथा क्या किसी वारिस को शामिल न करने से न्याय में कोई वास्तविक क्षति हुई।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संयुक्त किरायेदारी में अन्य वारिस आवश्यक पक्षकार नहीं बल्कि केवल उचित पक्षकार होते हैं। यदि वे अपने अधिकार का दावा करना चाहें तो उन्हें मुकदमे में शामिल होने का अवसर मिल सकता है लेकिन उन्हें हर हाल में पक्षकार बनाना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है।

हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि निचली अदालतों ने पाया था कि आशीष कुमार अग्रवाल ही किराए के परिसर में व्यवसाय चला रहे थे और उसी का वास्तविक कब्जा था, जबकि मृतक की पत्नी और बेटियां न तो व्यवसाय में शामिल थीं और न ही उनके कब्जे का कोई प्रमाण था। साथ ही, किसी अन्य कथित वारिस ने स्वयं मुकदमे में शामिल होने के लिए कोई आवेदन भी नहीं दिया था।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और पुनरीक्षण अदालत के आदेशों में किसी प्रकार की अवैधता या त्रुटि नहीं पाई और याचिका खारिज कर दी।

साथ ही ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह मुकदमे की सुनवाई तेजी से पूरी करते हुए संभव हो तो छह महीने के भीतर उसका निस्तारण करने का प्रयास करे।

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