परमानेंट लोक अदालत का यह कहना- 'समझौते की कोशिश की गई लेकिन नाकाम रही', कानूनी रूप से काफी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-07-06 05:59 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि परमानेंट लोक अदालत का यह कहना कि 'समझौते की कोशिश की गई लेकिन नाकाम रही', एक सामान्य बात है। हाईकोर्ट के 'मैनेजर, लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, बस्ती बनाम परमानेंट लोक अदालत, बस्ती और अन्य' मामले में दिए गए फैसले के अनुसार, यह कानूनी रूप से काफी नहीं है।

'मैनेजर, लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, बस्ती बनाम परमानेंट लोक अदालत, बस्ती और अन्य' मामले में कोर्ट ने कहा था कि परमानेंट लोक अदालत का काम सबसे पहले पार्टियों के बीच समझौते और निपटारे की कोशिश करना है। अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो उसे अपने फैसले (अवार्ड) में कार्यवाही का (संक्षेप में) ब्योरा देना चाहिए ताकि विवाद पर उसका फैसला साफ हो सके। कोर्ट ने कहा कि अगर समझौते की कोशिश नहीं की गई तो फैसला कानूनी रूप से अमान्य हो जाएगा क्योंकि यह एक्ट के प्रावधानों के खिलाफ होगा।

कोर्ट ने यह भी कहा कि सिर्फ यह लिख देना कि "समझौते की कोशिश की गई लेकिन नाकाम रही", काफी नहीं है। रिकॉर्ड या फैसले में यह साफ दिखना चाहिए कि: समझौता कब करने की कोशिश की गई; क्या कोशिशें की गईं; समझौते की क्या शर्तें (अगर कोई थीं) रखी गईं; और पार्टियां किसी समझौते पर क्यों नहीं पहुंच सकीं।

इस मामले में परमानेंट लोक अदालत ने टिप्पणी की थी कि मामले को समझौते के लिए भेजा गया था, लेकिन समझौते की कोशिशें नाकाम रहीं।

इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। दलील दी गई कि यह 'लीगल सर्विसेज अथॉरिटी एक्ट, 1987' की धारा 22-C के तहत तय समझौते की प्रक्रिया के खिलाफ है।

यह मानते हुए कि परमानेंट लोक अदालत का विचार काफी नहीं है, जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने मामले को संबंधित अथॉरिटी के पास वापस भेज दिया ताकि ऊपर बताए गए फैसले के अनुसार निर्णय लिया जा सके।

Case Title: The Oriental Insurance Company Limited v. Lalta Prasad Sharma And 5 Others

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